ट्रंप का राष्ट्र के नाम संबोधन:  महायुद्ध विमर्श: रणनीति, औचित्य, वैश्विक निहितार्थ और ट्रंप

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डॉ घनश्याम बादल

इजराइल के साथ मिलकर ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ रहे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन में ईरान के विरुद्ध संभावित या चल रहे सैन्य कदमों को जिस प्रकार से न्यायोचित ठहराया गया, उसने वैश्विक राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है।

अपनी प्रकृति के मुताबिक ही इस संबोधन में ट्रंप ने सुरक्षा, आतंकवाद, सामरिक संतुलन, ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा तथा सहयोगी देशों के हितों जैसे अनेक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। विशेष रूप से इजराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ कार्रवाई को उन्होंने “आवश्यक” और “रक्षात्मक” कदम बताया हालांकि, इस पूरे विमर्श के भीतर कई ऐसे अंतर्विरोध भी मौजूद हैं जो अमेरिकी विदेश नीति की दीर्घकालिक दिशा और उसके प्रभावों पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं।

कभी भीषणतम हमले करने तो कभी युद्ध विराम की बात करने वाले ट्रंप के भाषण का सबसे बड़ा केंद्रीय तत्व राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा रहा। उन्होंने ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता का प्रमुख कारण बताते हुए आरोप लगाया कि वह आतंकवादी संगठनों को समर्थन देता है और मध्य-पूर्व में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहता है। इस संदर्भ में उन्होंने यह तर्क दिया कि अमेरिका और उसके सहयोगियों, विशेषकर इजराइल, की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कठोर कदम उठाना अनिवार्य हो गया है। यहां ट्रंप की भाषा स्पष्ट रूप से “पूर्व-निरोधात्मक युद्ध” की अवधारणा को समर्थन देती दिखाई देती है जिसमें ख़तरे के पूरी तरह मूर्त रूप लेने से पहले ही सैन्य कार्रवाई को उचित ठहराया जाता है।

अपने अजीबो गरीब व्यवहार एवं तर्कों के साथ इजराइल के साथ अमेरिकी गठबंधन को ट्रंप ने इस पूरे परिप्रेक्ष्य में नैतिक और रणनीतिक दोनों रूपों में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इजराइल पर किसी भी प्रकार का खतरा अमेरिका के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों को एक साझा सुरक्षा ढांचे के रूप में चित्रित किया लेकिन आलोचकों का मानना है कि इस दृष्टिकोण में क्षेत्रीय जटिलताओं की अनदेखी की गई है और इससे संघर्ष और अधिक गहरा सकता है।

हार्मूज स्ट्रेट को ‘ट्रंप स्ट्रेट’ के नाम से संबोधित करने की चतुराई भरी गलती करने वाले ट्रंप के संबोधन में ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार मार्गों का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र वैश्विक तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग है, और इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी है। यहां उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को और मजबूत कर सकता है। यह रणनीति केवल सैन्य दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे आर्थिक हित भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

हालांकि, होर्मुज क्षेत्र को लेकर ट्रंप की रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव भी देखा गया है। पहले जहां अमेरिका अपेक्षाकृत संयमित रुख अपनाता रहा था, वहीं अब वह अधिक आक्रामक और प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की नीति की ओर बढ़ता दिखाई देता है। इस बदलाव का एक कारण यह भी हो सकता है कि अमेरिका वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है और किसी भी प्रकार की अस्थिरता को अपने हितों के लिए खतरा मानता है। लेकिन यह रणनीति जोखिमों से भी भरी हुई है, क्योंकि इससे क्षेत्रीय शक्तियों के बीच टकराव की संभावना बढ़ जाती है लेकिन “हमें हार्मूज की ज़रूरत नहीं है, जिन्हें इसकी ज़रूरत है, वें उसकी सुरक्षा की चिंता करें” के कथन के बाद ट्रंप का यह भाषण एक बार फिर दुनिया को चकराने वाला है।

भविष्य को लेकर ट्रंप का दृष्टिकोण भी उनके भाषण में स्पष्ट रूप से सामने आया। उन्होंने कहा कि अमेरिका युद्ध नहीं चाहता लेकिन यदि उसे अपने हितों और सहयोगियों की रक्षा के लिए युद्ध करना पड़े, तो वह पीछे नहीं हटेगा। यह एक प्रकार की “शर्तीय शांति” की अवधारणा है, जिसमें शांति की इच्छा तो जताई जाती है, लेकिन साथ ही सैन्य कार्रवाई की संभावना को भी खुला रखा जाता है। इस तरह का दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अनिश्चितता को बढ़ाता है और संवाद की संभावनाओं को सीमित करता है।

अमेरिका में अपने खिलाफ बढ़ते जा रहे विरोध के बीच लोकप्रियता के सबसे निचले पायदान पर पहुंच चुके ट्रंप ने अपने संबोधन में घरेलू राजनीति को भी अप्रत्यक्ष रूप से साधने का प्रयास किया। उन्होंने अमेरिकी जनता को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि उनकी सरकार देश की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठा रही है। यह पहलू विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए घरेलू समर्थन आवश्यक होता है लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि युद्ध के दीर्घकालिक परिणाम अक्सर अप्रत्याशित होते हैं और उनका प्रभाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता।

निष्पक्ष व आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो ट्रंप का यह पूरा विमर्श कई सवाल खड़े करता है। सबसे पहला प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में ईरान से उत्पन्न खतरा इतना तात्कालिक और गंभीर है कि सैन्य कार्रवाई को उचित ठहराया जा सके? दूसरा, क्या इस प्रकार की आक्रामक नीति से क्षेत्र में स्थिरता आएगी या फिर यह और अधिक अस्थिरता को जन्म देगी? तीसरा, क्या अमेरिका अपने आर्थिक और सामरिक हितों को “वैश्विक सुरक्षा” के नाम पर प्रस्तुत कर रहा है?

इससे इतर भी इस पूरे परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि कोई भी देश एकतरफा सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह वैश्विक व्यवस्था के लिए एक खतरनाक उदाहरण बन सकता है। ट्रंप के भाषण में इस पहलू का उल्लेख अपेक्षाकृत कम रहा, जो यह संकेत देता है कि अमेरिका अपने निर्णयों में बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका को सीमित कर सकता है।

अंततः, ट्रंप का यह संबोधन केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक संकेत है, जो यह दर्शाता है कि अमेरिका आने वाले समय में मध्य-पूर्व में किस प्रकार की भूमिका निभाना चाहता है। यह भूमिका अधिक आक्रामक, प्रत्यक्ष और हित-केन्द्रित दिखाई देती है। हालांकि, इस रणनीति के परिणाम क्या होंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना निश्चित है कि इसका प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा।

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Author: Bharat Sarathi

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