बेमौसम बारिश और अव्यवस्था से बढ़ी किसानों की मुश्किलें, सरकार से शर्तें वापस लेकर सरल व्यवस्था बनाने की मांग
रेवाडी, 2 अप्रैल 2026। स्वयंसेवी संस्था ‘ग्रामीण भारत’ के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने दक्षिणी हरियाणा की मंडियों में गेहूं व सरसों की सरकारी खरीद व्यवस्था को पूरी तरह लचर बताते हुए भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि हरियाणा के खाद्य आपूर्ति राज्य मंत्री द्वारा मंडियों का दौरा करने के बाद अब सरकार को जमीनी हकीकत का अंदाजा हो जाना चाहिए कि खरीद व्यवस्था किस कदर बदहाल है।
विद्रोही ने उम्मीद जताई कि राज्यमंत्री अपनी आंखों से देखी अव्यवस्था को गंभीरता से लेते हुए इसे सुधारने के लिए ठोस कदम उठाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार के दावों और वास्तविक स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर साफ नजर आ रहा है।
उन्होंने बताया कि रेवाड़ी जिले की तीनों प्रमुख मंडियां—रेवाड़ी, बावल और कोसली—अव्यवस्थाओं से जूझ रही हैं। यहां किसानों से बातचीत और मौके के निरीक्षण में सामने आया कि एमएसपी पर खरीद की प्रक्रिया कागजों में भले शुरू हो चुकी हो, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात इसके विपरीत हैं।
विद्रोही ने कहा कि बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने पहले ही किसानों की खड़ी फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है, वहीं दूसरी ओर सरकारी खरीद में देरी और अव्यवस्था ने किसानों की परेशानी को दोगुना कर दिया है। अहीरवाल क्षेत्र का किसान इस समय दोहरी मार झेल रहा है।
उन्होंने सरकार द्वारा लागू की गई शर्तों—जैसे ट्रैक्टर-ट्रॉली की अनिवार्यता, वाहन के नंबर की अनिवार्यता और बायोमैट्रिक सत्यापन—को अव्यवहारिक बताते हुए कहा कि ये नियम किसानों के लिए बड़ी बाधा बन गए हैं। विद्रोही ने सवाल उठाया कि जब 70-75 प्रतिशत किसानों के पास खुद का ट्रैक्टर-ट्रॉली नहीं है, तो वे इन शर्तों को कैसे पूरा करेंगे।
इसके अलावा, छोटे किसान जो नौकरी या अन्य कारणों से गांव से दूर रहते हैं, उनके लिए बायोमैट्रिक शर्त पूरी करना भी मुश्किल है। उन्होंने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से अपील की कि वे वास्तविक स्थिति को समझते हुए इन अव्यवहारिक शर्तों को तुरंत वापस लें।
विद्रोही ने मांग की कि सरकार ऐसी सरल और सुगम व्यवस्था लागू करे, जिससे किसान बिना किसी बाधा के अपनी फसल एमएसपी पर बेच सकें। साथ ही, उन्होंने मंडियों की बदहाल स्थिति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की भी मांग की, ताकि भविष्य में सरकार के दावे और जमीनी हकीकत में समानता लाई जा सके।









