उग्रवाद की जड़ें: बाहर नहीं, हमारे भीतर

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धर्म के नाम पर बढ़ती कट्टरता और आचरणहीन समाज का सच

आचार्य डॉ. महेन्द्र शर्मा “महेश”, पानीपत

“बाढ़े खल बहु चोर जुआरा, ते लंपट परधन परदारा…”
— रामचरितमानस
🔶 उत्सवों के बीच खोता धर्म का मर्म

अभी-अभी देश ने नवसंवत्सर और चैत्र नवरात्र के नौ दिनों तक आदि शक्ति की आराधना की। नौ दिनों तक व्रत, पूजा, भजन और लंगर के माध्यम से भक्ति का वातावरण बना रहा। नवमी को राम नवमी के रूप में ज्ञान, मर्यादा और धर्म के प्रतीक भगवान राम का जन्मोत्सव मनाया गया।

लेकिन प्रश्न यह है कि—
क्या यह भक्ति हमारे जीवन में भी उतर रही है?

सच यह है कि उत्सव समाप्त होते ही हम अपने-अपने घर लौट आते हैं, और जिन सद्ग्रंथों से हमें धर्म, मर्यादा और आदर्शों का ज्ञान मिला, वे घर के मंदिर के किसी कोने में सिसकते रह जाते हैं।
हम चित्र की पूजा करते हैं, चरित्र को भूल जाते हैं।

🔶 उग्रवाद: समाज नहीं, व्यक्ति से जन्म लेता है

आज समाज में बढ़ती हिंसा, कट्टरता और उग्रवाद को हम अक्सर बाहरी कारणों से जोड़ते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इसकी जड़ें हमारे भीतर हैं।

रामचरितमानस में वर्णित है कि जब समाज में—

  • चोर, जुआरी और लंपट बढ़ जाते हैं
  • परधन और परस्त्री में आसक्ति बढ़ती है
  • माता-पिता और गुरु का सम्मान समाप्त हो जाता है

तब समझ लेना चाहिए कि आसुरी प्रवृत्तियां जन्म ले चुकी हैं।

🔶 महाभारत का संदेश: संस्कारहीनता से विनाश

महाभारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

  • धृतराष्ट्र की अंधी ममता
  • गांधारी का स्वेच्छा से आंखों पर पट्टी बांध लेना

इन दोनों की भूलों ने दुर्योधन जैसे कुसंस्कारी व्यक्तित्व को जन्म दिया।

जब माता-पिता ही अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाएं, तो संतान में संस्कार कैसे आएंगे?
यही संस्कारहीनता आगे चलकर उग्रवाद का रूप ले लेती है।

🔶 धर्म का दिखावा, आचरण का अभाव

आज समाज में धर्म का शोर बहुत है, लेकिन उसका सार गायब है।

  • धर्म को समझे बिना उसका प्रदर्शन
  • राजनीति के प्रभाव में धर्म का उपयोग
  • संतों और विद्वानों का सत्ता के पीछे चलना

इन सबने मिलकर धर्म को कमजोर किया है।
जब धर्म आचरण में नहीं होता, तब वही कट्टरता बनकर उग्रवाद को जन्म देता है।

🔶 राजनीति और धर्म का असंतुलन

जब धर्म राजनीति के अधीन हो जाता है, तब समाज में संतुलन बिगड़ जाता है।

  • चरित्रहीन नेतृत्व
  • स्वार्थ आधारित निर्णय
  • जनता की भावनाओं का दोहन

ऐसी परिस्थितियों में उग्रवाद केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है।

🔶 समाधान: आत्ममंथन और आचरण सुधार

समस्या का समाधान बाहर नहीं, भीतर है—

  • धर्म को जीवन में उतारना होगा
  • बच्चों को संस्कार और मर्यादा सिखानी होगी
  • समाज में सत्य, अनुशासन और उत्तरदायित्व स्थापित करना होगा

वेद भी कहते हैं—
“आचरणहीनं न पुनन्ति वेद:”
अर्थात् आचरणहीन व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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