उमेश कुमार साहू

8 मार्च का कैलेंडर एक बार फिर हमारे सामने है। विज्ञापनों की चकाचौंध, सोशल मीडिया पर ‘विमेंस डे सेल’ के ऑफर्स और ‘पिंक रिवोल्यूशन’ के नारों के बीच एक गंभीर प्रश्न खड़ा है – क्या भारतीय नारी वास्तव में स्वतंत्र हुई है, या उसने केवल अपनी बेड़ियों का स्वरूप बदल लिया है? आज जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में हैं, तब महिला सुरक्षा, सामाजिक मर्यादा और डिजिटल भटकाव के त्रिकोण ने एक ऐसा संकट पैदा कर दिया है, जिस पर आत्म-मंथन अनिवार्य है।
आंकड़ों के आईने में खौफनाक हकीकत
NCRB (National Crime Records Bureau) की ‘Crime in India 2023-24’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में प्रतिवर्ष औसतन 4% से अधिक की वृद्धि हो रही है। देश में हर घंटे लगभग 50 से अधिक ऐसी घटनाएं दर्ज होती हैं जो महिलाओं की अस्मिता पर चोट करती हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि कुल दर्ज मामलों में से लगभग 32% मामले ‘पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता’ के हैं। यह आंकड़ा बताता है कि जिस घर को सुरक्षा का कवच होना चाहिए था, वही प्रताड़ना का केंद्र बना हुआ है। बलात्कार और अपहरण जैसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि समाज के मानसिक दिवालियेपन का प्रतीक हैं।
डिजिटल ‘मायाजाल’ : स्वतंत्रता या आत्मघाती भटकाव?
इंटरनेट और सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी तो दी, लेकिन अनजाने में महिलाओं के एक बड़े वर्ग को ‘दिखावे’ और ‘फेक वैलिडेशन’ की अंधी गली में धकेल दिया है। आज ‘एन्जॉयमेंट’ की परिभाषा बदल गई है।
· दोस्ती के नाम पर चरित्र का सौदा : ‘डेटिंग ऐप्स’ और ‘इंस्टाग्राम डायरेक्ट मैसेज (DM)’ के जरिए अजनबियों पर भरोसा करना एक फैशन बन गया है। समाचार पत्र ऐसी खबरों से भरे पड़े हैं जहां ‘डिजिटल प्रेमी’ ने न केवल विश्वासघात किया, बल्कि ब्लैकमेलिंग और हत्या जैसी वारदातों को अंजाम दिया। ‘लिव-इन’ और ‘शॉर्ट-कट रोमांस’ के चक्कर में कई महिलाएं अपने वर्षों पुराने पारिवारिक संस्कारों और खुद के चरित्र को दांव पर लगा रही हैं।
· प्रदर्शनवाद की संस्कृति : रील्स और शॉर्ट वीडियो के माध्यम से रातों-रात मशहूर होने की चाहत ने शालीनता की सीमाओं को धुंधला कर दिया है। जब स्त्री की पहचान उसकी बुद्धिमत्ता और कौशल के बजाय उसके शारीरिक प्रदर्शन (Objectification) से होने लगे, तो यह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक बाजारवाद की जीत है।
· पारिवारिक विघटन : घंटों स्क्रीन पर बिताना और वर्चुअल दुनिया के अजनबियों की तारीफों में डूबे रहना, वास्तविक रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर रहा है। कई शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया की लत के कारण वैवाहिक विवाद और तलाक के मामलों में 30% तक की बढ़ोतरी हुई है।
‘मर्यादा’ बनाम ‘छद्म आधुनिकता’
पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण करते हुए हमने ‘आजादी’ का गलत अर्थ निकाल लिया है। आजादी का अर्थ था – शिक्षा का अधिकार, संपत्ति में अधिकार और अपनी मर्जी से करियर चुनने की स्वतंत्रता। लेकिन आज इसे ‘देर रात तक पार्टी करने’, ‘नशे के सेवन’ और ‘मर्यादाओं को लांघने’ से जोड़ दिया गया है।
समाज का एक कड़वा सच यह भी है कि जब कोई महिला ‘दोस्ती’ और ‘मजे’ के नाम पर अपनी सुरक्षा और संस्कारों से समझौता करती है, तो अंततः समाज और परिवार को ही उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। चरित्र केवल एक शब्द नहीं है, यह वह नींव है जिस पर एक स्वस्थ समाज का निर्माण होता है।
समाधान : सुरक्षा और संस्कार का समन्वय
सिर्फ कड़े कानून बनाने से बदलाव नहीं आएगा; इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है –
1. डिजिटल हाइजीन और सतर्कता (Digital Vigilance) :
महिलाओं को ‘डिजिटल लिटरेसी’ के साथ-साथ ‘डिजिटल मोरालिटी’ भी सीखनी होगी। अजनबियों को अपनी निजी जिंदगी (Private Life) का हिस्सा न बनाएं। अपनी गरिमा को लाइक्स और कमेंट्स के तराजू में न तौलें। याद रखें, जो व्यक्ति आपको आपकी मर्यादा खोने के लिए प्रेरित करे, वह आपका मित्र कभी नहीं हो सकता।
2. आत्मरक्षा और वैचारिक दृढ़ता :
हर महिला को शारीरिक रूप से सक्षम होने के साथ-साथ वैचारिक रूप से भी मजबूत होना चाहिए। ‘नहीं’ कहने की शक्ति विकसित करें। यदि कोई दोस्ती या रिश्ता आपके आत्म-सम्मान या परिवार की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाए, तो उससे तुरंत बाहर निकलना ही बुद्धिमानी है।
3. परिवार की भूमिका :
माता-पिता को अपनी बेटियों को केवल ‘सुविधाएं’ नहीं, बल्कि ‘संस्कार’ और ‘समय’ भी देना होगा। घर का माहौल ऐसा हो कि महिला अपनी समस्या साझा करने के लिए किसी बाहरी अजनबी के बजाय अपने परिवार पर भरोसा करे।
4. त्वरित न्याय प्रणाली :
सरकार को बलात्कार और शारीरिक प्रताड़ना के मामलों में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनानी होगी। फास्ट-ट्रैक कोर्ट के माध्यम से 6 महीने के भीतर सजा सुनिश्चित होनी चाहिए ताकि अपराधियों के मन में कानून का खौफ पैदा हो।
निष्कर्ष
स्त्री सृष्टि की जननी है, वह शक्ति का पुंज है। उसकी सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि स्वयं उसकी सजगता और समाज की मानसिकता पर टिकी है। इस महिला दिवस पर, हमें केवल उत्सव नहीं मनाना चाहिए, बल्कि एक शपथ लेनी चाहिए – “हम अपनी प्रगति के लिए आसमान छुएंगे, लेकिन अपनी जड़ों (संस्कारों) को कभी नहीं छोड़ेंगे।”
आजादी वह है जो आपको ‘सशक्त’ बनाए, वह नहीं जो आपको ‘असुरक्षित’ और ‘चरित्रहीन’ बनाने की ओर धकेले। जिस दिन भारत की हर नारी डिजिटल मायाजाल को समझकर अपनी वास्तविक शक्ति को पहचान लेगी, उसी दिन सही मायनों में ‘महिला दिवस’ सार्थक होगा।









