कच्ची कॉलोनियों से राजस्व लेने वाली सरकार उनके हितों की रक्षा की जिम्मेदारी भी निभाए
प्रशासनिक लापरवाही से पनपी कॉलोनियों का खामियाजा केवल नागरिक क्यों भुगतें?
गुरुग्राम, 14 जून। सामाजिक कार्यकर्ता माईकल सैनी ने प्रदेश में कथित अवैध कॉलोनियों और मकानों पर चल रही कार्रवाई को लेकर सरकार से पुनर्विचार करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी नागरिकों को आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराना है, न कि उन्हें बेघर करना। ऐसे मामलों में सरकार को ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाकर वस्तुस्थिति का गंभीर अध्ययन करना चाहिए।
माईकल सैनी ने कहा कि कोई भी कॉलोनी कुछ दिनों या महीनों में नहीं बसती, बल्कि उसे विकसित होने में वर्षों लग जाते हैं। यदि किसी क्षेत्र में एक-दो मकान नियमों के विरुद्ध बने हैं तो उन पर कार्रवाई समझी जा सकती है, लेकिन पूरी की पूरी कॉलोनी को अवैध घोषित कर देना कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने कहा कि सरकार को किसी भी कठोर कदम से पहले विस्तृत सर्वेक्षण और निष्पक्ष जांच करानी चाहिए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अवैध निर्माणों को संरक्षण देने के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन जब बड़ी संख्या में कॉलोनियों को एक साथ अवैध घोषित किया जा रहा हो तो सरकार को संवेदनशीलता दिखाते हुए पुनः समीक्षा करनी चाहिए और ऐसा समाधान तलाशना चाहिए जिससे प्रभावित परिवारों और सरकार दोनों के हित सुरक्षित रह सकें।
माईकल सैनी ने कहा कि किसी भी शहर या क्षेत्र का मास्टर प्लान वर्षों पहले उसकी भौगोलिक परिस्थितियों, सीमाओं और उपयोगिता का अध्ययन करके तैयार किया जाता है। उस योजना को लागू करना प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। यदि प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही, ढिलाई या मिलीभगत के कारण अवैध कॉलोनियां विकसित हुई हैं तो जवाबदेही केवल आम नागरिकों की नहीं हो सकती। ऐसे अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियों की पुनरावृत्ति न हो।
उन्होंने कहा कि यदि किसी क्षेत्र में सरकार की कोई महत्वाकांक्षी विकास परियोजना प्रस्तावित है और उसके कारण लोगों को विस्थापित होना पड़ रहा है तो सरकार को उचित मुआवजा, वैकल्पिक आवास और सम्मानजनक पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। केवल बुलडोजर चलाकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।
माईकल सैनी ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि लोगों के साथ धक्काशाही और दमनात्मक रवैया अपनाया गया तो जनाक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है, जो किसी भी सरकार के हित में नहीं होगा। उन्होंने कहा कि आज अनेक परिवार अपने आशियाने को लेकर चिंता और असुरक्षा के माहौल में जी रहे हैं, जबकि सरकार इस मुद्दे पर मौन दिखाई दे रही है।
उन्होंने सरकार से सवाल किया कि जिन सेक्टरों और अधिकृत कॉलोनियों को स्वयं सरकार ने विकसित किया है, क्या वे पूरी तरह सुविधासंपन्न हैं? क्या वहां रहने वाले प्रत्येक नागरिक को सड़क, बिजली, पेयजल, सीवरेज, पार्किंग और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं? यदि अधिकृत क्षेत्रों में भी लोग अंधेरे में डूबी, गड्ढों से भरी और जलभराव वाली सड़कों पर चलने को मजबूर हैं, तो फिर वैध और अवैध कॉलोनियों के बीच अंतर क्या रह जाता है?
माईकल सैनी ने कहा कि जब अधिकृत सेक्टरों के निवासी भी ट्रैफिक जाम, धूल-धुएं, प्रदूषण और अव्यवस्थित बुनियादी ढांचे की समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब सरकार को पहले अपनी विकास नीतियों और शहरी नियोजन की प्रभावशीलता पर आत्ममंथन करना चाहिए। उन्होंने मांग की कि अवैध कॉलोनियों के मुद्दे पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रभावित लोगों के हितों की रक्षा की जाए तथा प्रशासनिक जवाबदेही भी तय की जाए।








