बाबूलाल नागा

फाल्गुन का महीना आते ही हवा में एक अलग-सी उमंग घुलने लगती है। खेतों में पकती फसल, गांवों की चौपालों पर गूंजते फाग और शहरों की गलियों में सजती रंग-गुलाल की दुकानें—सब मिलकर संकेत देते हैं कि होली का पर्व आ गया है। परंतु होली केवल रंगों और उल्लास का उत्सव नहीं है, यह समाज को आत्ममंथन का अवसर भी देता है। यह वह क्षण है जब हम अपने भीतर और अपने आसपास फैली दूरियों को पहचानकर उन्हें मिटाने का संकल्प ले सकते हैं।
भारत की आत्मा उसकी विविधता में बसती है। यहां अनेक धर्म, भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं साथ-साथ सांस लेती हैं। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि समय-समय पर जाति, धर्म और संकीर्ण पहचान के आधार पर समाज में दरारें उभरती रही हैं। ऐसे में होली का त्योहार हमें याद दिलाता है कि रंगों की तरह ही हमारी पहचानें भी अलग-अलग हो सकती हैं, परंतु उनका उद्देश्य एक सुंदर और समरस चित्र बनाना है।

हमारे संविधान की प्रस्तावना में “न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता” का जो संकल्प दर्ज है, वह केवल शब्दों का अलंकार नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है। बंधुता का अर्थ है—एक-दूसरे को अपना मानना, सम्मान देना और साझा भविष्य की कल्पना करना। यदि समाज में भाईचारा कमजोर होगा, तो समानता और न्याय भी अधूरे रह जाएंगे। इसलिए होली का पर्व हमें संवैधानिक मूल्यों को जीवन में उतारने का अवसर देता है।
आज के दौर में जब सामाजिक और राजनीतिक विमर्श कई बार विभाजनकारी रेखाएं खींचता दिखाई देता है, तब होली का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व कहता है कि मतभेद स्वाभाविक हैं, पर मनभेद घातक। लोकतंत्र में विचारों की विविधता शक्ति है, कमजोरी नहीं। परंतु जब विचारों का अंतर वैमनस्य में बदल जाता है, तब समाज का ताना-बाना कमजोर होने लगता है। ऐसे समय में रंगों का यह उत्सव हमें संवाद, सहिष्णुता और सहभागिता का मार्ग दिखाता है।

ग्रामीण भारत में होली अक्सर सामाजिक मेल-मिलाप का माध्यम बनती है। चौपाल पर बैठकर गाए जाने वाले फाग केवल गीत नहीं होते, वे सामूहिकता की धुन होते हैं। शहरों में भी मोहल्लों और कॉलोनियों में लोग एक-दूसरे के घर जाकर रंग लगाते हैं। यह परंपरा हमें सिखाती है कि पड़ोसी केवल भौगोलिक निकटता नहीं, बल्कि सामाजिक रिश्ते का नाम है। यदि हम इस भावना को वर्षभर बनाए रखें, तो समाज में अविश्वास की जगह विश्वास पनप सकता है।
हालांकि यह भी आवश्यक है कि हम होली के उत्सव को जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ मनाएं। किसी पर जबरन रंग डालना, अशालीन व्यवहार करना या किसी की धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना, होली की भावना के विपरीत है। बंधुता का अर्थ यह नहीं कि हम दूसरों की सहमति और गरिमा की अनदेखी करें। असली भाईचारा वही है जिसमें सम्मान और मर्यादा दोनों शामिल हों।
स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों को भी इस अवसर का उपयोग संवैधानिक चेतना के प्रसार के लिए करना चाहिए। यदि होली के कार्यक्रमों में संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक वाचन हो, सामाजिक समानता पर चर्चा हो और जाति-धर्म से परे एकता का संदेश दिया जाए तो यह त्योहार नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है। पंचायत और स्थानीय संस्थाएं “सद्भाव होली” जैसे आयोजनों के माध्यम से विभिन्न समुदायों को एक मंच पर ला सकती हैं।

आज जब डिजिटल युग में अफवाहें और भ्रामक सूचनाएं तेजी से फैलती हैं, तब सामाजिक सौहार्द बनाए रखना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। ऐसे में हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह शांति और सद्भाव का दूत बने। होली के अवसर पर यदि हम यह संकल्प लें कि हम न तो घृणा फैलाएंगे और न ही किसी प्रकार के भेदभाव को बढ़ावा देंगे, तो यह पर्व अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करेगा।
हमें यह समझना होगा कि संविधान केवल न्यायालयों और संसद तक सीमित दस्तावेज नहीं है। वह हमारे दैनिक जीवन का मार्गदर्शक है। जब हम किसी को उसकी जाति या धर्म से नहीं बल्कि उसकी मानवता से पहचानते हैं, तब हम वास्तव में संवैधानिक मूल्यों का पालन कर रहे होते हैं। होली हमें यही सीख देती है—रंग भले अलग हों पर मन एक होना चाहिए।
इस वर्ष होली को केवल परंपरा के निर्वहन तक सीमित न रखें। इसे सामाजिक परिवर्तन का अवसर बनाएं। अपने मोहल्ले, गांव या शहर में ऐसा वातावरण बनाएं, जहां हर व्यक्ति बिना भय और भेदभाव के उत्सव में भाग ले सके। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि बंधुता और भाईचारे की भावना को जीवन के हर क्षेत्र में उतारेंगे, जाति और धर्म की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठेंगे और संविधान में निहित मूल्यों को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाएंगे।
जब रंगों के साथ दिल भी मिलेंगे, तभी होली का वास्तविक अर्थ पूर्ण होगा। तभी यह पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक मजबूत, समरस और संवैधानिक भारत की ओर बढ़ता हुआ कदम बनेगा।









