एसीबी की गिरफ्तारी के बाद सरकार का आदेश, लेकिन उठे कई अहम सवाल

चंडीगढ़, 27 फरवरी 2026। हरियाणा सरकार के सहकारिता विभाग ने कैथल में तैनात सहायक रजिस्ट्रार ऋषि कुमार को निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई 26 फरवरी 2026 से प्रभावी मानी गई है और इसका आधार एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB), हरियाणा द्वारा की गई गिरफ्तारी को बताया गया है। आदेश अतिरिक्त मुख्य सचिव (सहकारिता) विजयेंद्र, आईएएस द्वारा जारी किया गया।
आदेश में क्या कहा गया है?
सरकार द्वारा जारी आदेश के अनुसार:
- गिरफ्तारी के उपरांत ऋषि कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है।
- निलंबन की पहली छह माह की अवधि में उन्हें अवकाश वेतन के बराबर निर्वाह भत्ता (Subsistence Allowance) मिलेगा।
- यदि निलंबन छह माह से अधिक चलता है, तो आगे का निर्वाह भत्ता इस शर्त पर निर्भर करेगा कि संबंधित अधिकारी यह प्रमाणित करें कि वे किसी अन्य व्यवसाय या रोजगार में संलग्न नहीं हैं।
- निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय रजिस्ट्रार, सहकारी समितियां, हरियाणा, पंचकूला कार्यालय रहेगा और बिना अनुमति मुख्यालय छोड़ने की अनुमति नहीं होगी।
पृष्ठभूमि क्या है?
हालांकि आदेश में गिरफ्तारी का जिक्र है, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि:
- गिरफ्तारी किस आरोप में हुई?
- कथित भ्रष्टाचार का मामला कितना बड़ा है?
- क्या यह व्यक्तिगत स्तर का मामला है या विभागीय स्तर पर किसी संगठित अनियमितता का हिस्सा?
- क्या इस मामले में और भी अधिकारी/कर्मचारी जांच के दायरे में हैं?
सरकार की ओर से अभी तक विस्तृत प्रेस नोट जारी नहीं किया गया है, जिससे पूरे प्रकरण पर स्पष्टता की कमी बनी हुई है।
सरकार पर उठते सवाल
1. क्या केवल निलंबन ही पर्याप्त है?
हरियाणा सरकार अक्सर भ्रष्टाचार के मामलों में “जीरो टॉलरेंस” की नीति का दावा करती रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या केवल निलंबन कर देना ही पर्याप्त कार्रवाई है? क्या विभागीय जांच की समय-सीमा तय की गई है?
2. क्या सिस्टम में गहराई तक जांच होगी?
यदि यह मामला रिश्वतखोरी या पद के दुरुपयोग से जुड़ा है, तो क्या सरकार इस बात की भी जांच करेगी कि:
- संबंधित अधिकारी किसके संरक्षण में काम कर रहे थे?
- क्या ऊपर के स्तर पर किसी प्रकार का दबाव या मिलीभगत थी?
अक्सर देखने में आता है कि छोटे या मध्यम स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई कर मामला शांत कर दिया जाता है, लेकिन सिस्टम की जड़ तक जांच नहीं पहुंचती।
3. सहकारिता विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल
सहकारिता विभाग किसानों, ग्रामीण समितियों और सहकारी बैंकों से जुड़ा महत्वपूर्ण विभाग है। ऐसे में यदि एक सहायक रजिस्ट्रार स्तर का अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार होता है, तो यह विभागीय निगरानी तंत्र की कमजोरी को भी दर्शाता है।
- क्या विभाग में नियमित ऑडिट और निरीक्षण की प्रक्रिया प्रभावी है?
- क्या शिकायतों की सुनवाई के लिए कोई पारदर्शी तंत्र है?
- क्या पहले भी इस अधिकारी के खिलाफ शिकायतें आई थीं?
4. सरकार की जवाबदेही
जनता यह जानना चाहती है कि:
- क्या इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाएगी?
- क्या जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
- क्या दोष सिद्ध होने पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होगी?
यदि सरकार पारदर्शिता के साथ पूरे मामले को सामने लाती है, तो यह “भ्रष्टाचार मुक्त शासन” के दावे को मजबूत करेगा। अन्यथा, यह मामला भी अन्य कई मामलों की तरह केवल निलंबन तक सीमित रह सकता है।









