कमलेश पांडेय

किसी भी विद्यालय, विश्वविद्यालय या अकादमिक संस्थानों में क्या पढ़ाया जाए और क्या नहीं पढ़ाया जाए, यह तय करना न्यायपालिका नहीं बल्कि शिक्षाविदों का कार्यक्षेत्र है। हाँ, यदि कोई शिक्षाविद या उनका संपादक मंडल राष्ट्र के बुनियादी संवैधानिक ढांचे को तहस-नहस करने और सद्भावी देश के सत्तागत सरोकारों और सामाजिक, सूबाई तथा राष्ट्रीय जनसरोकारों के विरुद्ध कोई लक्षित पाठ्यक्रम रचता/गढ़ता है, या किसी लेखक को ऐसा करने के लिए उत्प्रेरित/बाध्य करता है तो उन्हें अवश्य ही दंडित किया जाना चाहिए, ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लोकतांत्रिक दुरुपयोग न होने पाए।
लेकिन, दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि भारत में एनसीईआरटी जैसा प्रतिष्ठित सरकारी प्रकाशन संस्थान अपने विषयवस्तु को लेकर अक्सर विवादों के घेरे में रहता है। कतिपय अन्य जिम्मेदार संस्थाओं की भी यही नियति बन चुकी है। कुछेक फिल्मों और धारावाहिकों को लेकर भी विवाद की ऐसी ही मिलीजुली स्थिति है, जो अस्वीकार्य है। हालांकि Nope स्थिति के लिए हमारा कमजोर कानून तंत्र और बौद्धिक विषबमन निरोधक उपायों का न होना भी एक हद तक जिम्मेदार है।
कहना न होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अच्छी बात है, लेकिन जब किसी की अनर्गल अभिव्यक्ति किसी व्यक्ति, समाज, जाति, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र, लिंग और अंततोगत्वा लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए शर्म अथवा अपमान का विषय बन/हो जाए तो इसे अक्षम्य अपराध की श्रेणी में स्वतः ही डाल दिया जाना चाहिए। वहीं जब इससे सियासत शुरू हो जाए, हिंसा प्रतिहिंसा बढ़ने लगे तो फिर इसे जघन्य अपराध की श्रेणी में समाविष्ट कर दिया जाना चाहिए और निर्वाचित या पराजित राजनेताओं को भी इसमें छूट नहीं मिलनी चाहिए।
यह गम्भीर बहस का विषय है कि पहले कांग्रेस की लापरवाही से जातिवाद और सम्प्रदायिकता उफान पर आई, फिर भाजपा के कांग्रेसीकरण से भाषावाद, क्षेत्रवाद और लिंगवाद को बढ़ावा मिला। इन सबसे दो-चार कदम आगे बढ़ते हुए एनडीए की नरेंद्र मोदी सरकार के दुस्साहसी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को चुनौतियों के रूप में शामिल किया गया, जिससे विवाद उत्पन्न हो गया।

देखा जाए तो यह ‘ओबीसी राजनीति’ की कुंठा है जो न्यायपालिका पर काबिज नहीं हो पाई तो उसे बदनाम करने की घिनौनी चाल चल दी। यदि सरकार को भ्रष्टाचार की इतनी ही चिंता है तो विधायिका के भ्रष्टाचार, कार्यपालिका के भ्रष्टाचार, मीडिया के भ्रष्टाचार और सिविल सोसायटी के भ्रष्टाचार को भी इसी के साथ समाविष्ट किया जाना चाहिए था। यदि ऐसा होता तो न्यायपालिका को भी कुछ कहने का मौका नहीं मिलता।
दिलचस्प बात तो यह है कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इसे संस्था की गरिमा पर ठेस बताते हुए स्वतः संज्ञान लिया। इसके दृष्टिगत विवाद का कारण यह है कि विषयवस्तु की सामग्री लंबित मामलों (सुप्रीम कोर्ट में 81,000+, हाईकोर्ट में 62 लाख+), जजों की कमी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर केंद्रित थी, जिसमें शिकायत तंत्र और महाभियोग प्रक्रिया का भी उल्लेख था।
इस अध्याय में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, शिकायत निवारण तंत्र (जैसे महाभियोग प्रक्रिया) और सुधारों पर जोर दिया गया था, जो वास्तविक आंकड़ों पर आधारित था। यह हिस्सा भ्रष्टाचार को एक समस्या के रूप में सूचीबद्ध करता था, बिना विशिष्ट आरोप लगाए। सटीक पाठ के अनुसार, “न्यायपालिका में विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार” और “मामलों का भारी बैकलॉग” जैसे वाक्य थे, जो संस्था की कमियों को बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से जोड़े गए। यह सामान्यीकृत था, लेकिन सीजेआई ने इसे बदनामीपूर्ण माना।
चूंकि कद्दावर वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में इसे उठाया, और यह सवाल करते हुए कि अन्य संस्थाओं (जैसे नौकरशाही, राजनीति) पर क्यों नहीं?यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट की सधी प्रतिक्रिया आई। खुद सीजेआई ने कहा कि वे किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की अनुमति नहीं देंगे और उचित कदम उठाए जाएंगे; इससे कई हाईकोर्ट जज भी चिंतित बताए गए। उन्होंने इसे “सोची-समझी योजना” का हिस्सा बताया।
वहीं, सहयोगी जज ने इसे संविधान की मूल संरचना के विरुद्ध माना। अधिवक्ता सिब्बल द्वारा इस मामले को उठाए जाने पर उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाते हुए संस्था का बचाव किया। यह बयान 24-25 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में आया। यह बात अलग है कि विवाद के बाद एनसीईआरटी ने विवादित सामग्री पुस्तक की वेबसाइट से हटा दी, माफी मांगी और बिक्री पर रोक लगाई; साथ ही विवादित हिस्सा हटाने की भी योजना है। हैरत की बात है कि तथाकथित 57 विशेषज्ञों ने इसे मंजूर किया था, लेकिन अब सुधार पर विचार किया जाएगा। इससे उनकी योग्यता और चयन पर भी सवाल उठना लाजिमी है।

इस पूरे घटनाक्रम के मायने और प्रभाव स्पष्ट हैं। भले ही यह घटना शिक्षा में पारदर्शिता लाने की कोशिश को दर्शाती है, लेकिन न्यायपालिका की संवेदनशीलता उजागर करती है, जो संस्थागत गरिमा बनाम जवाबदेही के बीच संतुलन पर बहस छेड़ सकती है। यद्यपि यह बच्चों को वास्तविक चुनौतियां सिखाने का प्रयास था, पर इससे जो राजनीतिक-न्यायिक तनाव बढ़ा, उससे शिक्षा का मूल उद्देश्य बहुत पीछे छूट गया।
बताया जाता है कि एनसीईआरटी कक्षा 8 की किताब के विवादित अध्याय पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक कोई औपचारिक फैसला या आदेश जारी नहीं किया है। सिर्फ मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कड़ी आपत्ति जताई और इसे न्यायपालिका को बदनाम करने वाली “सोची-समझी योजना” बताया। सीजेआई ने कहा कि वे किसी को भी संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाने की अनुमति नहीं देंगे, और हाईकोर्ट जजों समेत कई पक्षों से शिकायतें मिली हैं।
वहीं, प्रतिष्ठित वकीलों कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा उठाए जाने पर कोर्ट ने उचित कदम उठाने का संकेत दिया। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश या रोक नहीं लगाई, लेकिन विवाद के बाद एनसीईआरटी ने खुद पुस्तक हटा ली, माफी मांगी और हिस्सा संशोधित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। मामला अभी विचाराधीन बना हुआ है, बिना अंतिम फैसले के।
चूंकि NCERT की किताबों के कंटेंट को लेकर पहले भी विवाद हो चुके हैं, लेकिन इस बार मामला न्यायपालिका से जुड़ा है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि देश-दुनिया में भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल की इसी महीने जारी हुई रिपोर्ट के मुताबिक, करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 182 देशों के बीच भारत की रैंक 91 है। पिछले साल के मुकाबले देश ने 5 स्थान का सुधार जरूर किया, पर भ्रष्टाचार अब भी बड़ी समस्या है।
समझा जाता है कि इसकी वजह से तमाम सरकारी योजनाएं और नीतियां अपना असर खो देते है और आम लोगों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। हालांकि जब बात जूडिशरी की आती है, तो भावनाएं बदल जाती है। यह आम धारणा है कि जब तमाम उम्मीदें कमजोर हो जाती है, तब अदालतों से आस जगती है। लेकिन, इस भरोसे की कुछ कीमत भी है, जो है पारदर्शिता व जवाबदेही। भले ही कोई भी सिस्टम करप्ट नहीं होता, लेकिन उसे चलाने वाले चंद लोग ही होते हैं जो उसे करप्ट बना देते हैं।
लिहाजा देश की न्यायिक व्यवस्था को भी इस मामले में कुछ तल्ख सवाल झेलने पड़े है। बीते वर्ष मार्च में ही जस्टिस यशवंत वर्मा के करप्शन का मामला सुर्खियों में बना रहा और अभी तक यह अंजाम तक नहीं पहुंचा है। जबकि दिसंबर 2025 में ही सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई थी कि करियर के आखिरी में बड़े फैसले देने का ट्रेंड बढ़ रहा है। जरूरी नहीं कि करप्शन पैसों का ही हो। वह नैतिक भी हो सकता है।
यह ठीक है कि अदालतें भरोसे का नाम हैं, पर यह भी उतना ही सच है कि आम आदमी अदालतों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता। मुकदमे सालों-साल चलते रहते हैं और ज्यादा खर्चीले हैं। न्याय काफी महंगा हो चुका है। विभिन्न अदालतों में लगभग 4.9 करोड़ केस लंबित (पेंडिंग) हैं। जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक- न्यायाधीशों के तमाम पद खाली है, जिससे न्याय की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है। वहीं, अब चुनावी कार्यों में भी उनकी जिम्मेदारी बढ़ी है।
भारतीय न्यायपालिका की इस मायने में तारीफ होनी चाहिए कि पारदर्शिता के लिए वह खुद पहल करती है। पिछले साल मई में शीर्ष अदालत के न्यायधीशों ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने पर सहमति जताई थी। इसने न्यायपालिका की गरिमा को और बढ़ा दिया। सुप्रीम कोर्ट को फिर उसी तरह की पहल करते हुए कोई रास्ता निकालना चाहिए।
इस विवाद में सबक एनसीईआरटी के लिए भी है कि केवल एक ही संस्था पर बात क्यों, जबकि करप्शन देश की सबसे बड़ी आम समस्या है। चूंकि राजनीतिक भ्रष्टाचार और अनैतिक व्यवहार पर न्यायपालिका अमूमन खामोश रहती आई है, इसलिए सियासत की जद में उसे आज नहीं तो कल आना ही पड़ेगा! उसमें शीर्ष पदों पर दलित-पिछड़े की गुंजाइश बनानी ही पड़ेगी! तब तक लक्षित सरकारी प्रहार किसी न किसी रूप में चलते रहेंगे, जो राष्ट्रीय शर्म की बात है।







