विदेश भेजने की होड़ और बदलती मानसिकता

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क्या सचमुच भारत में अवसर कम हैं या हम एक भ्रम में जी रहे हैं?

डॉ. प्रियंका सौरभ

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय समाज में एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है—बेटे-बेटियों को विदेश भेजने की होड़। कभी पढ़ाई के नाम पर, कभी नौकरी के नाम पर, तो कभी बेहतर जीवन के सपने के साथ। कई परिवारों में यह एक उपलब्धि की तरह प्रस्तुत किया जाता है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। किसी का कनाडा जाना, किसी का ऑस्ट्रेलिया या यूरोप जाना—यह सब मानो सफलता की पहचान बन गया है। धीरे-धीरे यह धारणा बनती जा रही है कि यदि भविष्य बनाना है तो विदेश जाना ही पड़ेगा।

लेकिन यह सवाल गंभीरता से पूछने की जरूरत है कि क्या वास्तव में भारत में अवसरों की कमी है। क्या इस देश में प्रतिभा के लिए जगह नहीं बची? या फिर हम स्वयं अपने देश की संभावनाओं को कम आंकने लगे हैं?

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। तकनीक, उद्योग, सेवा क्षेत्र, स्टार्टअप, शिक्षा और शोध के क्षेत्र में लगातार नए अवसर पैदा हो रहे हैं। दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भारत में निवेश कर रही हैं। लाखों युवाओं को रोजगार मिल रहा है। छोटे शहरों और कस्बों से निकलकर युवा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं। ऐसे में यह मान लेना कि भविष्य केवल विदेश में ही है, एक अधूरी और जल्दबाजी वाली सोच लगती है।

विदेश जाने की एक बड़ी वजह शिक्षा भी है। कई छात्र यह सोचकर विदेश जाते हैं कि वहाँ की पढ़ाई बेहतर है या वहाँ अवसर अधिक हैं। कुछ मामलों में यह सही भी हो सकता है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि कई छात्र केवल इसलिए विदेश चले जाते हैं क्योंकि उन्हें भारत में मनचाहे कॉलेज या कोर्स में प्रवेश नहीं मिल पाता। प्रतियोगिता कठिन है, सीटें सीमित हैं, और हर किसी को प्रतिष्ठित संस्थानों में जगह नहीं मिल पाती। ऐसे में विदेश जाना एक विकल्प बन जाता है। लेकिन इस विकल्प को सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बना देना चिंताजनक है।

आज स्थिति यह हो गई है कि कई जगहों पर माता-पिता अपने बच्चों को विदेश भेजने को लेकर एक तरह का दबाव महसूस करते हैं। रिश्तेदारों, परिचितों और समाज के बीच यह दिखाने की कोशिश होती है कि उनका बच्चा विदेश में पढ़ रहा है या काम कर रहा है। कई बार परिवार अपनी आर्थिक स्थिति से ज्यादा खर्च उठाकर भी बच्चों को विदेश भेज देते हैं। शिक्षा ऋण, कर्ज और आर्थिक बोझ के बावजूद यह निर्णय केवल इसलिए लिया जाता है क्योंकि समाज में इसे प्रतिष्ठा से जोड़ दिया गया है।

सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ाया है। इंटरनेट पर विदेश में रहने वाले युवाओं की चमकदार तस्वीरें दिखाई देती हैं—खूबसूरत शहर, शानदार जीवनशैली, घूमना-फिरना, नए अनुभव। लेकिन इन तस्वीरों के पीछे का संघर्ष अक्सर दिखाई नहीं देता। विदेश में जीवन आसान नहीं होता। वहाँ भी कठिन परिश्रम करना पड़ता है, अकेलेपन का सामना करना पड़ता है और कई बार ऐसे काम भी करने पड़ते हैं जिनकी कल्पना भारत में रहते हुए नहीं की जाती। लेकिन यह सच्चाई अक्सर तस्वीरों और वीडियो के पीछे छिप जाती है।

समस्या विदेश जाने में नहीं है। समस्या उस मानसिकता में है जिसमें विदेश को सफलता का पर्याय बना दिया गया है। दुनिया को देखने, नई शिक्षा और अनुभव प्राप्त करने के लिए विदेश जाना एक अच्छा अवसर हो सकता है। कई भारतीय छात्र विदेश में उच्च शिक्षा लेकर नई तकनीक और ज्ञान प्राप्त करते हैं और बाद में देश के विकास में योगदान भी देते हैं। लेकिन जब यह निर्णय समझदारी के बजाय भीड़ का हिस्सा बनकर लिया जाता है, तब कई बार परिणाम निराशाजनक भी हो सकते हैं।

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा वर्ग है। आज का युवा पहले से अधिक जागरूक, शिक्षित और तकनीक से जुड़ा हुआ है। स्टार्टअप संस्कृति तेजी से बढ़ रही है। छोटे शहरों के युवा भी बड़े सपने देख रहे हैं और उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। डिजिटल युग में अवसरों की सीमाएँ पहले जैसी नहीं रहीं। आज भारत में बैठकर भी दुनिया के साथ काम किया जा सकता है।

जरूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों को सक्षम बनाएं। उन्हें ऐसी शिक्षा दें जो उन्हें आत्मनिर्भर बनाए, उनमें कौशल विकसित करे और जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति दे। अगर युवा योग्य होंगे तो उन्हें अवसर कहीं भी मिल सकते हैं—भारत में भी और विदेश में भी। लेकिन यदि केवल स्थान बदलने से सफलता की उम्मीद की जाएगी, तो यह सोच लंबे समय तक टिक नहीं पाएगी।

समाज को भी अपनी सोच पर विचार करने की आवश्यकता है। विदेश जाना न तो असंभव उपलब्धि है और न ही सफलता का एकमात्र रास्ता। उसी तरह भारत में रहना असफलता नहीं है। हमारे देश ने हर क्षेत्र में प्रतिभाएँ दी हैं—विज्ञान, साहित्य, खेल, राजनीति, उद्योग और तकनीक में। दुनिया के कई बड़े मंचों पर भारतीय अपनी पहचान बना चुके हैं। यह सब यहीं से शुरू हुआ है।

एक और चिंता का विषय प्रतिभा का देश से बाहर जाना भी है। कई वर्षों तक “ब्रेन ड्रेन” की चर्चा होती रही है। हालांकि अब स्थिति बदल रही है और कई लोग विदेश से अनुभव लेकर वापस भी लौट रहे हैं। फिर भी यह जरूरी है कि देश का युवा अपने देश की संभावनाओं पर विश्वास बनाए रखे। अगर योग्य लोग ही देश से दूर चले जाएंगे, तो विकास की गति भी प्रभावित हो सकती है।

माता-पिता, शिक्षक और समाज—तीनों की भूमिका यहाँ महत्वपूर्ण है। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि सफलता किसी देश की मोहताज नहीं होती। असली पहचान मेहनत, ज्ञान और चरित्र से बनती है। विदेश जाना यदि शिक्षा और अनुभव के लिए है तो यह अच्छी बात है, लेकिन केवल दिखावे या सामाजिक दबाव के कारण लिया गया निर्णय कई बार भारी पड़ सकता है।

आज जरूरत है संतुलित सोच की। हमें अपने युवाओं को यह बताना होगा कि दुनिया खुली है, अवसर हर जगह हैं, लेकिन अपने देश की ताकत और संभावनाओं को कम नहीं आंकना चाहिए। भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि संभावनाओं की एक विशाल भूमि है। यहाँ चुनौतियाँ भी हैं और अवसर भी। फर्क केवल दृष्टिकोण का है।

अगर हम अपने बच्चों को योग्य, आत्मविश्वासी और मेहनती बनाएँगे, तो उन्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता—चाहे वे भारत में रहें या विदेश जाएँ। लेकिन यदि हम केवल भीड़ का हिस्सा बनकर निर्णय लेते रहेंगे, तो शायद हम अपने ही आत्मविश्वास को कमजोर करते रहेंगे।

विदेश जाना विकल्प हो सकता है, लेकिन लक्ष्य नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए—योग्यता, आत्मनिर्भरता और सार्थक जीवन। जब यह सोच समाज में मजबूत होगी, तब शायद विदेश भेजने की अंधी दौड़ अपने आप धीमी पड़ जाएगी।

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Author: Bharat Sarathi

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