देश की राजधानी दिल्ली बनी गुमशुदगी का हॉटस्पॉट – हर एक घंटे दो इंसान हो रहे गायब

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संजय रोकड़े

दिल्ली देश की राजधानी है। हमारे देश का चौकीदार भी इसी शहर में रहता है। जिस शहर में किसी देश का चौकीदार निवासरत हो वो भी राष्ट्रवादी विचारधारा से सराबोर, ऐसे चौकीदार के राज में तो दिल्ली का क्या पर देश के हर अंचल का नागरिक खुद को महफूज समझेगा। सुरक्षित मानेगा।

पर जनाब ऐसा हरगिज नहीं  है। हमारे इस चौकीदार की छत्रछाया में दिल्ली तो क्या, हर राज्य का इंसान खासकर जवान लड़कियां और महिलाएं किसी भी कीमत पर सुरक्षित नहीं  है। अब आप कहेंगे ये तो कोई बात नही हुई। इतने कर्मशील और महान प्रधान सेवक के राज में क्या किसी प्रकार से कानूनी अराजकता का बोलबाला हो सकता है। गर ये बात किसी अंधभक्त से पूछी जाएगी तो यकीनन नहीं ।

बहरहाल, इस मामले मैं आपको दिल्ली के कुछ आंकड़ों से रूबरू कराता हूं। ये वही डऱावने और भयावह आंकड़ें है जो हमारे चौकीदार की नागरिक सुरक्षा की तमाम बड़ी- बड़ी बातों को खुलेआम धत्ता बताते है। आप इन आंकड़ों को सच माने या न माने लेकिन हमारे चौकीदार की नाक के नीचे दिल्ली जैसे शहर से हर एक घंटे में दो लोग गायब हो रहे है। इसके चलते दिल्ली इस समय गुमशुदगी का हॉटस्पॉट बन गई है।

दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार 1 से 15 जनवरी 2026 के बीच दिल्ली से कुल 807 लोग लापता हो चुके है। लापताओं में 509 महिलाएं है जबकि इन लापताओं में एक-तिहाई नाबालिग हैं। क्या आपको नही लगता है कि साल 2026 के शुरुआती पंद्रह दिन के अंदर ही 800 से अधिक इंसानों का लापता हो जाना न केवल चौंकाने वाली बात है बल्कि, यह राष्ट्रीय राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गहरी चिंता भी पैदा करती है। ये स्थिति हर उस शहर के लिए गंभीर सवाल खड़े करती है, जहां पहले से ही कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ढुलमुल रवैया रहा है।

गुमशुदगी के ये जो आंकड़े सामने आए है इनका मतलब साफ है, हर दिन औसतन 54 दिल्लीवासी करीब- करीब हर घंटे में दो लोग गायब हो रहे हैं। गायब होने वालों में महिलाओं और बच्चों की बढ़ती संख्या ने मानव तस्करी, अपहरण और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संकटों की आशंका को गहरा दिया है। सच कहें तो ये आंकड़े केवल सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा भर नहीं हैं बल्कि सैकड़ों परिवारों का रूदन है। अपनों के बिछडऩे का असहनीय दर्द है। समाज में बढ़ती अराजकता और असुरक्षा की परतों का खुलासा है।

गर हम दिल्ली पुलिस की दलील को माने तो 807 लापता में 191 नाबालिग हैं। इनमें 146 लड़कियां और 45 लडक़े हैं। पुलिस के अनुसार इन मामलों में करीब 71 प्रतिशत का अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है। आठ से बारह वर्ष की उम्र के 13 बच्चे और आठ वर्ष से कम उम्र के 9 बच्चे भी 1 से 15 जनवरी 2026 के बीच लापता हुए हैं।

अब तक केवल 235 लोगों का ही पता लगाया जा सका है जबकि 3 फरवरी तक 572 लोग ऐसे थे जिनके बारे में पुलिस के पास कोई ठोस जानकारी नहीं थी। दिल्ली से लोगों के गायब होने का ये जो सिलसिला बना हुआ है, ये सिर्फ और सिर्फ देश के प्रधानसेवक की भारत के नागरिकों की सुरक्षा को लेकर जुमलेबाजी को ही दर्शाते है। ये आकड़े दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की नाकामयाबी का भी आईना है। आंकड़ें इन दोनों जिम्मेदारों की अगंभीरता को ही उजागर करते है।

दिल्ली तो दिल्ली इस तरह की भयावह तस्वीर झारखंड से भी सामने आ रही है। यहां से भी बड़ी संख्या में बच्चे गायब हो रहे हैं। बच्चे कहां गायब हो रहे है। क्यूं गायब हो रहे है। इसका संतुष्टिजनक जवाब किसी के पास नही है। झारखंड में ऐसे अनेक परिवार हैं जिनके लडक़े-लड़कियां निजी प्लेसमेंट एजेंसियों या बाहर काम दिलाने वाले कथित एजेंटों के बहकावे में आकर अपने परिवार से दूर हो गए है। अब वे कहां हैं, किसी को कुछ पता नहीं है।

पहले इस काम में रांची, खूंटी, गुमला जैसे जिलों के बच्चे निशाने पर होते थे, अब यह सिंहभूम और संथाल जैसे इलाके में शिफ्ट हो गया है। इस इलाके की पहाडिय़ा, संथाली आदिवासी लड़कियों का बाहर जाना और फिर वापस लौट कर नहीं आना, आम बात हो गई है।

दरअसल, गुमशुदगी का ये आलम दिल्ली और झारखंड तक ही सीमित नही है  बल्कि देश के दूसरे हिस्सों से भी बड़ी  संख्या  में युवतियां, महिलाएं, बच्चे और पुरूष लापता हो रहे है। देश के कौन- कौन से राज्यों से कितने लोग गायब हो रहे है, इनके आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो याने एनसीआरबी की सालाना रिर्पोट से मिलते रहते है।

सनद रहे कि दिल्ली और झारखंड़ से लापता लोगों की समस्या अनेक वर्षों से चिंता का सबब बनी हुई है। दिल्ली से बीते साल यानी 2025 में कुल 24,508 लोग लापता हुए थे। इनमें 14,870 यानी 60 फीसदी से अधिक महिलाएं थी। वर्ष 2024 में लापता नाबालिगों की संख्या 5,846 थी जबकि 2023 में यह आंकड़ा 6,284 था। बीते दस वर्षों में दिल्ली से करीब 2. 51 लाख लोग गायब हो चुके है जबकि करीब 52,000 लोगों का आज तक कोई पता नहीं चल सका है।

इधर, झारखंड में साल 2024 में कुल 282 लोग तस्करी के शिकार हो चुके है। इनमें 18 साल से कम उम्र के 163 लडक़े है और 53 लड़कियां शामिल हैं। यहां से 2025 में अप्रैल तक कुल 64 नाबालिग तस्करी के शिकार हो चुके हैं।

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2023 में पूरे भारत में करीब 8.68 लाख लोग लापता हुए थे। 2023 की रिपोर्ट की माने तो भारत में लापता महिलाओं में से करीब 20 से 25 प्रतिशत महिलाएं मानव तस्करी का शिकार होती हैं। दिल्ली में प्रवासी आबादी बड़ी संख्या में रहती है और इन्हीं समुदायों से गुमशुदगी के मामले अधिक दर्ज होते है। पुलिस अफसरों के अनुसार नेपाल और बांग्लादेश से जुड़े अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क दिल्ली और झारखंड़ को अपना हब बनाते हैं। रिपोर्ट में इस बात को भी साफ जाहिर किया गया कि दिल्ली जैसे बड़े शहरी केंद्रों में यह समस्या अधिक गंभीर है।

बीती 3 जुलाई को तमिलनाडु के सेलम रेलवे स्टेशन पर रेलवे पुलिस को नाबालिग बच्चियों का एक झुंड दिखा था। इनमें पांच नाबालिग झारखंड की थी। ये सब एक स्थानीय दलाल के संपर्क में आईं थी, जिसने इन्हें सेलम में काम दिलाने का वादा किया था। तब पुलिस ने उन्हें स्थानीय शेल्टर होम को सौंप दिया था और बीते 9 सितंबर को सभी को वापस झारखंड़ भेज दिया था।

अब लाख टके का सवाल यही उठ रहा है कि  इतनी बड़ी संख्या में बच्चे गायब कैसे हो रहे है। क्यों इतने लोग लापता हो रहे है। इस संदर्भ में सामाजिक कार्यकर्ताओं और पुलिस अफसरों की माने तो इसके पीछे एक नही बल्कि अनेक कारण होते है। इनके अनुसार मौसमी पलायन, आर्थिक दबाव, बेरोजगारी, पारिवारिक विवाद, घरेलू शोषण, मानव तस्करी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं होती है। महिलाओं और लड़कियों के मामले में घरेलू हिंसा, प्रेम प्रसंग में भागना और ट्रैफिकिंग भी बड़ा कारण होता है। ये सब वही कारण है जो गुमशुदगी के मामलों को बढ़ाने के वाहक बनते है।

अब सवाल ये भी खड़ा होता है कि इतनी स्पष्ट जानकारी होने के बावजूद पुलिस इन मामलों को प्रभावी ढंग से रोक क्यों नहीं पा रही? इस पर पुलिस अधिकारियों का कहना होता है कि आबादी के हिसाब से प्रभावी पुलिसिंग के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं होते है। बावजूद इसके पुलिस इस दिशा में अच्छा काम करने की दलील देती है। साल के शुरुआती 15 दिनों में लोगों के गायब होने के आंकड़ों का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस कहती है कि  इनमें से तकरीबन 30 प्रतिशत का पता पुलिस ने लगा लिया है।

ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग के लिए सेंट्रलाइज्ड सिस्टम विकसित कर लिया है। इसके चलते इन मामलों की ट्रैकिंग आसान हुई है। स्पेशल सेल और एंटी-ट्रैफिकिंग यूनिट भी तुरंत सक्रिय होती है। इंटर-स्टेट कोऑर्डिनेशन को भी बेहतर बनाया है। दिल्ली सरकार स्तर पर दिल्ली महिला आयोग और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी भी इस काम में सक्रिय है।

ठीक इसी तरह गुमशुदा लडकियों को बचाने के काम में झारखंड़ और दूसरे अंचल की संस्थाएं भी सक्रिय रूप से संलग्न है। झारखंढ़ के मामले में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के पासआउट रवींद्र कुमार का काम बेहद सराहनीय है। कभी बाल मजदूर रह चुके बैद्यनाथ कुमार भी अब तक 5 हजार से अधिक बच्चों को सुरक्षित बरामद करवा चुके है।

काबिले गौर बात ये है कि बच्चों की बरामदगी के लिए सुप्रीम कोर्ट में वाराणसी के गुडिय़ा स्वयंसेवी संस्थान ने भी एक पीआइएल दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए बीते 24 सितंबर को कोर्ट ने कहा कि इसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय की देखरेख में एक साझा पोर्टल बनाना चाहिए। साल 2016 में झारखंड निजी नियोजन अभिकरण और घरेलू कामगार अधिनियम बनाया गया था ताकि दलालों और प्लेसमेंट एजेंसियों पर लगाम लग सके। मगर आलम देखिए कि इस अधिनियम का अब तक कोई असर नही है।

इन सबके बावजूद आंकड़े यही संकेत देते हैं कि मौजूदा प्रयास दिल्ली और झारखंड़ में बढ़ती गुमशुदगी की समस्या को रोकने के लिए फिलहाल नाकाफी साबित हो रहे हैं। लापता होती युवतियां, महिलाएं, बच्चे और लोग केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं हैं, बल्कि यह एक गंभीर ग्रामीण और शहरी संकट है। गुमशुदगी के ये मामले हमारी असमानताओं, सामाजिक असुरक्षा, अपर्याप्त संसाधनों, कमजोर सहायता प्रणालियों और बढ़ते मानवीय जोखिमों की एक गहरी तस्वीर भी पेश करते है।

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Author: Bharat Sarathi

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