आखिर जातीय, धार्मिक व क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने वाली लोकतांत्रिक प्रवृत्ति पर कैसे पाएंगे काबू?

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कमलेश पांडेय

दुनिया को ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का संदेश देने वाला जनतांत्रिक भारत आज जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने वाली ‘ब्रितानी’ व ‘मुगलिया’ सियासत के चक्रव्यूह में फंसा पड़ा है। इससे ‘सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया’ जैसी उसकी उदात्त सोच भी  कठघरे में खड़ी प्रतीत हो रही है। यहां की प्रतिभाशाली और प्रभुत्ववाली सामान्य जातियों (सवर्णों) के खिलाफ देश में जो लक्षित पूर्वाग्रही राजनीति कथित दलित-ओबीसी नेताओं के द्वारा की जा रही है, उससे देश व समाज के सामने विभिन्न नैतिक व वैधानिक सवाल उठ खड़े हुए हैं! 

हैरत की बात है कि सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की जगह बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय के नारे लगाए जाते हैं। कहीं जाति, कहीं धर्म और कहीं भाषा-क्षेत्र के नाम पर लोगों के उत्पीड़न हो रहे हैं। वहीं कहीं सामाजिक न्याय आधारित आरक्षण और साम्प्रदायिक सोच आधारित अल्पसंख्यकवाद के अव्यवहारिक पहलुओं को हवा देकर आमलोगों को उल्लू बनाया जा रहा है। आलम यह है कि ऐसे करने वाले नेता, उनके हमकदम मस्त हैं जबकि आमलोग त्रस्त हैं। 

हद तो यह कि हमारे संविधान के संरक्षक अनर्गल दलीलें देकर मानवता का गला घोंट रहे हैं जबकि यही प्रवृत्ति कतिपय संविधान निर्माताओं में भी दिखी थी। वहीं आज के कथित रखवाले जन्मांध ‘धृतराष्ट्र’ की भूमिका निभा रहे हैं। इनके जैसे ही नेताओं की खामोशी से जहां 1947 में साम्प्रदायिक विभाजन हुआ, वहीं इनके षडयंत्र से आजादी के बाद से ही जातीय, क्षेत्रीय व नवसंप्रदायिक विभाजन की प्रवृत्ति हावी होती दिख रही है, जो आज भी जारी है। ऐसे में एक और महाभारत छिड़ना तय है। पुनः विभाजन होना तय है। इतिहास साक्षी है कि जब कभी भी महाभारत होता है तो संख्याबल पर बुद्धिबल ही भारी पड़ती है और आगे भी यही होगा। 

कहना न होगा कि कोई भी लोकतंत्र स्वतंत्रता, समानता व बन्धुत्व की बुनियाद पर मजबूत होता है, लेकिन जब बहुमत की सियासी शरारत शुरू हो जाए और वामपंथियों के वर्गवादी राजनीति को मात देने के लिए पूंजीवादी प्रभाव वश जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र की सियासत तेज हो जाए तो देर सबेर राष्ट्र राज्य का बिखरना तय होता है। इसलिए इनसे जुड़े राजनीतिक हथकंडों और उन्हें शह देने वाले संवैधानिक प्रावधानों को यदि समय रहते ही नहीं बदला गया तो बाद में इन्हें नियंत्रित करना आसान नहीं होगा!

ऐसा इसलिए कि जातिवादी कैंसर, सांप्रदायिक एड्स और क्षेत्रवादी तपेदिक (टीबी) से शांतिप्रिय व सहनशील भारतीय समाज सदियों से ग्रसित है लेकिन बीती सदी में इन्हें एक कानूनी स्वरूप देकर स्थिति को जटिल चुनौती बना दी गई है। किसी समूह के इतिहास को साक्षी मानकर उनके वर्तमान को रौंदने की जो सियासी प्रवृत्ति भारत में हावी है, उससे सामान्य व कथित सवर्ण जातियों में भारी रोष व्याप्त है। 

इसलिए समावेशी संवैधानिक प्रावधानों, हिंसा-प्रतिहिंसा पर समान कानूनी सख्ती और सामाजिक जागरूकता के संयोजन से ही अब इस जटिल स्थिति से निबटना संभव है, लेकिन हमारी सियासी सोच इसके विपरीत है। वह आज भी विदेशी फूट डालो, शासन करो पर केंद्रित है। लिहाजा, कतिपय कानूनी उपाय अपेक्षित हैं। पहले चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों और नेताओं के भाषणों पर सख्त निगरानी रखनी चाहिए, तथा IPC की धारा 153A (समूहों के बीच शत्रुता फैलाना), 295A (धार्मिक भावनाएं ठेस पहुंचाना) और प्रतिनिधित्व ऑफ पीपल एक्ट की धारा 123(3) के तहत तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही मौजूदा कानूनों को और सख्त बनाकर, जैसे नफरत भरी भाषा पर त्वरित गिरफ्तारी और पार्टी मान्यता रद्द करने का प्रावधान जोड़ना, ऐसे हथकंडों पर अंकुश लग सकता है।

लगे हाथ संस्थागत सुधार के लिए भी समवेत कदम उठाने होंगे। खासकर राजनीतिक दलों को टिकट वितरण और मंत्रिमंडल गठन में जाति-धर्म आधारित समीकरणों से ऊपर उठना होगा, जबकि चुनाव सुधारों के जरिए आंतरिक लोकतंत्र सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, सोशल मीडिया पर घृणा फैलाने वाले एआई-जनरेटेड कंटेंट और प्रचार पर सख्त नियंत्रण लगाया जाए, जैसा कि हालिया चुनावी दौर में देखा गया।

वहीं, सामाजिक व शैक्षिक प्रयास से भी इस स्थिति से निबटा जा सकता है। विशेषकर शिक्षा प्रणाली में समावेशी पाठ्यक्रम लागू कर नई पीढ़ी को जाति-धर्म से ऊपर उठने की प्रेरणा दी जाए, तथा धर्मगुरुओं और सामाजिक नेताओं पर निगरानी रखी जाए। मतदाताओं को जागरूक अभियान चलाकर वोटिंग में योग्यता और नीतियों को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, ताकि विभाजनकारी रणनीतियां अप्रभावी हो जाएं।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी दो टूक शब्दों में कहा है कि राजनीतिक नेताओं को देश में भाईचारा बढ़ाने का काम करना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि राजनीतिक नेताओं को देश में भाईचारा बढ़ाने का काम करना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि गाइडलाइन बनने पर भी उनका पालन कौन करेगा क्योंकि भाषण विचारों से उत्पन्न होते हैं और इन्हें नियंत्रित करना कठिन है। कोर्ट ने संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने पर जोर दिया, साथ ही राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी पर भी इशारा किया। 

जस्टिस बागची ने कहा कि हेट स्पीच पर पहले से सिद्धांत बने हैं, लेकिन आदेश लागू करना चुनौतीपूर्ण है। कोर्ट ने जहरीले सामाजिक माहौल की चिंता स्वीकारी, लेकिन चुनिंदा नेताओं को टारगेट करने के बजाय व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की नसीहत दी। दरअसल याचिकाकर्ताओं ने नेताओं और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के भाषणों को हेट स्पीच से रोकने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाने की मांग की थी। 

याचिका में दो प्रमुख दिशानिर्देश मांगे गए थे। पहला, संवैधानिक पदों या सार्वजनिक कार्यालयों पर बैठे लोगों के भाषण संवैधानिक नैतिकता के अधीन हों और दूसरों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करें। दूसरा, इन पदधारकों के सार्वजनिक भाषणों को नियंत्रित करने के लिए बिना पूर्व सेंसरशिप के दिशानिर्देश जारी किए जाएं ताकि संवैधानिक मूल्यों का पालन सुनिश्चित हो। 

उल्लेखनीय है कि यह जनहित याचिका 12 पूर्व नौकरशाहों, राजनयिकों और सिविल सोसायटी सदस्यों द्वारा दायर की गई थी। इसमें असम सीएम हिमंत बिस्व सरमा, उत्तराखंड सीएम पुष्कर सिंह धामी, उत्तर प्रदेश सीएम योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं के कथित नफरती बयानों का हवाला दिया गया। हालांकि कोर्ट ने इसे पक्षपाती मानते हुए नई व्यापक याचिका दायर करने को कहा जिसमें अन्य नेताओं की टिप्पणियों का भी उल्लेख हो।

बता दें कि गत 16 फरवरी 2026 को चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस जयमाल्य बागची की बेंच ने रूप रेखा वर्मा समेत 12 याचिकाकर्ताओं की याचिका पर विचार किया जिसमें नेताओं और मीडिया के लिए हेट स्पीच व भाषणों पर दिशानिर्देश बनाने की मांग थी, खासकर असम सीएम हिमंत बिस्व सरमा के कथित बयानों के संदर्भ में लेकिन कोर्ट ने मौजूदा याचिका पर सुनवाई से इनकार कर नई याचिका दायर करने को कहा।

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Author: Bharat Sarathi

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