वानप्रस्थ में ‘अमेरिका–ईरान संघर्ष का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव’ विषय पर गोष्ठी आयोजित

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हिसार, 9 जुलाई। वानप्रस्थ सीनियर सिटीज़न क्लब में अमेरिका–ईरान संघर्ष और उसके भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के वैश्विक तथा भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए क्लब के महासचिव डॉ. जे. के. डांग ने उपस्थित सदस्यों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका–ईरान तनाव केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया, विशेषकर ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों जैसे भारत, पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महँगाई, व्यापार, निवेश तथा आर्थिक विकास जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का सीधा असर पड़ता है, इसलिए ऐसे विषयों पर जागरूकता और गंभीर विमर्श आवश्यक है।

मुख्य वक्ता एवं दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम के पूर्व मुख्य संचार अधिकारी धर्मपाल ढुल ने कहा कि अमेरिका–ईरान संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न अनिश्चितताओं ने भारत के सामने गंभीर आर्थिक चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ता है, जिससे तेल एवं गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति संबंधी संकट की आशंका बढ़ जाती है।

उन्होंने कहा कि भारत अपनी कुल पेट्रोलियम आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है तथा आयातित कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। इसके अलावा एलपीजी, प्राकृतिक गैस, उर्वरक और अन्य आवश्यक खनिजों की आपूर्ति भी काफी हद तक इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। ऐसी स्थिति का प्रभाव विनिर्माण, कृषि, परिवहन, नागरिक उड्डयन, काँच उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण तथा विद्युत उत्पादन सहित अनेक क्षेत्रों पर पड़ सकता है।

धर्मपाल ढुल ने कहा कि सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने और संभावित मूल्यवृद्धि के प्रभाव को कम करने के लिए कई नीतिगत और वित्तीय कदम उठाए हैं। इसके बावजूद रुपये की विनिमय दर, विदेशी मुद्रा भंडार और आयात लागत पर दबाव बना हुआ है। उन्होंने दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, रणनीतिक भंडारण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

चर्चा में भाग लेते हुए एस. एस. लाठर ने अमेरिका–ईरान संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति से पहले दोनों देशों के संबंध काफी घनिष्ठ थे, लेकिन उसके बाद परिस्थितियाँ बदलती गईं और तनाव बढ़ता गया। उन्होंने कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम तथा पश्चिम एशिया की क्षेत्रीय राजनीति भी इस तनाव के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

दूरदर्शन के पूर्व समाचार निदेशक अजीत सिंह ने कहा कि इजरायल और ईरान के बीच तनाव के पीछे ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विस्तार और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे प्रमुख कारण हैं। उन्होंने कहा कि इजरायल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मानता है, जिसके चलते दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है।

डॉ. ए. एल. खुराना ने कहा कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत ने महँगाई को नियंत्रित रखने के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। उन्होंने आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार और नीति-निर्माताओं के सतर्क एवं सक्रिय रहने की आवश्यकता बताई।

गोष्ठी में डॉ. रमेश हूडा, डॉ. खरब तथा श्रीमती राज गर्ग सहित अन्य सदस्यों ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम के अंत में क्लब के प्रधान डॉ. एस. के. अग्रवाल ने कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई देता है। उन्होंने मुख्य वक्ता धर्मपाल ढुल का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने जटिल अंतरराष्ट्रीय विषय को सरल और तथ्यपरक ढंग से प्रस्तुत कर उपस्थित सदस्यों की जानकारी में महत्वपूर्ण वृद्धि की।

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Author: Bharat Sarathi

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