ईरान-अमेरिका समझौता टूटा: क्या वैश्विक महंगाई और आर्थिक संकट के नए दौर की शुरुआत?

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई और विकास संतुलन की नई चुनौती

ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान केवल तात्कालिक उपायों में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों में निहित है

महंगाई का सबसे बड़ा बोझ मध्यम वर्ग, वेतनभोगी कर्मचारियों, पेंशनभोगियों, छोटे व्यापारियों और निम्न आय वर्ग पर पड़ेगा

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया (महाराष्ट्र) – विश्व अर्थव्यवस्था इस समय अवसरों और अनिश्चितताओं के ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ एक ओर तकनीकी प्रगति, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार नए अवसर प्रदान कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर युद्ध, ऊर्जा संकट, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव तथा परमाणु समझौते के विफल होने के बाद पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक अस्थिरता का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। इस स्थिति का प्रभाव केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा बाजार, वित्तीय संस्थानों, वैश्विक व्यापार और भारत जैसे उभरते देशों की अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक रूप से पड़ेगा।

भारत विश्व के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में वृद्धि सीधे भारत के आयात बिल, व्यापार घाटे और महंगाई को प्रभावित करती है। तेल महंगा होने से परिवहन, उद्योग, कृषि और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ती है, जिसका असर अंततः आम नागरिकों की रसोई और घरेलू बजट पर दिखाई देता है।

कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहेगा। डीजल, उर्वरक, सिंचाई और परिवहन की लागत बढ़ने से किसानों की उत्पादन लागत में वृद्धि होगी। यदि इसके साथ मौसम की अनिश्चितता भी जुड़ती है, तो खाद्य महंगाई का दबाव और अधिक बढ़ सकता है।

महंगाई का सबसे तीव्र प्रभाव निश्चित आय वाले वर्गों पर पड़ता है। मध्यम वर्ग, वेतनभोगी कर्मचारी, पेंशनभोगी, छोटे व्यापारी तथा निम्न आय वर्ग के परिवार तब सबसे अधिक प्रभावित होते हैं जब उनकी आय स्थिर रहती है लेकिन भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, गैस और परिवहन जैसी आवश्यक सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहती हैं।

वैश्विक स्तर पर अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ और जापान अपनी-अपनी आर्थिक तथा रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप नई नीतियाँ बना रहे हैं। ऐसे समय में भारत केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर सामने आ रहा है।

भारत की युवा आबादी, मजबूत डिजिटल ढांचा, विशाल घरेलू बाजार, विकसित बैंकिंग प्रणाली और बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम उसे वैश्विक निवेश का प्रमुख केंद्र बना रहा है। चीन पर निर्भरता कम करने की वैश्विक रणनीति में भारत को विनिर्माण और आपूर्ति शृंखला के विश्वसनीय साझेदार के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है, समुद्री व्यापार मार्ग प्रभावित होते हैं या कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊँची बनी रहती हैं, तो भारत के चालू खाते के घाटे, राजकोषीय संतुलन और महंगाई नियंत्रण पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में ऊर्जा आत्मनिर्भरता भारत की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल होनी चाहिए। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, जैव ईंधन, परमाणु ऊर्जा तथा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार भविष्य के संकटों से सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

इसके साथ-साथ रेलवे, जलमार्ग, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, कोल्ड स्टोरेज, डिजिटल अवसंरचना और स्मार्ट विनिर्माण में निवेश उत्पादन लागत कम करने तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

भारतीय रुपये पर भी ऊर्जा संकट का सीधा प्रभाव पड़ सकता है। बढ़ते आयात बिल से विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ेगी और यदि निर्यात उसी अनुपात में नहीं बढ़े, तो रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। इससे पेट्रोलियम, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य आयातित वस्तुएँ और महंगी हो सकती हैं।

वित्तीय बाजार भी इस अनिश्चितता से प्रभावित होंगे। तेल एवं गैस, रक्षा, ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों को लाभ मिल सकता है, जबकि विमानन, परिवहन, ऑटोमोबाइल, रसायन और ऊर्जा-निर्भर उद्योगों पर लागत का दबाव बढ़ सकता है। वैश्विक मंदी की स्थिति में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की वृद्धि भी प्रभावित होने की आशंका है।

स्पष्ट है कि आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में कोई भी युद्ध, प्रतिबंध, ऊर्जा संकट या समुद्री व्यवधान कुछ ही दिनों में पूरी दुनिया की आर्थिक दिशा बदल सकता है। इसलिए भारत के लिए केवल तात्कालिक संकट प्रबंधन पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक, ऊर्जा और कूटनीतिक रणनीतियों को समयानुकूल बनाना राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुकी है।

भारत यदि ऊर्जा आत्मनिर्भरता, तकनीकी नवाचार, विनिर्माण क्षमता और वैश्विक साझेदारियों को मजबूती देता है, तो वर्तमान संकट भविष्य के आर्थिक परिवर्तन और वैश्विक नेतृत्व के अवसर में भी परिवर्तित हो सकता है।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!