समस्याओं से जूझता भारतीय गणतंत्र: 2026 की कठोर सच्चाई

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डॉ. प्रियंका सौरभ

दो हज़ार छब्बीस का गणतंत्र दिवस नज़दीक आते ही देशभक्ति का उन्माद छा जाता है। राजपथ पर भव्य परेड, ड्रोन शो, सैन्य मिस्बाह प्रदर्शन—सब कुछ चकाचौंध। राष्ट्रपति का भाषण, प्रधानमंत्री का संदेश, स्कूलों में निबंध प्रतियोगिताएँ। लेकिन उत्सव के परदे के पीछे भारत का गणतंत्र बदहाली से जूझ रहा है। सत्तावन वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार, हिंसा, बलात्कार, सांप्रदायिक नफरत जैसी बुराइयाँ समाज को खा रही हैं। विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका भारत आर्थिक चमक-दमक के साथ-साथ गरीबी, असमानता के अंधेरे में डूबा है। लोकतंत्र की आड़ में तानाशाही प्रवृत्तियाँ पनप रही हैं। युवा बेरोजगारी से त्रस्त, किसान आत्महत्या के आँकड़ों में शामिल हो रहे। महिला असुरक्षा चरम पर, न्याय व्यवस्था चरमरा गई। गणतंत्र दिवस अब चिंतन का अवसर बनना चाहिए—हम कहाँ गलत हो गए? क्या हमारा संविधान अब भी प्रासंगिक है, या समय के साथ अप्रासंगिक हो चला?

भारत का गणतंत्र उन्नीस सौ पचास में जन्मा था। डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर द्वारा निर्मित संविधान ने उच्च आदर्श स्थापित किए—समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व। लेकिन सत्तावन वर्ष बाद वास्तविकता कड़वी है। अर्थव्यवस्था विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी बताई जाती है, परंतु शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों के पास पचासी प्रतिशत संपत्ति केंद्रित। सत्तर से अधिक अरबपति मिलकर राष्ट्रीय बजट से अधिक धन रखते हैं। बहुआयामी गरीबी इक्कीस प्रतिशत आबादी को लील रही। ग्रामीण भारत में छियालीस प्रतिशत परिवार मूलभूत सुविधाओं से वंचित। शहरी झुग्गी-झोपड़ियाँ बढ़ रही, जबकि मेट्रो शहरों में लग्ज़री टावर उभर रहे। यह असमानता सामाजिक विस्फोट का कारण बनी। महिला अनुपात नौ सौ बीस प्रति हज़ार, कुपोषण में पैंतीस प्रतिशत बच्चे स्टंटेड। एनएफएचएस-छह के आँकड़े चेतावनी हैं—पोषण रहित नस्लें भारत का भविष्य नहीं संवारी जा सकतीं।

भ्रष्टाचार इस गणतंत्र का कैंसर बन चुका। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के दो हज़ार पच्चीस सूचकांक में भारत पचासीवें स्थान पर लुढ़क गया। राजनीति से नौकरशाही, व्यापार से न्यायपालिका तक भ्रष्टाचार व्याप्त। दो हज़ार छब्बीस के चुनावों में चुनावी बॉन्ड घोटाले ने नया विवाद खड़ा किया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के डीपफेक ने प्रचार को और जटिल बना दिया। कॉर्पोरेट धन ने पार्टियों को खरीद लिया। सड़क निर्माण से लेकर हवाई अड्डे तक हर ठेका कमीशन का शिकार। डीबीटी ने पाँच लाख करोड़ की बचत तो की, लेकिन आधार डेटा लीक, पैन कार्ड धोखाधड़ी ने नई समस्याएँ खड़ी कीं। निचले स्तर पर चपरासी से लेकर थाना प्रभारी तक रिश्वतखोरी आम। यह भ्रष्टाचार लोकतंत्र की जड़ें खोखला कर रहा।

राजनीति का अपराधीकरण गंभीर संकट। अठारहवीं लोकसभा में दो सौ पचास से अधिक सांसद आपराधिक मामलों से जूझ रहे। हत्या, अपहरण, बलात्कार के आरोपी विधायक बन रहे। धनबल-बाहुबल ने चुनाव प्रक्रिया विकृत कर दी। एक लाख करोड़ के अनुमानित चुनावी खर्च में चालीस प्रतिशत फंड का स्रोत अस्पष्ट। नकदी बंटवारे, शराब की नदियाँ, वोटर स्लिप के नाम पर खरीद-फरोख्त। जातिवाद ने राजनीति को जकड़ लिया। उत्तर प्रदेश में यादव-जाट, बिहार में कुर्मी-राजपूत, हर राज्य में जाति की राजनीति। सम्प्रदायवाद ने सांप्रदायिक दंगों को हवा दी। दो हज़ार पच्चीस में उत्तराखंड, मणिपुर में दंगे भड़के। सोशल मीडिया पर ध्रुवीकरण चरम पर—व्हाट्सएप फॉरवर्ड से लेकर ट्विटर ट्रेंड तक नफरत का जहर।

महिला असुरक्षा गणतंत्र के लिए कलंक। निर्भया कांड से हाथरस, उन्नाव तक बलात्कार की घटनाएँ थम नहीं रही। प्रतिदिन छियासी मामले दर्ज, वास्तविक आँकड़े दोगुने। दलित महिलाओं पर अत्याचार दोगुने हो गए। शहरों में स्टॉकिंग, ग्रामीण क्षेत्रों में खाप पंचायतों का डर। निर्भया फंड के दस हज़ार करोड़ व्यय नगण्य। फास्ट-ट्रैक कोर्ट अपर्याप्त, साइबर सेल निष्क्रिय। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न बढ़ा, बॉलीवुड से लेकर कॉर्पोरेट तक मी-टू आंदोलन थम गए। लिंग भेदभाव शिक्षा-रोजगार में बरकरार। लड़कियों की स्कूल ड्रॉपआउट दर ऊँची। यह असुरक्षा समाज की आधी आबादी को बाँधे रख रही।

न्याय व्यवस्था चरमरा गई। चार लाख पचास हज़ार मामले लंबित, जज-जनसंख्या अनुपात उन्नीस प्रति दस लाख। उच्च न्यायालयों में औसतन दस वर्ष लगते हैं। अन्याय बराबर न्याय में देरी। वकीलों की हड़तालें, जजों की कमी, जटिल कानून। ई-कोर्ट प्रोजेक्ट अधर में। पुलिस सुधार नाममात्र के—औपनिवेशिक मानसिकता कायम। थानों में रिश्वत, हिरासत में टॉर्चर आम। एस आई टी गठन के बाद भी SIT रिपोर्ट दब जाती हैं। खाप पंचायतों ने कानून हाथ में ले लिया। पितृसत्ता परिवारों में लोकतंत्र को कुचल रही। क्षेत्रवाद तीव्र—बंगाल में टीएमसी, केरल में एलडीएफ केंद्र के विरुद्ध। दक्षिणी राज्य भाषा-आरक्षण के नाम पर विद्रोह पर उतारू। पूर्वोत्तर में अलगाववाद सुलगा हुआ।

युवा बेरोजगारी तेईस प्रतिशत पर। आईआईटी-आईआईएम से सिविल सेवा न निकलने वाले स्टार्टअप की ओर। लेकिन अधिकांश बेरोजगार ग्रामीण युवा कौशलहीन। किसान संकट गहरा—न्यूनतम समर्थन मूल्य की माँग अधर में। पंजाब-महाराष्ट्र में कर्ज से आत्महत्या का सिलसिला। बाढ़-सूखे ने फसलें बर्बाद की। एमएसपी कानून बनने के बाद भी किसान सड़कों पर। प्रदूषण घातक—दिल्ली का एक्यूआई पाँच सौ पार। यमुना-गंगा काली। जलवायु संकट बाढ़-सूखा चक्रवृद्धि। नक्सलवाद छत्तीसगढ़-झारखंड में सक्रिय। आतंकवाद जम्मू-कश्मीर से केरल तक फैला। अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर यूपीएपीए, सूचना प्रौद्योगिकी नियमों का दुरुपयोग। पत्रकार जेलों में, सोशल मीडिया सेंसरशिप।

क्या कोई समाधान संभव? भ्रष्टाचार पर डीबीटी ने लाभ पहुँचाया, लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता निगरानी, ब्लॉकचेन मतदान आवश्यक। निर्भया फंड का पूरा व्यय, एक हज़ार फास्ट-ट्रैक कोर्ट। साइबर क्राइम सेल हर जिले में। पीएम-विश्वकर्मा, आत्मनिर्भर चार दशा से पंद्रह करोड़ नौकरियाँ। कौशल भारत को विस्तार। ‘संविधान यात्रा’ से सांप्रदायिक सद्भाव—स्कूलों में एकता पाठ्यक्रम अनिवार्य। चुनाव सुधार विधेयक—आपराधिक उम्मीदवार आजीवन प्रतिबंधित, राज्य फंडिंग पारदर्शी। राजनीतिक दलों का ऑडिट। ई-कोर्ट तीन दशा, पचास हज़ार नए जज। अधिकतम न्याय समय सीमा। पुलिस सुधार—सीसीटीवी थानों में अनिवार्य। क्षेत्रीय असंतुलन पर नीति आयोग दो दशा, दक्षिणी राज्यों को विशेष पैकेज। राष्ट्र निर्माण इंटर्नशिप—प्रत्येक युवा को एक वर्ष सेवा। पंचायती राज सशक्तिकरण—सत्तर तिहाई संशोधन को राष्ट्रीय महिला आरक्षण। विद्युत वाहन तीस प्रतिशत लक्ष्य, नमामि गंगे दो दशा को गति। नक्सल क्षेत्रों में विकास पैकेज।

गणतंत्र दिवस पर मात्र परेड-झंडारोहण पर्याप्त नहीं। समस्याओं को स्वीकारना होगा। औपचारिक लोकतंत्र बचाया, अब वास्तविक सामाजिक न्याय सुनिश्चित करें। युवा शक्ति आगे आए, भारत को विश्व गुरु बनाएँ। विविधता शक्ति बने। डॉक्टर अम्बेडकर का संविधान जीवंत हो, काँटों भरी झाड़ियों से निकले। अन्यथा गणतंत्र मात्र दिखावा बन जाएगा। जय हिंद, जय भारत!

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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