कन्यादान नहीं, सम्मान चाहिए !

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– डॉ. प्रियंका सौरभ

आज विश्व बालिका दिवस मनाया जा रहा है। देश और दुनिया में इस अवसर पर अनेक कार्यक्रम, संगोष्ठियाँ और प्रतीकात्मक आयोजन हो रहे हैं। मंचों से बालिकाओं के सम्मान, सुरक्षा और सशक्तीकरण की बातें कही जा रही हैं। लेकिन यह प्रश्न बार-बार सामने आता है कि क्या किसी एक दिवस का आयोजन वास्तव में उस गहरी सामाजिक समस्या का समाधान कर सकता है, जो पीढ़ियों से बालिकाओं के जीवन को प्रभावित करती आ रही है। सम्मान किसी कैलेंडर की तारीख से तय नहीं होता, बल्कि वह समाज के दैनिक व्यवहार, सोच और निर्णयों में परिलक्षित होता है।

भारतीय समाज में बालिका को लेकर एक विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर उसे देवी, शक्ति और लक्ष्मी का रूप कहकर पूजनीय माना जाता है, दूसरी ओर उसी बालिका के जीवन पर सबसे अधिक नियंत्रण और प्रतिबंध लगाए जाते हैं। जन्म से पहले चयन, जन्म के बाद भेदभाव और बड़े होते-होते अपेक्षाओं का बोझ—यह सब उसकी नियति का हिस्सा बना दिया जाता है। पूजा और अधिकार के बीच की यह दूरी यह स्पष्ट करती है कि हमारे सामाजिक मूल्यों में अभी भी गहरी असंगति मौजूद है।

बालिका के जीवन में असमानता केवल व्यवहार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह भाषा, परंपराओं और संस्कारों के माध्यम से भी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है। इन्हीं परंपराओं में एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील शब्द है— कन्यादान। दान का अर्थ है किसी वस्तु को सौंप देना, लेकिन बेटी कोई वस्तु नहीं है। वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है, जिसकी अपनी चेतना, इच्छा और भविष्य है। ऐसे में विवाह के समय उसका “दान” किया जाना न केवल भाषा की समस्या है, बल्कि सोच की भी गंभीर समस्या है।

विवाह भारतीय समाज में एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्कार माना जाता है। लेकिन संस्कार वही सार्थक होता है, जो समानता और सहमति पर आधारित हो। कन्यादान की अवधारणा पिता को दाता और बेटी को दान बना देती है, जिससे असमानता का भाव स्वतः स्थापित हो जाता है। इसके विपरीत पाणिग्रहण जैसी अवधारणा साझेदारी और स्वीकार का भाव देती है। समय की माँग है कि समाज भाषा के साथ-साथ उस सोच पर भी पुनर्विचार करे, जो इन शब्दों के पीछे छिपी हुई है।

दुखद तथ्य यह है कि आज भी देश के अनेक हिस्सों में बालिकाओं से उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में औपचारिक रूप से भी राय नहीं ली जाती। शिक्षा, विवाह और करियर जैसे विषयों पर अंतिम निर्णय परिवार या समाज द्वारा लिया जाता है। बालिका से अपेक्षा की जाती है कि वह परिस्थितियों को स्वीकार करे और चुपचाप निभाए। यह चुप्पी धीरे-धीरे उसके जीवन का स्थायी हिस्सा बन जाती है और संघर्ष का रूप ले लेती है।

बालिका का संघर्ष बचपन से ही आरंभ हो जाता है। कभी संसाधनों की कमी के रूप में, कभी सुरक्षा के नाम पर लगाए गए प्रतिबंधों के रूप में। उसे हर चरण पर स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है, फिर भी उस पर संदेह किया जाता है। समाज उससे त्याग, सहनशीलता और समर्पण की अपेक्षा करता है, लेकिन बदले में उसे समान अधिकार देने से कतराता है। यह असंतुलन ही असली समस्या की जड़ है।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि बेटियाँ परिवार की इज़्ज़त होती हैं। लेकिन इस इज़्ज़त की कीमत अधिकांश मामलों में उनकी स्वतंत्रता से चुकाई जाती है। इज़्ज़त किसी एक व्यक्ति के कंधों पर नहीं टाली जा सकती। वह सामूहिक आचरण, नैतिकता और समानता से बनती है। किसी की आज़ादी सीमित करके समाज अपनी गरिमा नहीं बचा सकता, बल्कि उसे और कमजोर ही करता है।

बालिका दिवस के अवसर पर कन्या पूजन और सम्मान की बातें बड़े स्तर पर की जाती हैं। लेकिन वास्तविक सम्मान पूजा की थाली से नहीं, बल्कि समान अवसरों से मिलता है। जब बालिका को पढ़ने, आगे बढ़ने और अपने सपने चुनने की स्वतंत्रता मिले, तभी सम्मान का अर्थ सार्थक होगा। जब उसकी ‘ना’ को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाएगा, जितनी ‘हाँ’ को, तभी उसे सशक्त कहा जा सकेगा।

यह स्वीकार करना होगा कि केवल कानून और योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर अनेक नीतियाँ बनाई गई हैं, लेकिन सामाजिक सोच में परिवर्तन के बिना उनका प्रभाव सीमित रह जाता है। जब तक परिवार और समाज अपनी मानसिकता नहीं बदलते, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है। सामाजिक सुधार का आरंभ घर से होता है, न कि केवल मंच और भाषण से।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बालिका को दया या संरक्षण की दृष्टि से न देखा जाए। उसे “कमज़ोर” नहीं, बल्कि समान और सक्षम नागरिक के रूप में स्वीकार किया जाए। उसके अधिकारों को अनुग्रह नहीं, बल्कि संवैधानिक हक़ के रूप में समझा जाए। बालिका दिवस का उद्देश्य भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि व्यवहारिक बदलाव होना चाहिए।

समाज को यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह वास्तव में बालिकाओं को बराबरी का जीवन दे पा रहा है। क्या घरों में, स्कूलों में और कार्यस्थलों पर बेटियों को वही सम्मान और अवसर मिल रहे हैं, जो बेटों को मिलते हैं। यदि उत्तर नकारात्मक है, तो बालिका दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन बनकर रह जाएगा।

अंततः यह स्पष्ट है कि बालिकाएँ किसी एक दिवस की प्रतीक नहीं हैं। वे समाज और राष्ट्र का वर्तमान भी हैं और भविष्य भी। कन्यादान की मानसिकता से बाहर निकलकर कन्या-स्वाधिकार को अपनाना ही एक संवेदनशील और आधुनिक समाज की पहचान है। जब तक बालिका को सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक किसी भी दिवस का उत्सव अधूरा ही रहेगा। यही विश्व बालिका दिवस की वास्तविक और स्थायी सार्थकता है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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