भारत में महिला कैदियों की बढ़ती संख्या-सशक्तिकरण, अपराध, न्याय और जेल प्रशासन की वैश्विक चुनौती

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

महिला क़ी देवी से कैदी तक की विरोधाभासी यात्रा-कहीं पुरुष-प्रधान आपराधिक नेटवर्क अपने बचाव के लिए गैरहिंसक अपराधों में महिलाओं को आगे तो नहीं कर रह?

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ,उज्ज्वला,महिला हेल्पलाइन, मिशन शक्ति,स्टैंड-अप इंडिया जैसी असंख्य योजनाओं क़े बावजूद,आपराधिक न्याय व्यवस्था के आकड़ों से गहरी चिंता उभरती है

– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नारी को देवी का दर्जा प्राप्त है। शक्ति, दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में स्त्री भारतीय सभ्यता की आत्मा रही है। वेदों से लेकर संविधान तक महिला को सम्मान समानता और गरिमा का अधिकार देने की बात की जाती रही है। स्वतंत्र भारत ने भी महिला सशक्तीकरण को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार घोषित किया।इसके बावजूद, आज जब हम भारतीय जेलों के आंकड़ों पर दृष्टि डालते हैं, तो एक गहरी और विचलित करने वाली विडंबना सामने आती है, देवी मानी जाने वाली नारी की बढ़ती संख्या कैदी के रूप में। यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक और लैंगिक संरचनाओं पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।

कल्याणकारी योजनाएँ बनाम आपराधिक न्याय के आंकड़े

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, उज्ज्वला योजना, महिला हेल्पलाइन, मिशन शक्ति, स्टैंड-अप इंडिया जैसी असंख्य योजनाएँ यह दर्शाती हैं कि राज्य महिला उत्थान को प्राथमिकता देने का दावा करता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और सुरक्षा के क्षेत्र में अनेक पहलें की गईं।लेकिन इंस्टीट्यूट फॉर क्राइम एंड जस्टिस पॉलिसी रिसर्च (ICPR) की वर्ल्ड फीमेल इम्प्रिजनमेंट लिस्ट के अनुसार, बीते दो दशकों में भारतीय जेलों में बंद महिलाओं की संख्या पुरुषों और सामान्य जनसंख्या की तुलना में दोगुनी गति से बढ़ी है। यह तथ्य अपने-आप में चिंता का विषय है।

आंकड़े जो असहज प्रश्न उठाते हैं

वर्ष 2000 से 2022 के बीच भारतीय जेलों में महिला कैदियों (विचाराधीन एवं सजायाफ्ता) की संख्या 9,089 से बढ़कर 23,772 हो गई—लगभग 162 प्रतिशत की वृद्धि।इसके विपरीत, इसी अवधि में भारत की कुल जनसंख्या लगभग 30 प्रतिशत बढ़ी, जबकि पुरुष कैदियों की संख्या में लगभग 77 प्रतिशत की वृद्धि हुई।यह असंतुलन इस ओर संकेत करता है कि या तो महिला अपराध के स्वरूप में परिवर्तन आया है, या फिर कानून, पुलिसिंग और न्यायिक व्यवहार में ऐसा बदलाव हुआ है, जिसने महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक संख्या में जेल तक पहुँचाया है।

अवैध प्रवास और अंतरराष्ट्रीय आयाम

मैं,एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी (गोंदिया, महाराष्ट्र), यह मानता हूँ कि हाल के वर्षों में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों,विशेषकर बांग्लादेशी मूल की महिलाओं—के विरुद्ध सघन अभियानों के कारण भी महिला कैदियों की संख्या में वृद्धि हुई है।

एक अनुमान के अनुसार, केवल पश्चिम बंगाल की जेलों में ही लगभग 358 बांग्लादेशी महिलाएँ कैद में हैं। इनमें से कई मानव तस्करी, अवैध प्रवास या जबरन अपराध में धकेली गई पीड़िताएँ भी हो सकती हैं। यह स्थिति भारत की जेल व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और कूटनीतिक विमर्श से भी जोड़ती है।

सशक्तीकरण बनाम अपराध: मूल प्रश्न

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जिस दौर में महिला सशक्तीकरण बढ़ रहा है, उसी दौर में महिलाएँ अपराध से विमुख क्यों नहीं हो रहीं? क्या अधिकारों की जागरूकता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक संरचनाएँ उन्हें सुरक्षित विकल्प देने में विफल हो रही हैं?कई जाँचों में सामने आया है कि मादक पदार्थों और तस्करी जैसे अपराधों में महिलाओं को जानबूझकर आगे किया जाता है, क्योंकि उन्हें कानून द्वारा अपेक्षाकृत कम संदेहास्पद माना जाता है। यह आशंका भी बलवती होती है कि कहीं पुरुष-प्रधान आपराधिक नेटवर्क अपने बचाव के लिए महिलाओं को मोहरे के रूप में तो इस्तेमाल नहीं कर रहे।

कम संख्या, पर तेज़ वृद्धि: एक भ्रामक संतोष

यह सच है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों की तुलना में भारत में महिला कैदियों की कुल संख्या अपेक्षाकृत कम है और वे कुल कैदी आबादी का लगभग 4 प्रतिशत ही हैं। किंतु यह संतोष भ्रामक है, क्योंकि तेज़ी से बढ़ती दर इस समस्या की गहरी जड़ों की ओर इशारा करती है, जिसके सामाजिक परिणाम भविष्य में अत्यंत गंभीर हो सकते हैं।

केवल अपराध नहीं, सामाजिक-संरचनात्मक संकट

महिलाओं के जेल जाने को केवल अपराध में वृद्धि के रूप में देखना एक सतही दृष्टिकोण होगा। अधिकांश महिला कैदी हिंसक अपराधी नहीं हैं। वे गरीबी-जनित, परिस्थितिजन्य, पारिवारिक दबाव में किए गए या कानूनी अज्ञानता से जुड़े अपराधों में फँसी होती हैं।

अंतरराष्ट्रीय अध्ययन बताते हैं कि महिला अपराध प्रायः सर्वाइवल क्राइम होते हैं—अर्थात जीवित रहने की मजबूरी से उपजे अपराध। भारत में महिला कैदियों का बड़ा हिस्सा विचाराधीन है, जो वर्षों तक मुकदमों के लंबित रहने का दंश झेलता है।

संवैधानिक मूल्यों का क्षरण

लंबे समय तक विचाराधीन कैद सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) तथा अनुच्छेद 39A (निःशुल्क कानूनी सहायता) के उल्लंघन की ओर संकेत करती है।गरीब, अशिक्षित और सामाजिक रूप से हाशिए पर खड़ी महिलाएँ इस व्यवस्था में सबसे पहले फँसती हैं और सबसे अंत में बाहर निकलती हैं।

महिला अपराध के प्रमुख कारण: एक बहुआयामी विश्लेषण

पहला कारण आर्थिक असमानता और स्त्री-गरीबी है। महिलाओं की श्रम भागीदारी दर कम है और अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत महिलाएँ शोषण, ऋण जाल और असुरक्षा का शिकार होती हैं।

दूसरा कारण घरेलू हिंसा और पितृसत्तात्मक दबाव है, जहाँ कई महिलाएँ पति या परिवार के पुरुष सदस्यों के अपराधों में सह-अभियुक्त बना दी जाती हैं।

तीसरा कारण कानूनी जागरूकता की कमी है, जिसके चलते महिलाएँ अपने अधिकारों, जमानत प्रक्रिया और पुलिस कार्रवाई के निहितार्थ नहीं समझ पातीं।

राज्य की भूमिका: सशक्तीकरण बनाम दंडात्मक शासन

महिला सशक्तीकरण की योजनाएँ प्रायः कल्याणकारी हैं, जबकि आपराधिक न्याय प्रणाली आज भी दंडात्मक मानसिकता से संचालित होती है। पुलिस बल में महिला अधिकारियों की कमी, संवेदनशीलता का अभाव और गिरफ्तारी को अंतिम विकल्प न मानना इस समस्या को और गहरा करता है।

अदालतों पर बढ़ता बोझ और मुकदमों का वर्षों तक लंबित रहना महिलाओं को सजा से पहले ही सजा भुगतने पर मजबूर करता है, जिससे “दोष सिद्ध होने तक निर्दोष” का सिद्धांत कमजोर पड़ता है।

जेल प्रशासन की चुनौतियाँ: अदृश्य पीड़ा

भारतीय जेल प्रणाली मूलतः पुरुष-केंद्रित है। महिला कैदियों के लिए स्वास्थ्य, मानसिक परामर्श, स्वच्छता, मातृत्व देखभाल और बच्चों के पालन-पोषण की सुविधाएँ अत्यंत अपर्याप्त हैं।यह स्थिति संयुक्त राष्ट्र की बैंकाक रूल्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के विपरीत है, जिनका भारत ने समर्थन तो किया है, किंतु प्रभावी क्रियान्वयन अब भी अधूरा है।

अपराध के बदलते स्वरूप और न्यायिक सख्ती

शहरीकरण और वैश्वीकरण के साथ महिला अपराधों के स्वरूप भी बदले हैं,साइबर अपराध, वित्तीय धोखाधड़ी, मादक पदार्थों की तस्करी और मानव तस्करी में महिलाओं की संलिप्तता बढ़ी है।

साथ ही, हाल के वर्षों में गैर-हिंसक अपराधों में भी जमानत को लेकर न्यायिक सख्ती देखी गई है, जिसका सामाजिक और मानसिक भार महिलाओं पर अधिक पड़ता है।

अतः अगर हम उपरोत पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भारत में महिला कैदियों की बढ़ती संख्या एक गंभीर चेतावनी है, लेकिन साथ ही यह सुधार का अवसर भी प्रदान करती है। यह स्पष्ट करती है कि सशक्तीकरण केवल योजनाओं और नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक न्याय, संवेदनशील न्यायिक प्रक्रिया और मानवीय जेल व्यवस्था से साकार होता है।

यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं समझा गया, तो इसका प्रभाव केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवार, बच्चों और समाज की भावी पीढ़ियों को भी प्रभावित करेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि भी इसी बात से तय होगी कि वह नारी को देवी मानने की सांस्कृतिक परंपरा को न्याय और करुणा की आधुनिक व्यवस्था में कैसे रूपांतरित करता है।

-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!