त्योहारी चमक बढ़ी, पर फीकी पड़ गई खुशियों की आभा

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उत्सव का अर्थ केवल खरीदारी और सजावट नहीं, रिश्तों में अपनापन और दूसरों के जीवन में उजाला लाना भी है

राजेश जैन

दीपावली आते ही बाजार सजने लगते हैं। नए कपड़ों, मिठाइयों, उपहारों और सजावट के सामान की खरीदारी बढ़ जाती है। घर रोशनी से जगमगाने लगते हैं और शुभकामना संदेशों की बाढ़ आ जाती है। बाहर से देखें तो त्योहार पहले से कहीं अधिक भव्य हो गए हैं। लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक सवाल अनदेखा नहीं किया जा सकता—क्या त्योहारों की भव्यता के साथ हमारी खुशियाँ भी बढ़ी हैं, या हम उत्सव मनाने से ज्यादा उसे दिखाने में जुट गए हैं?

एक समय था, जब त्योहारों की तैयारी केवल अपने घर तक सीमित नहीं रहती थी। पड़ोसियों के यहाँ आना-जाना, रिश्तेदारों का इंतजार, घर में बने पकवानों का आदान-प्रदान और सामूहिक मेल-मिलाप उत्सव का स्वाभाविक हिस्सा थे। मिठाई का डिब्बा औपचारिकता निभाने से ज्यादा रिश्तों में मिठास बाँटने का माध्यम था। बच्चों के लिए त्योहार का आकर्षण केवल नए कपड़े नहीं, बल्कि परिवार और परिचितों के बीच बिताया गया समय भी होता था। खुशियाँ मनाने के लिए न भारी खर्च की जरूरत थी, न किसी प्रदर्शन की।

आज त्योहार का स्वरूप बदल गया है। घरों की सजावट पहले से भव्य है, खरीदारी के विकल्प बढ़े हैं और शुभकामनाएँ पहुँचाना आसान हुआ है। इसके बावजूद आपसी संवाद और सहज मेल-मिलाप कमजोर पड़ते दिखाई देते हैं। एक ही घर में लोग साथ होते हैं, लेकिन अपने-अपने चलभाष में व्यस्त रहते हैं। सैकड़ों लोगों को शुभकामना संदेश भेज दिए जाते हैं, लेकिन किसी पुराने मित्र या रिश्तेदार से कुछ मिनट बात करने का समय नहीं निकलता। तकनीक ने संपर्क आसान किया है, पर उस संपर्क को आत्मीय संवाद में बदलना अब भी हमारी अपनी जिम्मेदारी है।

इस बदलाव के पीछे बाजार की भूमिका समझना जरूरी है। त्योहार कारोबार के बड़े अवसर बन चुके हैं। कंपनियाँ महीनों पहले से ऐसे विज्ञापन तैयार करती हैं, जो हमारी जरूरतों से ज्यादा इच्छाओं को प्रभावित करते हैं। कौन-से कपड़े पहनने हैं, घर कैसे सजाना है, कौन-सा उपहार देना है और कितनी खरीदारी करनी है—इन निर्णयों पर बाजार का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। धीरे-धीरे त्योहार की खुशी खरीदारी की क्षमता से जुड़ने लगती है।

बाजार का विस्तार अपने आप में बुरा नहीं है। इससे कारोबार बढ़ता है, रोजगार मिलता है और छोटे-बड़े व्यवसायों को अवसर मिलते हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब उपभोग उत्सव का केंद्र बन जाता है; जब नए कपड़ों, महंगे उपहारों और भव्य सजावट के बिना त्योहार अधूरा लगने लगता है। अपनी आर्थिक क्षमता से आगे जाकर खर्च करना और दूसरों की जीवनशैली से अपनी खुशियों की तुलना करना उत्सव को बोझिल बना सकता है। ऐसे में त्योहार आनंद के बजाय आर्थिक और सामाजिक दबाव का कारण बनने लगता है।

सामाजिक संचार माध्यमों ने इस प्रतिस्पर्धा को नया मंच दिया है। अब त्योहार मनाने के साथ उसका प्रदर्शन भी जरूरी समझा जाने लगा है। किसके घर की सजावट बेहतर है, किसने कहाँ त्योहार मनाया और किसे कितना महंगा उपहार मिला—यह सब अनकही तुलना का हिस्सा बन जाता है। कई बार हम किसी पल को महसूस करने से ज्यादा उसकी तस्वीर लेने और साझा करने में व्यस्त रहते हैं। परिवार साथ बैठता है, तस्वीरें खिंचती हैं, लेकिन उस साथ में कितना संवाद है, यह सवाल पीछे छूट जाता है।

इसका असर रिश्तों पर भी दिखाई देता है। त्योहारों पर कई बार यह हिसाब रखा जाता है कि किसने बात की, किसने घर बुलाया और किसने शुभकामना तक नहीं दी। रिश्तों की आत्मीयता औपचारिकताओं और अपेक्षाओं के बीच उलझने लगती है। जबकि किसी रिश्ते की मजबूती उपहारों की कीमत या शुभकामना संदेशों की संख्या से नहीं, बल्कि जरूरत के समय साथ खड़े होने से तय होती है।

हालाँकि अतीत को पूरी तरह आदर्श मानना भी सही नहीं होगा। पहले भी आर्थिक असमानता और सामाजिक भेदभाव था। अनेक परिवारों के लिए त्योहार खुशियों से ज्यादा अभाव का एहसास कराते थे। आज भी बहुत से लोग संघर्ष के बीच त्योहार मनाते हैं। फिर भी सामूहिकता और सादगी की पुरानी परंपराएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि सीमित साधनों में भी उत्सव अर्थपूर्ण हो सकता है। ऐसी आत्मीयता आज भी अनेक परिवारों और समुदायों में जीवित है; जरूरत उसे अपने व्यवहार में अधिक जगह देने की है।

हमें दीपावली के मूल भाव को समझने की जरूरत है। दीपक का अर्थ केवल अपने घर को रोशन करना नहीं, आसपास का अंधेरा दूर करना भी है। यदि हमारा घर रोशनी से जगमगा रहा हो और पड़ोस का कोई परिवार अभाव में त्योहार मनाने को मजबूर हो, तो उत्सव की सामाजिक सार्थकता पर विचार करना चाहिए। यदि हम महंगे उपहार खरीद सकते हैं, लेकिन अपने आसपास काम करने वाले व्यक्ति को सम्मान और अपनापन नहीं दे सकते, तो हमारी समृद्धि का अर्थ अधूरा है।

त्योहार व्यक्तिगत खुशी को सामाजिक खुशी में बदलने का अवसर हैं। किसी पुराने मित्र से संवाद शुरू करना, नाराज रिश्तेदार से संबंध सुधारने की पहल करना, जरूरतमंद बच्चे को किताबें देना या किसी अकेले बुजुर्ग के साथ कुछ समय बिताना—ऐसे छोटे काम उत्सव को वास्तविक अर्थ देते हैं। इनके लिए बड़ी रकम से ज्यादा संवेदनशीलता और समय चाहिए।

इसका मतलब आधुनिक जीवनशैली या बाजार से दूरी बनाना नहीं है। नए कपड़े पहनना, घर सजाना, खरीदारी करना और तकनीक का इस्तेमाल करना उत्सव का हिस्सा हो सकते हैं। सवाल यह है कि क्या ये साधन हमारी खुशियाँ बढ़ा रहे हैं या खुशी की परिभाषा ही तय करने लगे हैं? क्या हम अपनी सामर्थ्य और पसंद के अनुसार त्योहार मना रहे हैं या दूसरों को देखकर अपनी खुशियों का स्तर निर्धारित कर रहे हैं?

दरअसल, समस्या त्योहारों के आधुनिक होने में नहीं, उनके उद्देश्य के पीछे छूट जाने में है। उत्सव का मूल्य उसके खर्च, सजावट और भव्यता से नहीं, बल्कि इस बात से तय होना चाहिए कि वह लोगों को कितना करीब लाता है। दीपावली की रोशनी बिजली की झालरों से हो सकती है, लेकिन उसका सामाजिक उजाला तभी फैलेगा, जब वह किसी दूसरे के जीवन में भी उम्मीद जगाए।

इस बार घर की सफाई और सजावट के साथ रिश्तों पर जमी धूल हटाने का भी प्रयास हो। खरीदारी के लिए खर्च तय करने के साथ अपनों के लिए समय भी निकाला जाए। त्योहार की असली सफलता यह नहीं कि हमने कितनी रोशनी की, कितना खर्च किया या कितनी तस्वीरें साझा कीं। असली कसौटी यह है कि हमारी वजह से कितने चेहरों पर मुस्कान आई।

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Author: Bharat Sarathi

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