प्रचार में जनता, सुनवाई में सन्नाटा

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

नेताओं की बढ़ती प्रचार क्षमता के बीच आम नागरिक की आवाज कहाँ है? लोकतंत्र को जीवंत रखने के लिए जनसंवाद, जवाबदेही और संगठित नागरिक पहल जरूरी है।

✍️ ऋषि प्रकाश कौशिक

राजनीति में जनता का नाम सबसे अधिक लिया जाता है। हर घोषणा उसके लिए होती है, हर कार्यक्रम उसके हित में बताया जाता है और हर चुनाव में उसे सर्वोपरि कहा जाता है। फिर भी एक साधारण नागरिक के लिए अपने प्रतिनिधि तक पहुँचना, अपनी परेशानी बताना और उसका समाधान पाना इतना कठिन क्यों है? यह सवाल किसी एक दल या नेता से नहीं, उस राजनीतिक संस्कृति से है जिसमें जनता तक अपनी बात पहुँचाने की चिंता तो दिखाई देती है, लेकिन जनता की बात सुनने की व्यवस्था कमजोर पड़ती जाती है।

सामाजिक संचार माध्यमों ने संवाद की संभावनाएँ बढ़ाई हैं। इनके माध्यम से कोई नागरिक अपनी शिकायत सामने रख सकता है और कोई जनप्रतिनिधि अपने काम की जानकारी सीधे लोगों तक पहुँचा सकता है। समस्या इन माध्यमों के इस्तेमाल में नहीं, उन्हें जनसंपर्क और जवाबदेही का विकल्प मान लेने में है। जब नेता का संदेश जनता तक लगातार पहुँचे, लेकिन जनता का सवाल नेता तक पहुँचकर भी अनसुना रह जाए, तो ऐसे संवाद की उपयोगिता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

अपनी बात कहने के साथ सवाल सुनना भी जरूरी

अपने प्रचार पर नियंत्रण रखने की सुविधा राजनीतिक नेतृत्व को आकर्षित करती है। किस कार्यक्रम का दृश्य दिखाना है, किस भाषण का अंश प्रसारित करना है और किस उपलब्धि को प्रमुखता देनी है—यह सब उसकी अपनी व्यवस्था तय कर सकती है। इस प्रक्रिया में वह बात आसानी से पीछे छूट सकती है जो जनता पूछना चाहती है।

पत्रकार की भूमिका इसी जगह महत्त्वपूर्ण होती है। वह किसी उद्घाटन के साथ काम पूरा होने की समयसीमा पूछ सकता है। किसी घोषणा पर धन की व्यवस्था और पुरानी घोषणा का हिसाब माँग सकता है। किसी रैली में जुटी भीड़ के साथ उन लोगों की समस्या भी सामने रख सकता है जो रोजमर्रा की कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। अच्छी पत्रकारिता राजनीतिक संदेश के साथ उसकी पड़ताल भी जनता तक पहुँचाती है।

बेशक, पत्रकारिता को भी अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखनी होगी। केवल नेता का बयान प्रकाशित कर देना पर्याप्त नहीं है। जनता के प्रश्न पूछना, उत्तर की जाँच करना और अधूरे उत्तर पर दोबारा सवाल करना भी उसका दायित्व है। सवाल पूछने वाला पत्रकार किसी दल का विरोधी नहीं हो जाता, जैसे प्रशंसा करने वाला हर व्यक्ति जनता का हितैषी नहीं हो जाता।

यदि किसी राजनीतिक आयोजन में स्वतंत्र प्रश्नों की अपेक्षा आकर्षक दृश्य और प्रशंसात्मक सामग्री को अधिक महत्त्व मिलने लगे, तो नागरिकों को सजग होना चाहिए। अच्छी तस्वीर किसी कार्यक्रम को यादगार बना सकती है, लेकिन उससे उस कार्यक्रम की जनहित में उपयोगिता अपने आप सिद्ध नहीं होती।

जनता के बीच काम या नेतृत्व की नजर में स्थान?

यह चिंता भी किसी एक दल तक सीमित नहीं रखी जा सकती कि राजनीतिक कार्यकर्ता और नेता अपनी ऊर्जा का कितना हिस्सा जनता की समस्याओं पर लगाते हैं और कितना अपने वरिष्ठ नेतृत्व को प्रसन्न करने में। दल के प्रति निष्ठा स्वाभाविक है, लेकिन जब पद और अवसर पाने की आकांक्षा जनसेवा पर भारी पड़ने लगे, तो राजनीति की प्राथमिकताएँ बदलने लगती हैं।

फिर स्थानीय समस्याओं पर लगातार काम करने की जगह बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें, स्वागत समारोह और प्रशंसा के वक्तव्य प्रमुख हो जाते हैं। नागरिक यह पूछने लगता है कि उसके प्रतिनिधि की सक्रियता का मापदंड क्या है—क्षेत्र की समस्याओं का समाधान या नेतृत्व के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराना?

सभी नेताओं को स्वार्थी कह देना उचित नहीं होगा। समर्पण से काम करने वाले जनप्रतिनिधि और कार्यकर्ता भी हैं। लेकिन राजनीति की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें जनसेवा करने वाले को आगे बढ़ने का अवसर मिले और केवल प्रचार के सहारे सक्रियता का दावा करने वाले से भी हिसाब माँगा जाए।

सत्तापक्ष के पास निर्णय लेने और उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी है। विपक्ष का दायित्व जनता की उपेक्षित समस्याओं को उठाना और सरकार से उत्तर माँगना है। यदि दोनों की प्राथमिकताएँ केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाने तक सीमित हो जाएँ, तो उस नागरिक की आवाज कौन उठाएगा जिसकी गली में गंदा पानी भरा है, जिसकी शिकायत लंबित है या जिसे अपने अधिकार के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं?

आस्था की गरिमा सेवा से बढ़ती है

धर्म और आस्था हमारे समाज के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। धार्मिक अवसरों पर शुभकामनाएँ देना या सार्वजनिक आयोजनों में भाग लेना सहज बात है। प्रश्न तब उठता है जब आस्था से जुड़े संदेशों में भी व्यक्ति का अपना प्रचार इतना प्रमुख हो जाए कि सेवा, करुणा और सद्भाव का भाव पीछे रह जाए।

विभिन्न धार्मिक परंपराओं में जरूरतमंद की सहायता, ईमानदार कर्म और दूसरों के दुख के प्रति संवेदनशीलता को महत्त्व मिला है। सार्वजनिक जीवन में इन मूल्यों का वास्तविक सम्मान व्यवहार से दिखाई देना चाहिए। गरीब की बात सुनना, पीड़ित को न्याय दिलाने का प्रयास करना और किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान देखे बिना उसकी सहायता करना भी इसी संवेदनशीलता की कसौटी है।

भगवान के नाम के साथ अपना बड़ा चित्र लगाना सरल है। किसी असहाय व्यक्ति की समस्या सुनने के लिए समय निकालना अधिक जिम्मेदारी माँगता है। आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति से जनता इतनी अपेक्षा तो कर ही सकती है कि उसके आचरण में भी करुणा और कर्तव्यनिष्ठा दिखाई दे।

धार्मिक पहचान के नाम पर नागरिकों को एक-दूसरे से दूर करने वाली राजनीति से भी सावधान रहने की जरूरत है। पानी, शिक्षा, उपचार, रोजगार और सुरक्षा की जरूरत सबकी है। इन साझा जरूरतों पर लोगों का साथ आना समाज और लोकतंत्र, दोनों को मजबूत करता है।

नागरिक भी अपनी सामूहिक शक्ति पहचानें

इस स्थिति को बदलने की जिम्मेदारी केवल राजनीतिक दलों पर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। आम नागरिक को अपने अधिकारों और आसपास हो रहे अन्याय के प्रति जागरूक रहना होगा। आज किसी दूसरे की शिकायत को अनदेखा करना कल अपनी आवाज को अकेला छोड़ देने जैसा हो सकता है।

मोहल्ले और गाँव के लोग साझा समस्याओं पर संगठित हों। शिकायतें लिखित रूप में दें, प्राप्ति का प्रमाण रखें, संबंधित विभाग से समयसीमा पूछें और कार्रवाई का विवरण माँगें। जरूरत पड़ने पर सूचना के अधिकार तथा उपलब्ध शिकायत निवारण व्यवस्थाओं का सहारा लें। शांतिपूर्ण, तथ्यपूर्ण और निरंतर प्रयास से ऐसी सार्वजनिक जवाबदेही बन सकती है जिसे केवल आश्वासन देकर टालना कठिन हो।

इस पहल का अर्थ राजनीति से दूर भागना नहीं है। इसका उद्देश्य राजनीतिक भागीदारी को अधिक जागरूक बनाना है। नागरिक किसी भी दल का समर्थन करे, लेकिन अपने प्रतिनिधि से प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता बनाए रखे। दल के प्रति पसंद इतनी प्रबल नहीं होनी चाहिए कि अपने ही क्षेत्र की बदहाली पर चुप रहना पड़े।

जनप्रतिनिधियों से नियमित सार्वजनिक सुनवाई, शिकायत दर्ज करने की स्पष्ट व्यवस्था और किए गए वादों की प्रगति का विवरण माँगा जाना चाहिए। हर समय किसी का निजी दूरभाष उठाना संभव न हो, फिर भी जनता की बात दर्ज करने और उसका उत्तर देने की भरोसेमंद व्यवस्था बनाना आवश्यक है।

प्रचार की पहुँच से किसी नेता की लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है; जनसेवा की परख उसके व्यवहार और काम से होगी। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती उस दिन दिखाई देगी जब बिना परिचय, बिना सिफारिश और बिना राजनीतिक संबंध वाला साधारण नागरिक भी अपनी बात रख सकेगा और उसे सम्मानपूर्वक उत्तर मिलेगा। जनता को यही कसौटी अपने सामने रखनी होगी—और इसे राजनीति के सामने भी रखना होगा।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

और पढ़ें