धन्वंतरि, लक्ष्मी और कुबेर की आराधना का दिन; धन के संरक्षण और सदुपयोग का संदेश
डॉ. घनश्याम बादल

जीवन में धन का महत्त्व है, लेकिन उसकी सार्थकता तभी है, जब वह सुख, संतोष और लोककल्याण का माध्यम बने। दीपावली की उत्सव शृंखला का आरंभ करने वाला धनतेरस इसी समृद्धि की कामना का पर्व है। इस दिन आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और धन के संरक्षक कुबेर की पूजा की जाती है। इस वर्ष धनतेरस 6 नवंबर को मनाया जाएगा।
धनतेरस को धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से जुड़ा है। धनतेरस पर त्रयोदशी तिथि के दौरान प्रदोष काल में लक्ष्मी और कुबेर की पूजा करने की परंपरा है। श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य और मंगल की कामना करते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय भगवान धन्वंतरि हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसी कारण धनतेरस का संबंध धन-संपदा के साथ आरोग्य से भी माना जाता है। यह पर्व स्मरण कराता है कि स्वस्थ जीवन भी मनुष्य की अनमोल संपदा है।
धन की प्राप्ति के साथ उसके संरक्षण की कामना
लोकमान्यता है कि धनतेरस पर कुबेर की आराधना करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। उन्हें धन का संरक्षक माना गया है। लक्ष्मी से धन की प्राप्ति और कुबेर से उसकी स्थिरता तथा सुरक्षा की कामना की जाती है।
कुबेर पूजा से जुड़ा संदेश है कि धन अर्जित करना जितना आवश्यक है, उसका संरक्षण और सदुपयोग भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। धार्मिक दृष्टि से धन केवल संग्रह की वस्तु नहीं, बल्कि परिवार की आवश्यकताएँ पूरी करने, दान देने और जरूरतमंदों की सहायता करने का साधन भी है।
भगवान कुबेर की पूजा में यह मंत्र प्रचलित है—
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।
एक अन्य प्रचलित मंत्र है—
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः।
धनतेरस पर कुबेर की पूजा का भाव केवल अधिक धन पाने की इच्छा तक सीमित नहीं है। इसका संदेश यह भी है कि मनुष्य परिश्रम से धन कमाए, उसे सुरक्षित रखे, अपव्यय से बचे और उसका उपयोग कल्याणकारी कार्यों में करे। धन को सार्थकता मनुष्य के विवेक और सदुपयोग से मिलती है।
खरीदारी से जुड़ी लोकपरंपराएँ
धनतेरस पर सोने-चाँदी के आभूषण और बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। कुछ लोकमान्यताओं में इस दिन खरीदी गई वस्तुओं को तेरह गुनी वृद्धि की कामना से जोड़ा जाता है। यह समृद्धि के प्रति विश्वास की अभिव्यक्ति है।
कई परिवारों में झाड़ू और धनिए के बीज खरीदने की परंपरा भी है। झाड़ू को घर की स्वच्छता और लक्ष्मी के स्वागत से जोड़ा जाता है। इसलिए धनतेरस पर घर की सफाई और नई झाड़ू लाने का विशेष महत्त्व माना जाता है।
हालाँकि पर्व का आनंद महँगी खरीदारी पर निर्भर नहीं करता। अपनी आवश्यकता और सामर्थ्य के अनुसार उपयोगी वस्तु खरीदकर भी यह उत्सव मनाया जा सकता है। श्रद्धा, स्वच्छता और संतोष इसके मूल भाव हैं।
पीतल के बर्तनों का महत्त्व
धनतेरस पर पीतल के बर्तन खरीदने की भी परंपरा है। कुछ लोकमान्यताओं में भगवान धन्वंतरि के अमृत कलश को पीतल का माना गया है। इसी विश्वास के कारण पीतल को उनसे जोड़कर देखा जाता है और इस धातु के बर्तनों की खरीदारी शुभ मानी जाती है।
नए बर्तन घर-परिवार की आवश्यकताओं और संपन्नता के प्रतीक भी हैं। इस प्रकार धनतेरस की खरीदारी में धार्मिक आस्था के साथ घरेलू उपयोगिता का भाव जुड़ा हुआ है।
द्वार और आँगन में जलाएँ दीप
धनतेरस को सामान्यतः दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव का पहला पर्व माना जाता है। इस दिन शाम को घर के मुख्य द्वार और आँगन में दीप जलाए जाते हैं। अनेक परिवारों में यम के निमित्त दीपदान की परंपरा भी है, जिसके साथ परिवार की कुशलता और दीर्घायु की कामना जुड़ी है।
दीपदान में मिट्टी के दीपकों के साथ कुछ स्थानों पर आटे से बने दीपकों का भी उपयोग किया जाता है। दीपों का प्रकाश घर के वातावरण को उत्सवमय बनाता है और आशा तथा मंगल का संदेश देता है।
पूजन और आराधना
धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करते हैं। कहीं लक्ष्मी चालीसा और कुबेर स्तोत्र का पाठ होता है, तो कहीं कुबेर यंत्र का पूजन किया जाता है।
पूजा का मूल भाव परिवार में सुख, संतोष और समृद्धि की कामना है। साथ ही यह अवसर अपने व्यवहार में उदारता लाने और जरूरतमंदों के जीवन में खुशियाँ बाँटने की प्रेरणा भी देता है।
राजा हीमा के पुत्र की लोककथा
धनतेरस से एक लोकप्रिय लोककथा भी जुड़ी है। इसके अनुसार राजा हीमा के सोलह वर्षीय पुत्र के बारे में भविष्यवाणी की गई थी कि विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह जानकर उसकी पत्नी ने पति के प्राणों की रक्षा का उपाय सोचा।
कथा के अनुसार उसने कक्ष के प्रवेश द्वार पर सोने-चाँदी के आभूषण और सिक्के रख दिए तथा अनेक दीप जला दिए। वह अपने पति को जगाए रखने के लिए रातभर गीत और कथाएँ सुनाती रही।
जब यम सर्प का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे, तो आभूषणों और दीपों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे भीतर प्रवेश नहीं कर सके और वहीं कथाएँ सुनते रहे। रात बीत गई और राजकुमार के प्राण बच गए। इस लोककथा को धनतेरस पर दीपदान की परंपरा से जोड़ा जाता है।
धनतेरस का उजास धन-संपदा के साथ विवेक, आरोग्य और करुणा से भी जीवन को समृद्ध करने का संदेश देता है। परिश्रम से अर्जित धन जब परिवार की खुशहाली और दूसरों की सहायता में काम आता है, तभी समृद्धि का यह पर्व अपने व्यापक अर्थ में सार्थक होता है।









