मैं राजनीति हूं… मेरे लिए नाजायज कुछ नहीं, सब जायज!

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नीति, नीयत और नैतिकता के बीच अपना अस्तित्व तलाशती राजनीति का आत्मकथ्य

राजेश खण्डेलवाल

मैं राजनीति हूं…! राज को नीति से चलाना मेरी परिभाषा है और नीति-निर्धारण मेरी अभिलाषा। लेकिन अनीति की बढ़ती संलिप्तता अब केवल मेरा राजफाश ही नहीं करती, बल्कि मेरा चीरहरण तक करने लगी है। यह मुझे बहुत खलता है, किंतु इस फसाद की जड़ शायद मैं स्वयं ही हूं।

मेरी छवि पहले कभी इतनी धूमिल नहीं थी, जितनी आज दिखाई देती है। मेरा भी ईमान था और आज भी है, लेकिन अब गिरगिट की तरह रंग बदलना जैसे मेरा स्वभाव मान लिया गया है।

मुझमें किसी गुमनाम व्यक्ति को फर्श से अर्श तक पहुंचाने का सामर्थ्य है तो अर्श से फर्श पर लाने की क्षमता भी। मेरी इसी शक्ति के कारण बड़े से बड़ा ताकतवर व्यक्ति भी मेरे सामने झुकने को विवश हो जाता है।

मेरा इतिहास मर्यादित, गरिमामयी और गौरवशाली रहा है। उसे आज भी समय-समय पर याद किया जाता है। लेकिन न जाने अब मुझे किसकी नजर लग गई है! मेरे अपने—यानी नेता—केवल अधीर ही नहीं दिखाई देते, बल्कि संयम भी खोते जा रहे हैं। नीति-निर्माण की नैतिक जिम्मेदारी आज भी उन्हीं के कंधों पर है, पर उनके आचरण से अब जनहित से अधिक स्वार्थ की बू आने लगी है।

मुझे प्रसन्नता तब होती थी, जब मेरे अपने दृढ़ इच्छाशक्ति से नैतिक मूल्यों की स्थापना करते और उनकी रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार रहते थे। आज भी कुछ लोग ऐसा करते हैं, लेकिन उनकी संख्या कम और पतन की घटनाएं अधिक दिखाई देती हैं।

नीति और नीयत ठीक हों तो नेतृत्व में भी साफगोई दिखाई देती है। मेरा दुर्भाग्य यह है कि चालाकी ने अब नेतृत्व की चाल ही नहीं, उसका चरित्र और चेहरा भी बिगाड़ दिया है। तभी तो मेरे अपनों की भाषा असंसदीय और आचरण अमर्यादित होता जा रहा है।

खोखले घोषणापत्रों तथा झूठे वादों और दावों ने मेरी कथनी और करनी के बीच गहरी खाई पैदा कर दी है। मेरी पाचन शक्ति इतनी सुदृढ़ है कि मैं ऐसे-ऐसे राज पचा जाती हूं, जो वर्षों तक बाहर नहीं आते। लेकिन जब वे रहस्य बेपर्दा होते हैं तो मुझे स्वयं से भी घृणा होने लगती है।

पहले मुझे गांव की चौपाल पर खेला जाता था। फिर मैं शिक्षण संस्थानों में खेली जाने लगी और अब शहर से लेकर राज्य और देश की पंचायतों तक मेरे खेल का विस्तार हो गया है। अंतर केवल इतना है कि पहले गरीब भी मेरे साथ खेल सकता था, लेकिन अब मैं धनबल और बाहुबल की होकर रह गई हूं।

मुझे पढ़ना भले ही आवश्यक न हो, लेकिन गढ़ना खूब आता है। तभी तो कई बार शिक्षा और योग्यता से दूर व्यक्ति भी मेरे सहारे राजसी सुख भोगने लगता है।

वैसे आज भी मुझे समाजसेवा का पर्याय माना जाता है। इसी उद्देश्य का दावा करते हुए प्रत्येक व्यक्ति मुझे अपनाता है, लेकिन सत्ता मिलते ही मेरा अपना मुझे ठगा हुआ छोड़ देता है। वह जनता की सेवा भूलकर अपनी और अपनों की सेवा-सुश्रूषा में ऐसा डूब जाता है, मानो निजी तिजोरी भरना ही उसका मूल उद्देश्य रहा हो।

सत्ता रूपी महल की चाबी मैं ही हूं। उसे पाने के लिए हर कोई आतुर दिखाई देता है। मेरे लिए ऐसी-ऐसी षड्यंत्रकारी बिसातें बिछाई जाती हैं, जिन्हें देखकर मैं स्वयं दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाती हूं। ऐसा करने वालों को धिक्कारने के लिए कई बार मेरे शब्दकोश में भी शब्द नहीं बचते।

मैं सर्वव्यापी हूं। घर-परिवार से लेकर समाज तक मेरा हस्तक्षेप है। संगठन निजी हो या सरकारी, आज शायद ही कोई मुझसे अछूता हो। मुझे अपनाने के बाद कई लोग अपनों को ही पराया समझने की भूल कर बैठते हैं और फिर दोष मेरे सिर मढ़ दिया जाता है। ऐसे हालात में अपनों द्वारा अपनों को हलाल किए जाने का मलाल मुझे भी होता है, लेकिन मैं कर भी क्या सकती हूं?

मैं निष्पक्षता की पक्षधर हूं, पर पक्ष और विपक्ष में बंटे मेरे अपनों ने मेरे माथे पर पक्षपात का ऐसा बदनुमा दाग लगा दिया है, जिसे चाहकर भी मिटा नहीं पाती। मेरा रवैया हमदर्दी से भरा है, लेकिन मेरे अपनों की बेदर्दी मेरे दामन पर हठधर्मिता का दाग लगा देती है।

मेरी नीति स्वयं को पाक-साफ बताती है, लेकिन ऐसा प्रायः केवल सत्तापक्ष ही मानता है। विपक्ष मुझे अनीति की संज्ञा देकर कोसता रहता है। यह बात मुझे कचोटती अवश्य है, किंतु जब वही विपक्ष सत्ता में आकर मेरा गुणगान करने लगता है तो मुझे आत्मसंतोष करना पड़ता है।

मैं जितनी उपयोगी हूं, उतना ही मेरा दुरुपयोग भी होता है। मेरे अपने निजी हित साधने के लिए ऐसी-ऐसी गलियां खोज लेते हैं, जिनका मुझे भी पहले ज्ञान नहीं होता। मेरा मान-मर्दन तब होता है, जब मेरा अपना स्वार्थवश कुटिल चाल चलता है और मैं मन मसोसकर रह जाती हूं।

मैं सच्ची हूं और ईमान की पक्की भी, लेकिन मेरे अपनों के झूठ का बोलबाला इतना बढ़ गया है कि मेरी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई है। कर्म ही मेरा धर्म है, फिर भी अधर्मी होने का पाप मुझे ही ढोना पड़ता है।

मैं स्वयं स्वप्न नहीं देखती, लेकिन मेरे अपने जनता को ऐसे-ऐसे दिवास्वप्न दिखाते हैं कि कई बार मुझे भी भ्रम होने लगता है। इसी भ्रमजाल में फंसा वतन अमन के लिए जतन करता हुआ छटपटाता रहता है।

मैं न धार्मिक हूं और न सांप्रदायिक। लेकिन मेरे अपनों ने जाति, धर्म और क्षेत्रवाद के चोले पहनाकर मुझे कट्टरपंथी तक बना दिया है। इससे मेरा मन बेचैन रहता है। मेरी आत्मा तब बिलख उठती है, जब मेरे अपने उन्मादी होकर समाज में फसाद पैदा कर देते हैं। ऐसे में वतन की सुलगती राख को मेरी अश्रुधारा भी आखिर कब तक ठंडा कर सकती है?

मेरा भी मान-सम्मान और स्वाभिमान है, लेकिन शायद मेरे अपनों के लिए इनका कोई मूल्य नहीं। मेरा आत्मबल आज भी कमजोर नहीं हुआ है। तभी तो लोकतंत्र रूपी मंदिर में मुझे पूजा जाता है।

मैं विकासपरक हूं, पर मेरे अपनों की राजनीति कई बार विकास की राह में रोड़ा बन जाती है। उनके कर्मों के कारण मुझे विनाशकारी कहलाने का दंश भी झेलना पड़ता है।

मैं निर्भीक और निडर हूं, लेकिन आज भी मुझे केवल अपना मत देने वाले मतदाता से डर लगता है। वह मेरी प्रत्येक चाल को भांप सकता है और समय आने पर उसे नेस्तनाबूद भी कर सकता है। अफसरशाही तो मेरे सामने पहले भी नतमस्तक थी और आज भी है।

मेरे लिए कुछ भी नाजायज नहीं माना जाता। तभी तो अक्सर कहा जाता है—राजनीति में सब कुछ जायज है।

लेकिन कभी-कभी मैं स्वयं से पूछती हूं—क्या वास्तव में सब कुछ जायज है?

यदि नीति से नैतिकता, सत्ता से सेवा और नेतृत्व से लोकहित समाप्त हो जाए, तो क्या मैं राजनीति रह जाती हूं या केवल स्वार्थ, छल और अवसरवाद का खेल बनकर रह जाती हूं?

इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है। इसका उत्तर तो अब मेरे सबसे बड़े निर्णायक—मतदाता—को ही देना है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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