वादों की नई पैकिंग, भावनाओं का बाजार और हर पांच वर्ष बाद फिर जागती उम्मीद
डॉ. शैलेश शुक्ला

नेता जी और जनता जनार्दन की अमर प्रेम कथा बहुत पुरानी है। इस देश में दो चीजें कभी समाप्त नहीं होतीं—जनता की उम्मीद और नेता जी के वादे। दोनों अमर हैं, अविनाशी हैं और हर पांच वर्ष बाद नया अवतार लेकर प्रकट हो जाते हैं।
हमारे नेता जी बड़े दयालु हैं। उन्हें मालूम है कि जनता को सबसे अधिक कष्ट सोचने से होता है, इसलिए वे यह जिम्मेदारी स्वयं उठा लेते हैं। खुद सोचते हैं, खुद बोलते हैं और तालियां भी खुद ही बजवा लेते हैं। जनता का काम सरल है—ताली बजाना, संदेश आगे भेजना और चुनाव के दिन एक बटन दबाकर घर लौट आना। इसके बाद अगले पांच वर्षों तक ठगा हुआ महसूस करना लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा है।
यह ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें अभिमन्यु घुसना तो जानता था, लेकिन हम घुसते ही फंस जाते हैं।
आंकड़े नहीं, भावनाएं चाहिए
नेता जी का पहला जादू भावना का है। वे जानते हैं कि जनता सोचने लगी तो दुकान बंद हो सकती है। इसलिए वे आंकड़े कम और भावनाएं अधिक परोसते हैं।
वे शायद ही बताएंगे कि रोजगार कितना बढ़ा, अस्पतालों में कितने डॉक्टर नियुक्त हुए या स्कूलों में शिक्षकों के कितने पद खाली हैं। वे मंच से बस इतना कहेंगे—“देश खतरे में है!”
इतना सुनते ही खून खौलने लगता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फिर कौन पूछे कि अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं और विद्यालय में शिक्षक क्यों नहीं? पहले देश बचाना जरूरी है, बाकी समस्याएं अगली योजना में देखी जाएंगी।
कभी हमें “विश्वगुरु” बनने का गर्व परोसा जाता है। यह सुनकर छाती फूल जाती है, भले ही जेब में पचास रुपये न हों। भावना में बहता आदमी बजट नहीं पूछता, केवल जयकारा लगाता है—और राजनीति को आखिर चाहिए भी क्या?
विकास एक अनुभूति है!
नेता जी का दूसरा जादू है—ऐसे वादे करना जिन्हें नापा ही न जा सके।
“हम विकास करेंगे, भ्रष्टाचार मिटाएंगे और सबको साथ लेकर चलेंगे।”
कितना विकास, कहां विकास, कब तक विकास और किस पैसे से विकास—ये छोटे लोगों के छोटे सवाल हैं। विकास तो एक अनुभूति है। कहीं गड्ढा भर गया तो विकास, कहीं स्ट्रीट लाइट लग गई तो विकास और किसी पुरानी योजना का नया उद्घाटन हो गया तो वह महाविकास!
ऐसे वादों का लाभ यह है कि कुछ हो गया तो कहा जाएगा—“वादा पूरा किया।” कुछ नहीं हुआ तो जवाब मिलेगा—“प्रक्रिया चल रही है।” आखिर विकास कोई मंजिल थोड़े ही है; वह निरंतर चलने वाली यात्रा है। जिस वादे को नापा नहीं जा सकता, उसकी जवाबदेही भी तय नहीं की जा सकती।
रोटी गिनी जाती है, पहचान नहीं
“बांटो और राज करो” का पुराना अंग्रेजी फार्मूला हमने देसी तड़के के साथ और प्रभावशाली बना लिया है। समाज को दो हिस्सों में बांट दीजिए—एक “हम” और दूसरा “वे”।
कभी अमीर बनाम गरीब, कभी अगड़ा बनाम पिछड़ा, कभी एक धर्म बनाम दूसरा और कभी राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रविरोधी। एक बार व्यक्ति ने स्वयं को “हम” में शामिल कर लिया तो वह अपने नेता की हर गलती माफ करने लगता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह किसी नेता की नहीं, अपने समूह की रक्षा कर रहा है।
पहले लड़ाई रोटी की थी, अब पहचान की है। नेता जी जानते हैं कि रोटी पर बहस में वे फंस सकते हैं, क्योंकि रोटी गिनी जा सकती है। पहचान पर वे कभी नहीं हारेंगे, क्योंकि पहचान केवल महसूस की जाती है।
आधे सच का पूरा कमाल
आंकड़ों का खेल और भी मजेदार है। नेता जी के झोले से ऐसे आंकड़े निकलते हैं कि बड़े-बड़े अर्थशास्त्री चकरा जाएं।
बताया जाएगा कि सौ किलोमीटर सड़क बनाई गई, लेकिन यह नहीं बताया जाएगा कि उस पर चला जा सकता है या नहीं और वह छह महीने टिकेगी भी या नहीं। निवेश बढ़ने का दावा होगा, पर कर्ज कितना बढ़ा—यह जानकारी पर्दे के पीछे रहेगी।
आधा सच पूरे झूठ से अधिक खतरनाक होता है, क्योंकि वह भरोसेमंद दिखाई देता है। झूठ पकड़ा जा सकता है, लेकिन आधा सच जनता को उलझा देता है—और उलझी हुई जनता सबसे सुविधाजनक जनता होती है।
काम से अधिक जरूरी तस्वीर
आजकल काम से अधिक फोटो आवश्यक है। राजनीति का नया मंत्र है—काम हो या न हो, तस्वीर शानदार होनी चाहिए।
सुबह किसान की पगड़ी पहनकर फोटो—“मैं किसान का बेटा हूं।” दोपहर मंदिर में घंटा बजाते हुए तस्वीर—“मैं संस्कारी हूं।” शाम को सूट-बूट में विमान के सामने फोटो—“मैं विकास पुरुष हूं।”
फीता कट गया, तस्वीर छप गई और विकास पूरा हो गया। सड़क छह महीने में उखड़ जाए तो ठेकेदार जिम्मेदार है, नेता जी नहीं।
कई बार शहर का नाम बदल दिया जाता है। सड़क वही, नाली वही, अस्पताल वही और विद्यालय वही—केवल नाम नया। राजनीति में कई बार नया नाम ही नया काम बन जाता है।
दिमाग बंद, नारा चालू
नारा ऐसा होना चाहिए कि दिमाग बंद हो जाए और जुबान चालू। किसी बात को दिन में सौ बार टीवी और हजार बार मोबाइल पर सुन लिया जाए तो वह झूठ भी सच जैसा लगने लगता है। मनोविज्ञान इसे बार-बार दोहराई गई बात का प्रभाव कहता है, नेता जी इसे प्रचार कहते हैं।
तथ्य भूल जाइए, धुन याद रखिए—क्योंकि वोट प्रायः तथ्य पर नहीं, धुन पर पड़ता है।
अगर कोई जागरूक नागरिक सवाल पूछ ही ले तो उसके लिए भी उत्तर तैयार है। आप पूछेंगे—अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं? जवाब आएगा—पिछली सरकार ने इतने वर्षों में क्या किया? आप पूछेंगे—महंगाई क्यों बढ़ रही है? वे बताएंगे—पड़ोसी देश की हालत देखिए।
आप वर्तमान पूछते हैं, वे आपको इतिहास में भेज देते हैं। आप रोटी मांगते हैं, वे इतिहास परोस देते हैं। हम भी भूतकाल की कहानी सुनकर वर्तमान का दर्द कुछ देर के लिए भूल जाते हैं।
खतरे में हिसाब नहीं मांगा जाता
हर दिन एक नया खतरा भी आवश्यक है। कभी देश खतरे में, कभी धर्म खतरे में और कभी संस्कृति खतरे में। खतरे में पड़ा आदमी हिसाब नहीं मांगता; वह स्वयं को बचाने वाले को कसकर पकड़ लेता है।
इसीलिए हर चुनाव को आखिरी चुनाव और हर राजनीतिक मुकाबले को अंतिम लड़ाई बना दिया जाता है। घबराया हुआ मतदाता सबसे वफादार मतदाता होता है—वह प्रश्न नहीं पूछता, केवल बटन दबाता है।
चुनाव आते ही मुफ्त के लड्डू भी बंटने लगते हैं। कभी बिजली मुफ्त, कभी लैपटॉप और कभी खाते में नकद राशि। अर्थशास्त्री बताते रहें कि खजाने पर बोझ बढ़ेगा, जनता सोचती है—खजाना बाद में खाली होगा, अभी तो जेब भर रही है।
व्यस्तता ही उपलब्धि है
अंत में आता है व्यस्तता का विराट प्रदर्शन। सुबह छह बजे संदेश, आठ बजे बैठक, दस बजे उद्घाटन और रात को विदेश यात्रा। जनता कहती है—“देखो, बेचारा कितना काम करता है; सोता तक नहीं!”
कोई यह नहीं पूछता कि उस व्यस्तता का परिणाम क्या निकला। कैमरा चल रहा है तो मान लिया जाता है कि काम भी चल रहा है।
सच यह है कि नेता जी अकेले हमें मूर्ख नहीं बनाते; हम भी बनने को तैयार बैठे रहते हैं। सोचना मेहनत का काम है और महसूस करना आसान। सवाल पूछना कठिन है और ताली बजाना सरल।
नेता जी हमारे मन के डॉक्टर हैं। उन्हें मालूम है कि हमें सच से अधिक कहानी और नेता से अधिक नायक चाहिए। जब तक यह चाह बनी रहेगी, नेता जी और जनता जनार्दन की अमर प्रेम कथा भी चलती रहेगी।
अगली बार कोई मंच से गरजे तो जेब में नहीं, दिमाग में हाथ डालकर केवल तीन सवाल पूछिए—कितना, कब तक और कैसे?
इतना पूछ लिया तो समझिए, आपने लोकतंत्र के सबसे बड़े व्यंग्य को समझ लिया।








