जब एक ही कक्षा में पढ़ते थे अमीर-गरीब के बच्चे, शिक्षा का आधार धन नहीं बल्कि प्रतिभा, परिश्रम और संस्कार होते थे
सुरेश गोयल धूप वाला
पूर्व जिला महामंत्री, भाजपा जिला हिसार

आज जब शिक्षा एक महंगी व्यवस्था और प्रतिस्पर्धा का विशाल बाजार बन चुकी है, तब स्मृतियां अनायास ही हमें 1960 के दशक में ले जाती हैं। वह समय संसाधनों की दृष्टि से भले ही सीमित था, लेकिन समानता, आत्मीयता और संस्कारों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध था। उस दौर की याद आज भी मन को गर्व और संतोष से भर देती है।
पैदल सफर, लेकिन थकान नहीं
हमारा हाई स्कूल घर से लगभग सवा-डेढ़ किलोमीटर दूर था। प्रतिदिन सुबह पैदल स्कूल जाना, आधी छुट्टी में घर आकर भोजन करना और फिर वापस स्कूल पहुंचना हमारी दिनचर्या थी। शाम को मित्रों के साथ हंसी-मजाक करते हुए घर लौटते थे।
इतनी दूरी रोज पैदल तय करने के बाद भी न थकान महसूस होती थी और न चेहरे पर कोई शिकन दिखाई देती थी। मित्रों का साथ ही हमारी सबसे बड़ी ऊर्जा हुआ करता था।
एक ही विद्यालय में पढ़ते थे सभी बच्चे
उस समय शहर के लगभग सभी बच्चे एक ही विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करते थे। वे चाहे संपन्न परिवारों से हों या सामान्य आय वाले परिवारों से, उनके बीच विद्यालय के स्तर पर कोई भेदभाव नहीं था। अमीर बच्चों के लिए अलग और गरीब बच्चों के लिए अलग स्कूल जैसी सोच समाज में नहीं थी।
आसपास के गांवों से विद्यार्थी साइकिल पर पढ़ने आते थे। विद्यालय एक सामाजिक संस्था द्वारा संचालित था, इसलिए फीस अत्यंत मामूली थी। वर्ष में एक बार कॉपियां और पुस्तकें बहुत कम कीमत पर खरीद ली जाती थीं। निकर और कमीज की साधारण वेशभूषा होती थी। उस सादगी में भी आत्मसम्मान और समानता का भाव था।
उसी विद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक विद्यार्थी आगे चलकर उच्च शिक्षा हासिल कर देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिष्ठित पदों पर पहुंचे। वर्षों बाद किसी सहपाठी से मुलाकात होने पर यह कहते हुए गर्व होता है—‘यह मेरे साथ पढ़ा हुआ सहपाठी है।’
उस समय किसी विद्यार्थी की पहचान उसके परिवार की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, संस्कार और परिश्रम से होती थी।
शिक्षक केवल अध्यापक नहीं, अभिभावक भी थे
उस दौर की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष नैतिक शिक्षा और संस्कार थे। अध्यापकों का व्यवहार विद्यार्थियों के प्रति आत्मीय और अभिभावक जैसा होता था। यदि कोई विद्यार्थी शरारत करता या अनुशासन तोड़ता, तो शिक्षक उसे डांट देते अथवा कभी-कभी दंड भी देते थे।
बच्चों की इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि वे घर जाकर शिक्षक की शिकायत करें। यदि किसी ने शिकायत कर भी दी, तो माता-पिता शिक्षक पर प्रश्न उठाने के बजाय पहले अपने बच्चे की गलती देखते थे। समाज में शिक्षक का सम्मान सर्वोपरि था। यही सम्मान विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण की आधारशिला बनता था।
आर्थिक स्थिति तय करने लगी शिक्षा का स्तर
समय के साथ शिक्षा का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। आज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अत्यंत महंगी हो चुकी है। प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चे को सर्वोत्तम शिक्षा दिलाना चाहता है, लेकिन आर्थिक असमानता उसके सपनों के सामने दीवार बनकर खड़ी हो जाती है।
महंगे निजी विद्यालयों में प्रायः संपन्न परिवारों के बच्चे ही पहुंच पाते हैं। सीमित आय वाले परिवार अपने बच्चों के लिए अपेक्षाकृत कम फीस वाले विद्यालय चुनने को विवश हैं। इस प्रकार बच्चे की शिक्षा का स्तर उसकी योग्यता से पहले माता-पिता की आर्थिक क्षमता से निर्धारित होने लगा है।
बचपन में ही खिंच रही विभाजन रेखा
शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती यह विभाजन रेखा किसी स्वस्थ और समतामूलक समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है। आर्थिक आधार पर अलग-अलग वातावरण में पले-बढ़े बच्चों के मन में हीनभावना अथवा श्रेष्ठता का भाव विकसित होने की आशंका बनी रहती है।
ऐसी परिस्थितियों में समान अवसर और सामाजिक समरसता की कल्पना कैसे साकार होगी? राष्ट्र तभी मजबूत बन सकता है, जब उसके प्रत्येक बच्चे को समान अवसर, समान सम्मान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो।
शिक्षा व्यवसाय नहीं, समाज निर्माण का माध्यम बने
आज आवश्यकता केवल नई शिक्षा नीति बनाने की नहीं, बल्कि शिक्षा को व्यवसाय बनने से बचाने की भी है। ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिसमें अमीर और गरीब परिवारों के बच्चे एक साथ बैठकर पढ़ें, खेलें और एक-दूसरे के जीवन को समझें।
एक ही कक्षा में अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों की उपस्थिति से समानता, संवेदनशीलता और भाईचारे की भावना विकसित होती है। यही वातावरण सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की सच्ची नींव रख सकता है।
विकास को केवल ऊंची इमारतों, आधुनिक तकनीक और महंगे विद्यालयों से नहीं मापा जा सकता। वास्तविक विकास उस दिन होगा, जब समाज का प्रत्येक बच्चा आर्थिक भेदभाव के बिना समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त कर सकेगा।
शायद तभी हम उस स्वर्णिम दौर की मूल भावना को वापस ला सकेंगे, जब शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कारवान, जिम्मेदार और श्रेष्ठ नागरिक बनाने की प्रक्रिया हुआ करती थी।
देश की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल नई शिक्षा नीति नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था है, जहां बच्चे की पहचान उसके पिता की आर्थिक स्थिति से नहीं, उसकी प्रतिभा, संस्कार और परिश्रम से हो। जिस दिन अमीर और गरीब का बच्चा फिर एक ही कक्षा में समान अवसरों के साथ पढ़ेगा, उसी दिन सामाजिक समानता का नया अध्याय प्रारंभ होगा।









