विधानसभा के बाहर कांग्रेस विधायकों से धक्का-मुक्की और सदन में निलंबन की कार्रवाई को बताया लोकतंत्र पर हमला
रेवाडी, 28 अगस्त। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने हरियाणा विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन कांग्रेस विधायकों के साथ हुई धक्का-मुक्की और आठ विधायकों के निलंबन की कड़ी निंदा की है।आठ विधायक इंदुराज नरवाल, विकास सहारण, देवेंद्र हंस, शकुंतला खटक, आदित्य सुरजेवाला, गोकुल सेतिया, जस्सी पेटवाड़ और बलराम दांगी थे। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा-संघ सत्ता के बल पर विपक्ष की आवाज दबाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं।
विद्रोही ने कहा कि गुरुवार को कांग्रेस विधायक काले कपड़े पहनकर और हाथों में तख्तियां लेकर शांतिपूर्ण ढंग से विधानसभा की ओर जा रहे थे। विधानसभा के प्रवेश द्वार पर सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक दिया और कथित रूप से धक्का-मुक्की की। कांग्रेस विधायक कुलदीप वत्स ने इस दौरान चोट लगने का आरोप भी लगाया था।
उन्होंने सवाल उठाया कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक और जनप्रतिनिधि का अधिकार है, फिर कांग्रेस विधायकों को विधानसभा तक पहुंचने से क्यों रोका गया? यदि निर्वाचित विधायकों की आवाज भी पुलिस बल के माध्यम से दबाई जाएगी तो विधानसभा सत्र बुलाने का औचित्य क्या रह जाएगा?
‘बिना ऊपरी आदेश ऐसी कार्रवाई संभव नहीं’
विद्रोही ने आरोप लगाया कि चंडीगढ़ पुलिस ने बिना किसी उच्चस्तरीय निर्देश के विधायकों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया होगा। इसकी निष्पक्ष जांच कर यह सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि कांग्रेस विधायकों को रोकने और उनके साथ कथित अभद्रता करने के निर्देश किसने दिए थे।
उन्होंने कहा कि सदन के भीतर कांग्रेस विधायकों ने पुलिस कार्रवाई का विरोध किया तो विधानसभा अध्यक्ष ने हंगामे के आरोप में पार्टी के आठ विधायकों को निलंबित कर दिया। उनका आरोप है कि विपक्ष की आपत्ति सुनने और पूरे घटनाक्रम की जांच कराने के बजाय निलंबन की कार्रवाई करना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है।
लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाए जनता
विद्रोही ने हरियाणा के नागरिकों से इस घटनाक्रम को गंभीरता से समझने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सत्ता के बल पर विपक्ष एवं असहमति की आवाज दबाने की प्रवृत्ति का समय रहते विरोध नहीं किया गया तो लोकतांत्रिक संस्थाएं लगातार कमजोर होती जाएंगी।








