सरकारी सेवाएं अधिकार हैं, उपकार नहीं—व्यवस्था ऐसी हो कि नागरिक को सिफारिश, पहचान और बार-बार दफ्तर जाने की जरूरत न पड़े
डॉ. शैलेश शुक्ला

लोकतंत्र का सबसे सरल अर्थ है—जनता का शासन, जनता के लिए शासन और जनता की भागीदारी वाला शासन। लेकिन यदि इसी व्यवस्था में जनता अपने छोटे-छोटे कामों के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाती रहे, घंटों कतारों में खड़ी रहे, एक मेज से दूसरी मेज तक भेजी जाए और अपने अधिकार की सुविधा पाने के लिए किसी अधिकारी या कर्मचारी की कृपा की प्रतीक्षा करे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—हमारा जनतंत्र आखिर किसके लिए है?
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि और सरकारी कर्मचारी जनता के सेवक माने जाते हैं, लेकिन व्यवहार में अनेक बार तस्वीर उलटी दिखाई देती है। यह समस्या केवल नागरिक के समय की बर्बादी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी गरिमा, अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उसके विश्वास से भी जुड़ी है।
घोषणाएं नहीं, नागरिक की सुविधा असली पैमाना
लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने कार्यालय बने, कितनी योजनाएं घोषित हुईं या कितनी बैठकों का आयोजन किया गया। असली सवाल यह है कि सामान्य नागरिक का जीवन कितना आसान हुआ।
यदि किसी व्यक्ति को अपने वैध अधिकार के लिए बार-बार आवेदन करना पड़े, वही कागज अलग-अलग कार्यालयों में जमा कराने पड़ें और हर चरण पर यह पता लगाना पड़े कि अब किस दरवाजे पर जाना है, तो व्यवस्था में गंभीर कमी है।
सरकार का उद्देश्य नागरिक को प्रक्रिया में उलझाना नहीं, उसकी समस्या का समाधान करना होना चाहिए। कार्यालय, नियम, अधिकारी, तकनीक और योजनाएं साधन हैं; जनता उनका अंतिम लक्ष्य है। जब साधन ही लक्ष्य पर भारी पड़ने लगें, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है।
नियमों और कागजों की भूलभुलैया
एक सामान्य व्यक्ति केवल यह जानना चाहता है कि उसका काम कैसे होगा, कौन-से दस्तावेज चाहिए, कितना समय लगेगा और काम न होने पर शिकायत कहां करनी है। लेकिन उसे कई बार नियमों, कागजों और जिम्मेदारियों की ऐसी भूलभुलैया मिलती है, जिसमें वह स्वयं को असहाय महसूस करने लगता है।
जिस राज्य ने नागरिकों के लिए व्यवस्था बनाई है, उसी व्यवस्था को समझने और उसमें रास्ता खोजने का बोझ भी नागरिकों पर डाल दिया गया है। प्रशासन की भाषा सरल, प्रक्रियाएं स्पष्ट और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
नागरिक को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वह कोई उपकार मांगने आया है। वह अपनी वैध सेवा और अधिकार प्राप्त करने आया है।
डिजिटल व्यवस्था भी नया चक्कर न बने
आज तकनीक ने ऐसी संभावनाएं पैदा की हैं जिनके माध्यम से बहुत-से सरकारी काम घर से या निकटतम सुविधा केंद्र से किए जा सकते हैं। लेकिन केवल ऑनलाइन पोर्टल बना देना पर्याप्त नहीं है।
यदि वेबसाइट कठिन हो, आवेदन बार-बार असफल हो, दस्तावेज अपलोड न हों, आवेदन की स्थिति स्पष्ट न मिले अथवा डिजिटल सुविधा से वंचित लोगों के लिए कोई सरल वैकल्पिक व्यवस्था न हो, तो तकनीक भी नागरिक के लिए नया चक्कर बन जाती है।
डिजिटल शासन का उद्देश्य कार्यालय की कतार को मोबाइल अथवा कंप्यूटर की कतार में बदलना नहीं होना चाहिए। तकनीक तभी सफल मानी जाएगी जब वह नागरिक का समय बचाए, प्रक्रिया सरल बनाए और निर्णय में पारदर्शिता बढ़ाए।
हर सेवा की समय सीमा और जवाबदेही तय हो
जनता को दफ्तरों के चक्कर लगाने का एक बड़ा कारण जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण न होना भी है। नागरिक को अक्सर यह पता नहीं होता कि उसके आवेदन पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी किस अधिकारी की है और निर्णय कितने समय में होना चाहिए।
यदि प्रत्येक सेवा के लिए स्पष्ट समय सीमा, जिम्मेदार अधिकारी, आवेदन की वास्तविक स्थिति और शिकायत का सरल रास्ता उपलब्ध हो, तो नागरिक की निर्भरता काफी हद तक कम की जा सकती है।
किसी अधिकारी या कर्मचारी के व्यक्तिगत व्यवहार पर नागरिक का काम निर्भर नहीं होना चाहिए। नियम व्यक्ति से बड़े हों और व्यवस्था ऐसी हो कि सही काम के लिए किसी विशेष व्यक्ति तक पहुंच बनाना जरूरी न रहे।
सिफारिश की जरूरत व्यवस्था की कमजोरी
विधायक, सांसद, पार्षद और अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि जनता की समस्याएं सुनने तथा उन्हें उचित मंच तक पहुंचाने के लिए चुने जाते हैं। लेकिन प्रत्येक नागरिक के छोटे-छोटे प्रशासनिक काम व्यक्तिगत हस्तक्षेप से करवाना जनप्रतिनिधियों का मूल दायित्व नहीं होना चाहिए।
यदि किसी प्रमाणपत्र या सामान्य सरकारी सेवा के लिए भी जनप्रतिनिधि की सिफारिश जरूरी हो जाए, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी का प्रमाण है।
जनप्रतिनिधियों को ऐसी व्यवस्था बनाने पर जोर देना चाहिए, जिसमें नागरिक बिना सिफारिश, पहचान और व्यक्तिगत संपर्क के अपना अधिकार प्राप्त कर सके। लोकतंत्र का उद्देश्य नागरिक की पहुंच किसी प्रभावशाली व्यक्ति तक बनाना नहीं, बल्कि उसकी सीधी पहुंच व्यवस्था तक सुनिश्चित करना है।
सरकारी कार्यालय सेवा केंद्र बनें
हर सरकारी कर्मचारी को भ्रष्ट या असंवेदनशील कहना अनुचित होगा। बड़ी संख्या में कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। लेकिन जहां नागरिकों को अनावश्यक देरी, अस्पष्ट जवाब, असम्मानजनक व्यवहार या बार-बार बुलाए जाने का सामना करना पड़ता है, वहां सुधार आवश्यक है।
सरकारी कार्यालय सार्वजनिक सेवा के केंद्र हैं, सत्ता प्रदर्शन के स्थान नहीं। कार्यालय आने वाला नागरिक पहले ही कोई समस्या लेकर आता है। उसे उससे भी बड़ी समस्या देकर वापस भेजना प्रशासन की सफलता नहीं हो सकती।
एक मुस्कान, स्पष्ट जानकारी और सही मार्गदर्शन भी सार्वजनिक सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नागरिक केवल मतदाता नहीं
लोकतंत्र में नागरिक मतदाता होने के साथ-साथ राज्य का केंद्र भी है। चुनाव के समय उसके पास वोट की शक्ति होती है, लेकिन उसकी नागरिकता का मूल्य केवल मतदान तक सीमित नहीं किया जा सकता।
उसे सम्मान, पारदर्शिता, समयबद्ध सेवा और न्यायपूर्ण व्यवहार का अधिकार है। चुनाव के बाद भी सरकार और जनता का संबंध समाप्त नहीं होता। सरकारें, अधिकारी और योजनाओं के नाम बदलते रहते हैं, लेकिन नागरिक और उसकी जरूरतें बनी रहती हैं।
यदि सरकार जनता से केवल मतदान के समय संपर्क करे और उसके बाद जनता अपने कामों के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाती रहे, तो लोकतंत्र का यह संबंध अधूरा ही कहा जाएगा।
सरकार स्वयं से पूछे—नागरिक को बुलाना क्यों पड़ा?
हमें ऐसी प्रशासनिक संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमें सरकार स्वयं से पूछे कि नागरिक को कार्यालय तक क्यों आना पड़ रहा है। क्या यह काम स्वतः नहीं हो सकता? क्या उपलब्ध सरकारी अभिलेखों से जानकारी नहीं ली जा सकती? क्या एक ही दस्तावेज बार-बार मांगना जरूरी है? क्या आवेदन की स्थिति नागरिक को स्वतः नहीं बताई जा सकती?
सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए—जो जानकारी सरकार के पास पहले से उपलब्ध है, वह नागरिक से दोबारा न मांगी जाए; जहां प्रक्रिया सरल हो सकती है, वहां उसे जटिल न बनाया जाए और जहां निर्णय समय पर लिया जा सकता है, वहां नागरिक को अनिश्चित प्रतीक्षा में न रखा जाए।
व्यवस्था को अपने काम से देना होगा उत्तर
लोकतंत्र की सफलता सत्ता के गलियारों में नहीं, नागरिक के रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देनी चाहिए। लोकतंत्र तब मजबूत होगा जब वृद्ध व्यक्ति को पेंशन के लिए अनावश्यक चक्कर न लगाने पड़ें, विद्यार्थी को प्रमाणपत्र के लिए भटकना न पड़े, किसान को अपने वैध काम के लिए कई कार्यालयों में न जाना पड़े और मरीज को सहायता के लिए पहचान या सिफारिश न खोजनी पड़े।
जनसेवक सचमुच जनसेवक तभी कहलाएगा, जब उसकी सेवा नागरिक तक पहुंचे—न कि नागरिक उसकी तलाश में भटकता रहे।
इसलिए सवाल आज भी व्यवस्था के सामने खड़ा है—जनसेवकों के चक्कर लगाती जनता, यह कैसा जनतंत्र? इसका उत्तर भाषणों और घोषणाओं से नहीं, व्यवस्था को अपने काम से देना होगा। सच्चा जनतंत्र वही है, जिसमें जनता को सरकार तक पहुंचने के रास्ते न खोजने पड़ें, बल्कि सरकार स्वयं जनता तक पहुंचने के रास्ते बनाती रहे।








