तकनीक, संसाधन, स्पष्ट दृष्टि और निष्पक्ष व्यवस्था ही भारत को बना सकती है खेल महाशक्ति
डॉ. घनश्याम बादल

राष्ट्रीय खेल दिवस भारत के खेल-संकल्प को दोहराने का अवसर है। यदि इस संकल्प पर ईमानदारी और दृढ़ता से आगे बढ़ा जाए तो भारत को अंतरराष्ट्रीय खेल शक्ति बनाया जा सकता है। यह दिवस हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की असाधारण प्रतिभा और वर्ष 1928, 1932 तथा 1936 के ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी की स्वर्णिम सफलताओं की याद दिलाता है। वह दौर था, जब भारत ने खेल के मैदान पर पूरी दुनिया को अपनी क्षमता का परिचय दिया था।
आज राष्ट्रीय खेल दिवस पर असली सवाल यह नहीं है कि हमने कितने पदक जीते, बल्कि यह है कि क्या खेल हमारे समाज की जीवनशैली और शिक्षा-व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा बन पाए हैं?
भारत की समृद्ध खेल परंपरा
भारत में वैदिक काल से लेकर रामायण और महाभारत के आख्यानों तक धनुर्विद्या, मल्लयुद्ध, अश्वारोहण और शारीरिक कौशल का उल्लेख मिलता है। आगे चलकर कबड्डी, कुश्ती, खो-खो, मलखंभ और गिल्ली-डंडा जैसे अनेक देशज खेल गांवों एवं कस्बों की सामाजिक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बने।
दक्षिण भारत में कलरिपयट्टु और उत्तर-पश्चिम भारत में अखाड़ों की कुश्ती परंपरा ने शारीरिक क्षमता को अनुशासन और साधना से जोड़ा। आज मलखंभ, कलरिपयट्टु, गतका, थांग-ता, योगासन और सिलंबम जैसे पारंपरिक खेलों को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
औपनिवेशिक दौर में क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल और टेनिस जैसे आधुनिक संगठित खेलों का विस्तार हुआ। स्वतंत्रता के बाद खेल राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक बने। लंबे समय तक हॉकी भारत की खेल पहचान रही, लेकिन धीरे-धीरे क्रिकेट ने अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल कर ली। इसके बाद बैडमिंटन, कुश्ती, मुक्केबाजी, निशानेबाजी, भारोत्तोलन, एथलेटिक्स, टेबल टेनिस और तीरंदाजी सहित अनेक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
खेल अब केवल मनोरंजन नहीं
पिछले दो दशकों में भारतीय खेल जगत में उल्लेखनीय बदलाव आया है। ओलंपिक और पैरालंपिक में खिलाड़ियों के बेहतर प्रदर्शन, पेशेवर खेल प्रतियोगिताओं के विस्तार, कॉरपोरेट प्रायोजन, खेल विज्ञान, आधुनिक प्रशिक्षण और मीडिया की बढ़ती भूमिका ने खेलों को केवल शौक या मनोरंजन तक सीमित नहीं रहने दिया। खेल अब एक संभावनाशील करियर के रूप में भी उभर रहे हैं।
सबसे उत्साहजनक परिवर्तन यह है कि छोटे शहरों और गांवों से निकलने वाले खिलाड़ी भी राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच रहे हैं। खेलो इंडिया जैसी योजनाओं के माध्यम से आधारभूत ढांचे के विकास, प्रतिभाओं की पहचान, खेल केंद्रों एवं अकादमियों की स्थापना और महिला, दिव्यांग, ग्रामीण तथा जनजातीय खिलाड़ियों को अवसर देने के प्रयास हुए हैं।
इन योजनाओं का उद्देश्य गांव और स्कूल के मैदान से लेकर ओलंपिक पोडियम तक प्रतिभाओं के लिए निरंतर मार्ग तैयार करना है। इसके बावजूद तस्वीर अभी पूरी तरह उजली नहीं है।
प्रतिभा बहुत, व्यवस्था कमजोर
भारत में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कमी उन्हें समय रहते पहचानने, प्रशिक्षण देने और लगातार तराशने वाली भरोसेमंद व्यवस्था की है। देश में लाखों बच्चे खेलना चाहते हैं, लेकिन अनेक विद्यालयों में पर्याप्त मैदान नहीं हैं। कहीं मैदान हैं तो प्रशिक्षित कोच नहीं, कहीं कोच हैं तो उपकरण नहीं और कहीं प्रतिभा है तो आर्थिक संसाधन नहीं हैं।
ग्रामीण, जनजातीय और पिछड़े क्षेत्रों की प्रतिभाओं के सामने चुनौतियां और भी बड़ी हैं। कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों का सफर साधनों, उचित मार्गदर्शन अथवा चयन प्रक्रिया में अवसर के अभाव के कारण शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाता है।
भारत को खेल महाशक्ति बनाने की शुरुआत ओलंपिक पोडियम से नहीं, गांव और स्कूल के मैदान से होगी।
पढ़ाई का प्रतिद्वंद्वी नहीं खेल
हमारी दूसरी बड़ी समस्या शिक्षा और खेल के बीच कृत्रिम टकराव है। अधिकांश अभिभावक खेल को पढ़ाई का प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। विद्यालयों में परीक्षा का दबाव बढ़ते ही खेल का पीरियड समाप्त कर दिया जाता है। खेल-कूद को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा मानने के बजाय अक्सर ‘अतिरिक्त गतिविधि’ समझ लिया जाता है।
खेल बच्चों को केवल शारीरिक रूप से मजबूत नहीं बनाते, बल्कि उनमें अनुशासन, नेतृत्व, टीम भावना, निर्णय क्षमता, आत्मविश्वास और हार स्वीकार कर दोबारा प्रयास करने का साहस भी विकसित करते हैं। जब तक खेल को शिक्षा की मुख्यधारा का अभिन्न हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक व्यापक खेल संस्कृति का सपना अधूरा रहेगा।
समान अवसर अभी दूर
महिला खिलाड़ियों की स्थिति में सुधार हुआ है और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बढ़ाया है, फिर भी लैंगिक असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। प्रशिक्षण सुविधाओं, सुरक्षित वातावरण, आर्थिक सहायता और प्रतियोगिताओं तक पहुंच में आज भी अंतर दिखाई देता है।
दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए भी अवसर और सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन प्रत्येक जिले तथा प्रत्येक स्तर पर समान और सुलभ व्यवस्था अभी दूर की मंजिल है। देश की पैरालंपिक सफलताओं को स्थायी आधार देने के लिए जमीनी ढांचा विकसित करना आवश्यक है।
खेल प्रशासन में पारदर्शिता, चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता, खिलाड़ियों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, पोषण, चोटों की रोकथाम और करियर की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। खिलाड़ियों को पदक जीतने पर सम्मानित करना पर्याप्त नहीं है; संघर्ष और प्रशिक्षण के वर्षों में भी उनके साथ खड़ा होना आवश्यक है।
एक खेल तक सीमित न रहे देश
खेलों का अत्यधिक व्यावसायीकरण और कुछ चुनिंदा खेलों पर संसाधनों का केंद्रीकरण भी गंभीर चुनौती है। क्रिकेट की लोकप्रियता अपनी जगह है, लेकिन भारत को एक खेल प्रधान नहीं, बल्कि बहु-खेल राष्ट्र बनना होगा।
एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक्स, साइकिलिंग, तलवारबाजी और नौकायन जैसे खेलों का व्यापक आधार तैयार किए बिना ओलंपिक महाशक्ति बनने की आकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। मीडिया, प्रायोजकों और खेल संस्थाओं को अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय खेलों तथा उनके खिलाड़ियों को भी पर्याप्त स्थान देना होगा।
मैदान, प्रशिक्षक और सुरक्षा जरूरी
देश में मजबूत खेल संस्कृति विकसित करने के लिए प्रत्येक विद्यालय में सुरक्षित और उपयोगी खेल मैदान होना चाहिए। प्रत्येक ब्लॉक स्तर पर प्रशिक्षित कोच, फिजियोथेरेपिस्ट, पोषण विशेषज्ञ और खेल विज्ञान से जुड़ी सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए।
प्रतिभा खोज अभियान केवल महानगरों तक सीमित न रहें। गांवों, जनजातीय क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को इसके केंद्र में रखा जाए। खिलाड़ियों के लिए पढ़ाई और खेल साथ जारी रखने की लचीली व्यवस्था बनाई जाए।
खेल छात्रवृत्ति, बीमा, चोट लगने के बाद उपचार एवं पुनर्वास, मनोवैज्ञानिक सहायता और खेल जीवन समाप्त होने के बाद रोजगार की ठोस व्यवस्था भी जरूरी है। खिलाड़ियों को केवल पदक जीतने के समय याद करना और बाद में भूल जाना किसी सशक्त खेल राष्ट्र की पहचान नहीं हो सकती।
तकनीक बने भविष्य की ताकत
तकनीकी श्रेष्ठता भविष्य के खेलों की कुंजी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आंकड़ा विश्लेषण, पहनने योग्य उपकरण, वीडियो विश्लेषण और आधुनिक खेल विज्ञान की सहायता से प्रतिभाओं की पहचान तथा प्रशिक्षण को अधिक वैज्ञानिक बनाया जा सकता है।
भारत के पास विशाल युवा आबादी, व्यापक प्रतिभा आधार और बढ़ती अर्थव्यवस्था का लाभ है। आवश्यकता इन शक्तियों को एक सुव्यवस्थित, पारदर्शी और निष्पक्ष खेल पारिस्थितिकी तंत्र में बदलने की है।
राष्ट्रीय खेल दिवस पर हमें संकल्प लेना होगा कि खेल केवल कुछ प्रतिभाशाली युवाओं का क्षेत्र बनकर न रह जाए। प्रत्येक बच्चे को खेलने का अधिकार, प्रत्येक प्रतिभा को अवसर और प्रत्येक खिलाड़ी को सम्मान मिलना चाहिए।
भारत को खेल महाशक्ति बनाने की शुरुआत ओलंपिक पोडियम से नहीं, गांव के उस मैदान से होगी जहां कोई बच्चा पहली बार दौड़ना, कूदना या गेंद पकड़ना सीखता है। यदि उस बच्चे के हाथ में संसाधन, साथ में प्रशिक्षित मार्गदर्शक और सामने आगे बढ़ने का निष्पक्ष अवसर होगा तो ध्यानचंद की विरासत केवल इतिहास की कहानी नहीं रहेगी—वह भारत के भविष्य की पहचान बनेगी।








