महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते जरूरी खर्चों के बीच त्योहारों का बजट घटाने को मजबूर परिवार
सरदूल सिंह

उत्तर भारत में रक्षाबंधन और ईद के साथ राजस्थान के प्रमुख लोकपर्वों एवं मेलों—बाबा रामदेव जयंती और गोगाजी मेले—का समय सामान्यतः बाजारों में नई रौनक लेकर आता है। दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ रहती है और छोटे व्यापारियों को अच्छी बिक्री की उम्मीद होती है। मगर इस बार तस्वीर अलग दिखाई दे रही है। अनेक बाजारों में अपेक्षित चहल-पहल नहीं है और दुकानदार ग्राहकों की प्रतीक्षा में खाली बैठे हैं।
व्यापारियों से बातचीत करने पर उनकी चिंता साफ झलकती है। कई छोटे दुकानदारों का कहना है कि बिक्री इतनी कम है कि रोजमर्रा का खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है। यह स्थिति केवल व्यापारिक मंदी का संकेत नहीं, बल्कि आम नागरिकों की घटती क्रय शक्ति और बढ़ती आर्थिक असुरक्षा को भी सामने लाती है।
महंगाई ने बिगाड़ा घरेलू बजट
एक तरफ बाजारों में ग्राहक कम हैं, दूसरी तरफ फल-सब्जियों, चीनी, गुड़ और दूसरी आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने से घरेलू बजट पर दबाव बढ़ा है। भवन निर्माण सामग्री और सोने-चांदी की कीमतों में तेजी ने भी विवाह, मकान निर्माण और अन्य सामाजिक आयोजनों को महंगा बना दिया है।
महंगाई का असर अब सामाजिक रिश्तों और परंपराओं पर भी दिखाई देने लगा है। रक्षाबंधन जैसे पर्वों पर होने वाले लेन-देन को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित व्यंग्यात्मक वीडियो और टिप्पणियां बताती हैं कि बहुत से परिवार त्योहारों को आनंद के साथ-साथ अतिरिक्त आर्थिक बोझ के रूप में भी देखने लगे हैं।
आय नहीं बढ़ी, खर्च लगातार बढ़े
लोगों का सामाजिक व्यवहार उनकी भौतिक और आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। जब रोजगार के अवसर सीमित हों, आमदनी में अपेक्षित वृद्धि न हो और जीवन-यापन की लागत लगातार बढ़ती जाए तो परिवार स्वाभाविक रूप से गैर-अनिवार्य खर्चों में कटौती करता है। त्योहारों की खरीदारी भी सबसे पहले इसी कटौती की चपेट में आती है।
बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और मकान किराए जैसे अनिवार्य खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। सीमित आय वाले परिवारों के पास त्योहारों, मेलों और सामाजिक कार्यक्रमों के लिए बहुत कम धन बचता है। यही कारण है कि दुकानों पर ‘सेल’ के बोर्ड और भारी प्रचार के बावजूद बिक्री अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच रही।
ग्रामीण आय में गिरावट का बाजार पर असर
भारत की बड़ी आबादी आज भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। अनिश्चित मानसून तथा खाद, बीज, कीटनाशक, डीजल और कृषि उपकरणों की बढ़ती लागत ने खेती को महंगा बनाया है। इसके मुकाबले किसानों को अपनी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिलने की शिकायत लंबे समय से बनी हुई है।
ग्रामीण परिवारों की आय घटने का सीधा प्रभाव कस्बों और छोटे शहरों के बाजारों पर पड़ता है। किसानों और खेत मजदूरों के हाथ में पैसा आने पर ही कपड़ा, मिठाई, घरेलू सामान, कृषि उपकरण और दूसरी वस्तुओं की स्थानीय मांग बढ़ती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ने से छोटे दुकानदार और कारीगर भी प्रभावित होते हैं।
रोजगार संकट से मांग कमजोर
बाजार में मांग पैदा करने के लिए लोगों की जेब में पैसा होना जरूरी है। मगर स्थायी रोजगार के अवसर कम होने, ठेका प्रथा बढ़ने और कम वेतन पर अधिक काम लिए जाने से श्रमिकों एवं कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई है।
तकनीक और स्वचालन के बढ़ते प्रयोग के साथ उत्पादन तो बढ़ सकता है, लेकिन यदि रोजगार और मजदूरी उसी अनुपात में नहीं बढ़ते तो वस्तुओं को खरीदने वाले उपभोक्ता कम होते जाते हैं। उत्पादन और उपभोग के बीच यही असंतुलन आर्थिक मंदी को गहरा करता है।
जब श्रमिक और कर्मचारी की जेब में पैसा नहीं पहुंचेगा तो वह बाजार तक कैसे आएगा?
मनरेगा की भूमिका भी महत्वपूर्ण
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों, विशेषकर महिलाओं, को पूरक आय उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके क्रियान्वयन में सुस्ती, काम की कमी अथवा मजदूरी भुगतान में देरी होने पर स्थानीय बाजारों की मांग भी प्रभावित होती है।
मनरेगा से मिलने वाली राशि ग्रामीण परिवारों के लिए भले ही सीमित हो, लेकिन यही पैसा राशन, कपड़े, बच्चों की पढ़ाई और त्योहारों की छोटी-मोटी खरीदारी के रूप में स्थानीय अर्थव्यवस्था में पहुंचता है।
व्यक्तिगत नहीं, ढांचागत समस्या
आर्थिक मंदी को केवल किसी व्यक्ति या व्यापारी की विफलता मानना उचित नहीं होगा। यह रोजगार, मजदूरी, कृषि आय, महंगाई और सार्वजनिक नीतियों से जुड़ा व्यापक ढांचागत प्रश्न है। यदि उत्पादन बढ़ता रहे, लेकिन उस उत्पादन को खरीदने वाली आबादी की आय न बढ़े तो बाजार में मांग स्वाभाविक रूप से कमजोर होगी।
नई तकनीक का उद्देश्य मानव श्रम को पूरी तरह अप्रासंगिक बनाना नहीं, बल्कि काम को आसान और उत्पादक बनाना होना चाहिए। तकनीकी प्रगति का लाभ केवल पूंजी के मालिकों तक सीमित रहने के बजाय श्रमिकों, कर्मचारियों और उपभोक्ताओं तक भी पहुंचना चाहिए।
समाधान के लिए नीतिगत बदलाव जरूरी
बाजारों में स्थायी रौनक केवल विज्ञापन, छूट अथवा त्योहारों के भावनात्मक आह्वान से नहीं लौटेगी। इसके लिए लोगों की वास्तविक आय और क्रय शक्ति बढ़ानी होगी।
इसके प्रमुख उपाय हो सकते हैं—
- व्यापक स्तर पर स्थायी और सम्मानजनक रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं।
- श्रमिकों को जीवन-यापन की लागत के अनुरूप उचित वेतन मिले।
- आधुनिक तकनीक से बढ़ी उत्पादकता का लाभ काम के घंटे घटाने और अधिक लोगों को रोजगार देने में इस्तेमाल किया जाए।
- मनरेगा को पर्याप्त बजट देकर समय पर काम और मजदूरी सुनिश्चित की जाए।
- कृषि लागत नियंत्रित कर किसानों को उपज का लाभकारी मूल्य दिया जाए।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसे आवश्यक खर्चों का बोझ कम करने के लिए सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत किया जाए।
बाजार की रौनक जनता की आय से
आर्थिक तंगी केवल बाजार की बिक्री नहीं घटाती, बल्कि समाज में निराशा, अपराध और तनाव बढ़ने का कारण भी बन सकती है। बढ़ती विषमता और बेरोजगारी लंबे समय तक बनी रहें तो सामाजिक असंतोष गहराना स्वाभाविक है।
त्योहारों की वास्तविक रौनक सजावट, प्रचार और महंगी वस्तुओं से नहीं, बल्कि आम परिवार की आर्थिक सुरक्षा से आती है। इसलिए पूर्ण रोजगार, उचित मजदूरी और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुनिश्चित किए बिना सूने बाजारों की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।









