जाति और ऊंच-नीच के बंधनों को चुनौती देकर संत रविदास ने कर्म, समानता और मानव-मर्यादा पर आधारित समाज की संकल्पना प्रस्तुत की
डॉ. वेदप्रकाश

संत रविदास जी की 650वीं जयंती के उपलक्ष्य में भारतीय जनता पार्टी की ओर से देशभर में ‘समरसता संकल्प अभियान’ चलाया जा रहा है। इस अभियान का नेतृत्व भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल सिंह आर्य कर रहे हैं। यह अभियान संत रविदास के विचारों और सामाजिक समरसता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास है।
लाल सिंह आर्य ने अपने एक वक्तव्य में कहा कि गुरु रविदास का जीवन और उनका संदेश प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणादायी है। कोई व्यक्ति जाति के आधार पर छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि उसके कर्म ही उसे छोटा अथवा महान बनाते हैं। गुरु रविदास ने अपना संपूर्ण जीवन समाज को सशक्त बनाने और जन-जन को जागृत करने में समर्पित कर दिया। इसलिए उनका जीवन सदैव अनुकरणीय बना रहेगा।
सामाजिक जकड़न के विरुद्ध आवाज
मध्यकालीन भारतीय समाज अनेक प्रकार की सामाजिक विषमताओं, छुआछूत और जातिगत भेदभाव से जकड़ा हुआ था। ऐसे समय में संत रविदास ने समाज के नव-निर्माण की संकल्पना प्रस्तुत की। उन्होंने बाह्य आडंबरों और मिथ्या आचरण का न केवल विरोध किया, बल्कि समाज को सत्य, सेवा और कर्म के मार्ग पर चलने का संदेश भी दिया।
उन्होंने कहा—
“रैदास हमारो राम तो, सकल रहयो भरपूरि।”
इसका भाव यह है कि परम तत्व को खोजने के लिए मनुष्य को कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं है। चिंतन, मनन और सत्कर्म के माध्यम से उसे प्राप्त किया जा सकता है। वह सगुण भी है और निर्गुण भी तथा कण-कण में व्याप्त है।
सबका सृजनहार एक
भारतीय ज्ञान परंपरा में जीवन, जगत और प्रत्येक जीव के कल्याण पर व्यापक चिंतन हुआ है। यहां केवल मनुष्य के सुख की नहीं, बल्कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के माध्यम से समस्त प्राणियों के सुख की कामना की गई है। भक्ति अथवा ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता।
संत रविदास ने कहा—
“एकै माटी के सभे भांडे, सभ का एकौ सिरजनहार।”
इसका स्पष्ट संदेश है कि सभी मनुष्य एक ही मिट्टी से बने हैं और उनका सृजनहार भी एक है। ऐसे में जाति, वर्ण अथवा जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को छोटा या बड़ा मानने का कोई औचित्य नहीं है।
कर्म ही मनुष्य का धर्म
भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न ग्रंथों में कर्म की प्रधानता स्वीकार की गई है। निर्गुण संत काव्यधारा में भी कर्म को सर्वोच्च स्थान मिला है। गुरु रविदास का चिंतन जीवन के प्रत्यक्ष अनुभवों और साक्षीभाव पर आधारित है। वे कर्म को छोड़कर केवल पूजा-पाठ और कर्मकांड में लगे रहने के पक्षधर नहीं थे।
उनकी वाणी है—
“रैदास मनुष्य कर धरम है, करम करहिं दिन-रात।”
आज हम ज्ञान, विज्ञान और आधुनिकता की बात करते हैं, लेकिन अनेक अवसरों पर जाति, क्षेत्र, भाषा और संप्रदाय के आधार पर भेदभाव दिखाई देता है। संत रविदास ने सदियों पहले समाज को समझाया था—
“जनम जात मत पूछिए, का जात अरु पात।
रैदास पूत सब प्रभु के, कौउ नहिं जात कुजात॥”
उनका यह उद्घोष आज भी मनुष्य की समानता और गरिमा का सार्वभौमिक संदेश देता है।
‘बेगमपुरा’ का समतामूलक स्वप्न
संत रविदास ने पूजा-पद्धतियों और संप्रदायों की संकीर्णता पर भी गंभीरता से विचार किया। उनका स्पष्ट मत था कि पूजा-पद्धति का अंतर मनुष्यों के बीच दीवार खड़ी नहीं कर सकता। उन्होंने एक ऐसे समाज और स्थान की कल्पना की, जहां किसी को कोई गम न हो तथा सभी भय, अभाव और भेदभाव से मुक्त होकर जीवन व्यतीत कर सकें।
उन्होंने इस आदर्श लोक को ‘बेगमपुरा’ कहा—
“रैदास जु है बेगमपुरा, उह पूरन सुखधाम।”
बेगमपुरा केवल एक कल्पित नगर नहीं, बल्कि शोषण, असमानता और दुख से मुक्त समाज की परिकल्पना है। संत रविदास ने संतों को सबका हितकारी बताया, जीव हिंसा से दूर रहने का संदेश दिया और स्पष्ट उद्घोष किया कि—“पराधीनता पाप है।”
ऐसा राज, जहां सबको अन्न मिले
आज ‘सबका साथ, सबका विकास’ का मंत्र जनकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन संत रविदास ने सदियों पहले ही ऐसे राज्य की कल्पना प्रस्तुत कर दी थी, जहां प्रत्येक व्यक्ति को अन्न मिले, किसी के साथ भेदभाव न हो और छोटे-बड़े सभी समानता एवं प्रसन्नता के साथ रहें।
उन्होंने कहा—
“ऐसा चाहौं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।
छोट-बड़ो सभ सम बसैं, रैदास रहै प्रसन्न॥”
ये पंक्तियां केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं देतीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और लोककल्याणकारी शासन का आदर्श भी प्रस्तुत करती हैं।
विकसित भारत के लिए समरसता आवश्यक
आज भारत ‘विकसित भारत’ का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि जाति, क्षेत्र, भाषा, मत और पंथ के आधार पर उत्पन्न वैमनस्य समाप्त हो। जन-जन सामाजिक समरसता और समान सहभागिता के साथ राष्ट्र-कल्याण की दिशा में आगे बढ़े।
निश्चित रूप से यह एक बड़ा लक्ष्य है। इसकी प्राप्ति में गुरु रविदास जैसे महान संतों की वाणी, विचार और चिंतन व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र को नई दिशा दे सकते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की भी है कि सामाजिक गतिविधियों तथा विद्यालयों और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा एवं संतों के विचार जन-जन तक पहुंचाए जाएं। गुरु रविदास की वाणी सदियों पहले जितनी प्रासंगिक थी, आज भी उतनी ही प्रासंगिक और आत्मसात करने योग्य है।
आइए, हम सभी आपसी भेदभाव को त्यागकर सामाजिक समरसता को मजबूत करने तथा समाज और राष्ट्र के कल्याण में अपना योगदान सुनिश्चित करें।








