चुनाव में ‘देश का भविष्य’, सत्ता मिलने के बाद भविष्य के भरोसे क्यों छोड़ दिए जाते हैं युवा?
बाबूलाल नागा

चुनाव आते ही युवा ‘देश का भविष्य’ बन जाते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही उनकी समस्याएं भविष्य के भरोसे क्यों छोड़ दी जाती हैं? 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर युवाओं की शक्ति, आकांक्षाओं तथा समाज और लोकतंत्र में उनकी भूमिका की चर्चा होती है। लेकिन भारत जैसे युवा देश में यह दिन केवल शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं होना चाहिए। यह राजनीतिक दलों से सवाल पूछने का दिन भी होना चाहिए कि जिस युवा को वे अपना सबसे बड़ा वोट बैंक मानते हैं, उसकी वास्तविक समस्याओं को उनके घोषणा-पत्रों और नीतियों में कितनी जगह मिलती है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज का युवा केवल रोजगार मांगने वाला वर्ग नहीं है। वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर कौशल, सम्मानजनक रोजगार, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और भविष्य की निश्चितता चाहता है। वह यह भी चाहता है कि सरकार और राजनीतिक दलों की नीतियां तय करने में उसकी आवाज सुनी जाए।
चुनावी राजनीति का विरोधाभास यह है कि युवाओं की संख्या बड़ी होने के कारण उनका राजनीतिक महत्व तो बहुत है, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान राजनीतिक प्राथमिकताओं में उतना बड़ा दिखाई नहीं देता।
वादों का शोर, रोजगार का इंतजार
हर चुनाव में युवाओं के लिए बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। रोजगार के अवसर बढ़ाने, नए उद्योग लगाने, कौशल विकास करने तथा स्टार्टअप और स्वरोजगार को प्रोत्साहन देने की बातें होती हैं। चुनावी मंचों से युवा शक्ति के नारे लगाए जाते हैं और सोशल मीडिया पर उन्हें जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाए जाते हैं।
लेकिन सरकार बनने के बाद वही युवा भर्ती परीक्षा की तारीख, परिणाम और नियुक्ति की प्रतीक्षा में वर्षों गुजार देता है। पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में अनावश्यक देरी और बार-बार बदलते नियमों ने युवाओं के भरोसे को सबसे अधिक चोट पहुंचाई है।
एक युवा कई वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। परिवार उसकी पढ़ाई और कोचिंग का खर्च उठाता है। वह अपनी उम्र का सबसे महत्वपूर्ण समय सरकारी नौकरी की उम्मीद में लगा देता है। परीक्षा होती है तो पेपर लीक का विवाद सामने आ जाता है। परिणाम घोषित होता है तो नियुक्ति अटक जाती है। कई बार पूरी प्रक्रिया कानूनी विवादों में उलझकर रह जाती है।
ऐसे में सवाल केवल एक नौकरी का नहीं है। सवाल यह है कि युवा अपने जीवन के कितने बहुमूल्य वर्ष व्यवस्था के इंतजार में लगाए?
डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी
दूसरी बड़ी चुनौती शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से हर वर्ष बड़ी संख्या में युवा डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन उनकी शिक्षा और रोजगार बाजार की जरूरतों के बीच कितना तालमेल है?
ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों के युवाओं को उच्च शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, डिजिटल संसाधनों तथा रोजगार के समान अवसर क्यों नहीं मिल पाते? राजस्थान जैसे विशाल और भौगोलिक विविधता वाले राज्य में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। गांव और कस्बे का युवा सरकारी नौकरी को ही सबसे सुरक्षित विकल्प मानने के लिए मजबूर क्यों है? स्थानीय स्तर पर उद्योग, रोजगार और स्वरोजगार के पर्याप्त अवसर क्यों विकसित नहीं किए जाते?
यदि गांवों और छोटे शहरों में अवसर उपलब्ध नहीं होंगे तो युवाओं का महानगरों की ओर पलायन कैसे रुकेगा?
कार्यकर्ता नहीं, नीति निर्माता बनें युवा
राजनीतिक दलों को युवाओं को केवल मतदाता नहीं, नीति निर्माता भी मानना होगा। यहां एक और गंभीर सवाल उठता है—राजनीतिक दलों के संगठन में युवाओं की भूमिका कितनी वास्तविक है?
क्या युवाओं को केवल रैलियों में भीड़ जुटाने, पोस्टर लगाने, सोशल मीडिया संभालने और चुनाव प्रचार करने तक सीमित रखा जाएगा या उन्हें निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भी उचित स्थान मिलेगा? पंचायत और नगरपालिका से लेकर विधानसभा तथा संसद तक युवाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की बात अक्सर होती है, लेकिन टिकट वितरण और नेतृत्व के स्तर पर तस्वीर अलग क्यों दिखाई देती है?
राजनीतिक दलों को युवाओं की ऊर्जा का इस्तेमाल करने के बजाय उनके विचारों और नेतृत्व क्षमता पर भरोसा करना होगा।
घोषणा-पत्र में लक्ष्य और समयसीमा जरूरी
घोषणा-पत्र में ‘युवा अध्याय’ लिख देना पर्याप्त नहीं है। युवा नीति को प्रत्येक सरकारी नीति का अभिन्न हिस्सा बनाने की जरूरत है।
शिक्षा का बजट बढ़े तो उसका लाभ वास्तव में विद्यार्थियों तक पहुंचे। रोजगार योजना बने तो उसमें स्पष्ट लक्ष्य और समयसीमा निर्धारित हो। स्टार्टअप की बात हो तो छोटे शहरों और ग्रामीण युवाओं को आसानी से वित्तीय एवं तकनीकी सहायता मिले। खेल नीति बने तो गांव-कस्बों तक मैदान, संसाधन और प्रशिक्षक उपलब्ध हों। डिजिटल इंडिया का दावा हो तो गरीब और ग्रामीण युवा को भी डिजिटल संसाधनों की समान पहुंच मिले।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राजनीतिक दल अपने घोषणा-पत्र में किए गए युवा संबंधी वादों की सालाना प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं करते? चुनावी वादों की समीक्षा और जवाबदेही तय करने की कोई स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाती?
अब सवाल पूछ रहा है युवा
आज का युवा केवल भाषण सुनने वाला मतदाता नहीं है। वह सोशल मीडिया और सूचना के अन्य माध्यमों से सरकारों के कामकाज को देखता है, आंकड़ों को समझता है और सवाल पूछता है। वह जानना चाहता है कि पांच वर्ष पहले किया गया वादा कहां तक पहुंचा।
इसलिए आगामी चुनावों में राजनीतिक दलों को युवाओं से केवल यह नहीं पूछना चाहिए—“क्या आप हमें वोट देंगे?” उन्हें यह भी पूछना चाहिए—“आपका भविष्य कैसा होना चाहिए और उसे बेहतर बनाने के लिए हम क्या करेंगे?”
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस का वास्तविक अर्थ तभी होगा, जब इस अवसर पर होने वाले भाषणों से आगे बढ़कर राजनीतिक दल अपने घोषणा-पत्रों में युवाओं के लिए स्पष्ट और मापने योग्य लक्ष्य तय करें—रोजगार कितने और कब तक मिलेंगे? भर्ती प्रक्रिया कितने समय में पूरी होगी? शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी? युवाओं का पलायन कैसे रुकेगा? राजनीति में उनकी भागीदारी कितनी होगी? और सबसे बड़ा सवाल—वादे पूरे नहीं होने पर जवाबदेही किसकी होगी?
लोकतंत्र में युवा केवल एक संख्या नहीं हैं। वे मतदाता भी हैं, जागरूक नागरिक भी और आने वाले भारत के निर्माता भी। इसलिए 12 अगस्त को युवाओं को शुभकामनाएं देने से पहले राजनीतिक दलों को अपने घोषणा-पत्र का वह पन्ना जरूर खोलकर देखना चाहिए, जिस पर युवाओं के भविष्य से जुड़े वादे लिखे हैं।
जिस युवा के वोट से सत्ता मिलती है, क्या उसके भविष्य के लिए हमारी नीति भी उतनी ही मजबूत है?
क्योंकि अब युवा सिर्फ वोट बैंक बनकर नहीं रहना चाहता। वह हिस्सेदारी चाहता है, जवाबदेही चाहता है और सबसे बढ़कर—अपने भविष्य से जुड़े फैसलों में अपनी निर्णायक भूमिका चाहता है।








