डॉ. विजय गर्ग

खेती की बात होती है तो अक्सर हमारे सामने खेत जोतते, मशीन चलाते या फसल ढोते पुरुष किसान की तस्वीर आती है। इस तस्वीर में वह महिला प्रायः दिखाई नहीं देती, जो बीज बोने से लेकर फसल कटने तक खेत में काम करती है। घर लौटकर पशुओं और परिवार की जिम्मेदारी भी संभालती है। उसका श्रम खेती के लिए आवश्यक है, फिर भी उसे अक्सर ‘किसान की मदद’ कहकर दर्ज किया जाता है।
खेत में काम, रिकॉर्ड में नाम नहीं
महिलाएँ रोपाई, निराई-गुड़ाई, कटाई, बीज संरक्षण और फसल के बाद के अनेक काम करती हैं। कई घरों में उनका दिन खेत जाने से पहले शुरू होता है और लौटने के बाद भी समाप्त नहीं होता। खाना बनाना, पानी जुटाना तथा बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल भी उन्हीं की जिम्मेदारी होती है।
इस श्रम का आर्थिक महत्व है, लेकिन परिवार की आय के रिकॉर्ड में उसका अलग उल्लेख शायद ही मिलता है। भूमि पुरुष के नाम होने पर खेत में नियमित काम करने वाली महिला की पहचान किसान के रूप में और कठिन हो जाती है। इसका असर कृषि योजनाओं, ऋण, बीमा, प्रशिक्षण और बाजार तक उसकी पहुँच पर पड़ सकता है।
पशुपालन और बीजों का ज्ञान
ग्रामीण परिवारों की आजीविका में पशुपालन का महत्वपूर्ण स्थान है। चारा जुटाने, पशुओं की देखभाल, दूध निकालने और साफ-सफाई जैसे दैनिक कार्यों का बड़ा हिस्सा महिलाएँ संभालती हैं। खेती से आय कम होने के समय पशुधन परिवार को सहारा भी देता है, लेकिन इस काम में महिलाओं के कौशल को पर्याप्त मान्यता नहीं मिलती।
कई समुदायों में महिलाएँ बीज चुनने और सुरक्षित रखने का पारंपरिक ज्ञान भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती रही हैं। स्थानीय फसलों और खाद्य पदार्थों के बारे में उनका अनुभव बदलते मौसम की चुनौतियों के बीच उपयोगी हो सकता है। इस ज्ञान को सहेजना कृषि की विविधता को सहेजना भी है।
नई तकनीक में बराबर भागीदारी
खेती में मशीनों, मौसम की डिजिटल जानकारी, सिंचाई के नए तरीकों और ऑनलाइन बाजारों का उपयोग बढ़ रहा है। महिला किसान इनसे तभी लाभ उठा पाएँगी, जब प्रशिक्षण और संसाधनों तक उनकी वास्तविक पहुँच होगी। केवल स्मार्टफोन या मशीन उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है; उसे इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण, आर्थिक सुविधा और निर्णय लेने का अवसर भी चाहिए।
इसी तरह खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, बीज उत्पादन, रसोई बागवानी और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएँ कृषि उद्यमों में आगे बढ़ रही हैं। सुलभ ऋण, बीमा और बाजार से जुड़ाव मिले तो ये काम उनकी आय और आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ा सकते हैं।
पहचान से खुलेंगे अवसर
महिला किसानों को सम्मान देना आवश्यक है, लेकिन सम्मान के साथ अधिकार और अवसर भी चाहिए। जहाँ उचित हो, कृषि अभिलेखों में उनके नाम दर्ज हों। भूमि और अन्य उत्पादक संसाधनों तक उनकी पहुँच बढ़े। प्रशिक्षण उनकी जरूरतों के अनुरूप हो और योजनाओं की जानकारी उन तक ऐसे पहुँचे कि वे उनका लाभ ले सकें।
सबसे पहले हमारी भाषा और सोच में बदलाव जरूरी है। खेत में नियमित कृषि कार्य करने वाली महिला को केवल ‘पति की मदद करने वाली’ कहना उसके योगदान को छोटा करता है। वह कृषि श्रमिक, पशुपालक, बीज संरक्षक, निर्णयकर्ता और उद्यमी हो सकती है। उसे किसान के रूप में पहचान मिलनी चाहिए।
खेती का भविष्य उन्नत बीजों, सिंचाई, तकनीक और बाजार पर निर्भर है; उतना ही उन लोगों पर भी, जिनके श्रम और अनुभव से खेती चलती है। महिला किसान कृषि के अदृश्य हाथ नहीं, उसकी मजबूत आधारशिला हैं। उनके काम की पहचान और अवसरों का विस्तार खेती को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाएगा।








