विवेक रंजन श्रीवास्तव

एक बार देवताओं ने अमृत पाने के लिए समुद्र मथा था। हमारे समय ने व्यवस्था मथने का बीड़ा उठाया। अंतर इतना है कि वहाँ अमृत निकला था, यहाँ फाइलें निकलती हैं।
वहाँ देवताओं और असुरों ने मिलकर रस्सी खींची थी। यहाँ जनता एक छोर पर खड़ी है और व्यवस्था दूसरे छोर पर। रस्सी के बीच में समितियाँ बैठी हैं। मंथन जारी है। परिणाम की प्रतीक्षा में युग बीत रहे हैं।
कभी सूचना का अधिकार नामक एक दिव्य अस्त्र प्रकट हुआ था। जनता को लगा, अब सरकारी रहस्यों के तिलिस्म टूटेंगे। बंद संदूकों में रखे कागज बोलेंगे। फाइलों की नींद खुलेगी। भ्रष्टाचार के महिषासुर का वध होगा। हर नागरिक के हाथ में एक ऐसा शंख होगा, जिसे बजाते ही शासन के कानों में सत्य का नाद गूँज उठेगा।
ऋषियों ने तप किया था, नागरिकों ने आवेदन लिखे। ऋषियों को वरदान मिले, नागरिकों को आवेदन संख्या।
किसी ने सड़क का हिसाब माँगा, किसी ने राशन का। किसी ने पूछा कि विद्यालय की दीवार के लिए स्वीकृत धन कहाँ गया। किसी ने जानना चाहा कि तालाब के जीर्णोद्धार में तालाब तो बच गया, पर धन किस दिशा में बह गया। प्रश्न छोटे थे, आशाएँ बड़ी थीं। हर आवेदन के साथ लोकतंत्र की आत्मा थोड़ी और सजग होती थी।
लेकिन व्यवस्था भी कोई साधारण राक्षस नहीं। उसके पास दस सिर नहीं, दस काउंटर हैं। एक सिर पर सूचना पोर्टल, दूसरे पर सूचना अधिकारी, तीसरे पर प्रथम अपीलीय अधिकारी, चौथे पर आयोग। शेष सिरों पर नियमावली, प्रक्रिया, आपत्ति, सुनवाई और स्थगन के मुकुट सुशोभित हैं।
जनता ने सोचा था, वह सत्य के द्वार तक पहुँचेगी। उसे पता चला, पहले प्रवेश-पत्र लेना होगा। उसके लिए आवेदन करना होगा। आवेदन की स्थिति जानने के लिए लॉगिन करना होगा। लॉगिन के लिए पासवर्ड चाहिए। पासवर्ड भूल जाएँ तो सत्य की खोज से पहले अपनी स्मृति की परीक्षा देनी होगी। और जिसके पास मोबाइल नंबर नहीं, वह पहले यह साबित करे कि उसे सूचना पाने की इच्छा रखने का अधिकार है।
नारद मुनि होते तो तीनों लोकों में घूमकर समाचार पहुँचा देते। आधुनिक नागरिक पोर्टल पर घूमता है और स्क्रीन से पूछता है, “हे नारायण, मेरी सूचना कहाँ है?”
स्क्रीन निर्विकार रहती है। वह न नारायण है, न नाराज। बस लिख देती है—सूचना प्रक्रिया में है।
ये तीन शब्द हमारे युग का संजीवनी मंत्र हैं। इनके उच्चारण से हर प्रश्न जीवित रहते हुए भी निष्क्रिय हो जाता है। फाइल प्रक्रिया में है। शिकायत प्रक्रिया में है। जाँच प्रक्रिया में है। कार्रवाई प्रक्रिया में है। बस भ्रष्टाचार प्रक्रिया से बाहर है; वह परिणाम में उपस्थित रहता है।
किसी पुराण में एक ऐसा पात्र अवश्य रहा होगा, जो वरदान पाकर अमर हो गया हो। हमारे यहाँ भ्रष्ट व्यवस्था ने किसी देवता से वरदान नहीं माँगा। उसने केवल प्रक्रियाओं का कवच पहन लिया। तलवारें टूटती रहीं, आवेदन लौटते रहे, अपीलें आगे बढ़ती रहीं। कवच सलामत रहा।
सूचना आयुक्तों के कक्षों में फाइलें अपनी-अपनी कथा लेकर आती हैं। कोई वर्षों से प्रतीक्षा कर रही है, कोई तारीखों के वनवास से लौटकर फिर उसी दरबार में उपस्थित होती है। सुनवाई होती है। तर्क होते हैं। कागज पलटे जाते हैं। कभी आदेश भी निकलता है। नागरिक की आँखों में आशा की लौ जलती है, मगर लौ को हवा कौन देगा?
व्यवस्था की अपनी गति है। वह कछुए से भी धैर्यवान और सरकारी मुहर से भी अधिक स्थायी है। वह चलती है, पर कहाँ पहुँचती है—यह प्रश्न पूछना उसके अनुशासन के विरुद्ध माना जाता है।
कभी-कभी लगता है, सूचना का अधिकार आधुनिक युग का वह चक्रव्यूह है जिसमें प्रवेश करना अभिमन्यु ने सीख लिया, निकलने का मार्ग अभी भी किसी गोपनीय परिशिष्ट में सुरक्षित है। नागरिक प्रश्न लेकर भीतर जाता है। उत्तर की तलाश में घूमता है। फिर उसे पता चलता है कि प्रश्न का निस्तारण हो चुका है। उत्तर का जन्म अभी विचाराधीन है।
और इस तरह पहाड़ बढ़ता रहता है।
पोर्टल के सर्वर, कार्यालयों की मेजें, अधिकारियों की कुर्सियाँ, कर्मचारियों की फाइलें और नियमों की पुस्तिकाएँ—सब मिलकर एक विराट पर्वत का आकार ले लेते हैं। उस पर्वत पर पारदर्शिता का झंडा फहराता है। नीचे जनता खड़ी है। उसे विश्वास दिलाया जाता है कि भीतर सत्य का खजाना है।
खुदाई शुरू होती है। कुदालें चलती हैं। बैठकें होती हैं। रिपोर्टें बनती हैं। कभी-कभी प्रेस विज्ञप्ति भी निकलती है कि व्यवस्था में पारदर्शिता का नया अध्याय जुड़ गया है। नागरिक अपनी हथेली फैलाता है। उसमें कंप्यूटर से जुड़ा एक चूहा बैठ जाता है।
यह चूहा—या कहिए चुहिया—कोई साधारण जीव नहीं। वह इतनी प्रशिक्षित है कि हर बार नई शक्ल में आती है। कभी अधूरी सूचना बनकर, कभी विलंबित उत्तर बनकर, कभी तकनीकी त्रुटि बनकर। उसकी पूँछ पर लिखा होता है—“नियमों के अनुसार।”
जनता उसे देखती है। फिर पहाड़ को देखती है। फिर अपनी उम्मीदों को समेट लेती है।
समस्या यह नहीं कि हर आवेदन से कोई महाभारत निकलना चाहिए। समस्या यह है कि जब व्यवस्था पारदर्शिता का पर्व मनाती है, तब उसे यह भी बताना चाहिए कि प्रकाश कहाँ पहुँचा और अँधेरा किस कोने में बचा है। कानून का मूल्य उसके नाम में नहीं, उसके इस्तेमाल से नागरिक को मिली सूचना और उससे तय हुई जवाबदेही में है।
कभी राजा हरिश्चंद्र ने सत्य के लिए सब कुछ त्याग दिया था। आज का नागरिक सत्य के लिए आवेदन शुल्क भरता है, तारीखें सँभालता है और अपनी नींद त्यागता है। फिर भी वह प्रश्न पूछता है। यही लोकतंत्र की बची हुई रोशनी है।
पहाड़ खोदने वालों से बस इतना पूछना है—अगली बार खुदाई से पहले यह सुनिश्चित कर लीजिए कि चुहिया को ही पहाड़ घोषित करने की तैयारी तो नहीं है।
क्योंकि जनता अब चुहिया देखकर केवल हँसती नहीं। वह उसकी पूँछ पकड़कर पूछना चाहती है, “तुम्हारे बिल का नक्शा कहाँ है?”








