डॉ. विनोद बब्बर

आगामी 27 सितंबर से आश्विन कृष्ण पक्ष के श्राद्ध आरंभ होंगे। इससे एक दिन पहले, 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है। पितृपक्ष भारतीय संस्कृति में अपने पूर्वजों को श्रद्धा से स्मरण करने का अवसर है। हम जिन लोगों के स्नेह, श्रम और संस्कारों के सहारे आगे बढ़े, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ही इस परंपरा का मूल भाव है।
श्रद्धा है परंपरा का आधार
श्रद्धा से किए गए कार्य को ही श्राद्ध का आधार माना गया है। इस अवसर पर परिवार अपने दिवंगत परिजनों को याद करता है और उनके निमित्त तर्पण, दान तथा भोजन कराने जैसे कार्य करता है। पूर्वजों की स्मृति को जीवित रखने की परंपराएं संसार के अनेक समाजों में मिलती हैं। हमारे यहां भी उनके नाम पर यज्ञ, दान, जरूरतमंदों की सहायता और भूखों को भोजन कराने का प्रचलन रहा है।
समय के साथ कहीं-कहीं इन परंपराओं पर कर्मकांड और सामाजिक दबाव हावी हुए। कुछ स्थानों पर निर्धारित रीति का पालन न करने पर बहिष्कार जैसी स्थितियां भी बनीं। इससे श्राद्ध के प्रति लोगों की धारणा बदली और अनेक लोग इसे केवल कर्मकांड मानने लगे। ऐसे में आवश्यक है कि हम इसकी विधियों के साथ उसके मूल भाव को भी समझें।
स्मृतियों के लिए भी चाहिए समय
आज की भागदौड़ में हम अपने परिवार के साथ बैठने का समय तक मुश्किल से निकाल पाते हैं। कब सबने एक साथ भोजन किया था, यह भी याद नहीं रहता। ऐसे में माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों के साथ बिताए मधुर क्षणों को स्मरण करने के लिए कुछ समय निकालना अपने आप में मूल्यवान है।
पितृपक्ष को कोई धार्मिक अनुष्ठान माने या न माने, परिवार के साथ बैठकर पूर्वजों को याद करना, उनकी पसंद का भोजन बनाना और उनसे जुड़ी बातें अगली पीढ़ी को सुनाना सार्थक कार्य है। यदि इस अवसर पर किसी जरूरतमंद को भोजन कराया जाए, किसी वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम में सहायता पहुंचाई जाए अथवा पड़ोस के किसी मेधावी छात्र की पढ़ाई में मदद की जाए, तो श्रद्धा का भाव समाज तक भी पहुंचेगा। अपने आसपास के पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी इसी भावना का विस्तार हो सकता है।
मान्यताएं और उनका संदेश
पुराणों में श्राद्ध का विस्तार से वर्णन मिलता है। वायु पुराण में पितरों के निमित्त किए गए श्राद्ध को परिवार के कल्याण से जोड़ा गया है। ब्रह्म पुराण में श्रद्धा और विश्वास के साथ अर्पित जल तथा पिंड के महत्व का वर्णन है। इन बातों को धार्मिक आस्था के संदर्भ में समझा जाता है। साथ ही, इनके पीछे पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का संदेश भी है।
भारतीय दर्शन में जीवन और मृत्यु को एक व्यापक यात्रा की कड़ियों के रूप में देखा गया है। इसी विश्वास के आधार पर दिवंगत परिजनों के लिए तर्पण और श्राद्ध किए जाते हैं। पितृपक्ष में प्रायः उस तिथि पर श्राद्ध किया जाता है जिस तिथि को संबंधित परिजन का निधन हुआ था। भूले-बिसरे पितरों के स्मरण के लिए सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। रीति और विधि परिवार तथा क्षेत्र की परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है।
श्राद्ध से महाभारत के कर्ण की एक प्रचलित कथा भी जोड़ी जाती है। कथा के अनुसार कर्ण ने जीवन भर सोने का दान किया, लेकिन भोजन का दान नहीं किया था। मृत्यु के बाद उन्हें इसका बोध हुआ और पृथ्वी पर लौटकर उन्होंने भोजन तथा अन्य वस्तुओं का दान किया। इस कथा को श्रद्धा के साथ-साथ उपयोगी दान और भूखे को भोजन कराने के महत्व का संदेश भी माना जा सकता है।
आडंबर से अधिक महत्व भावना का
श्राद्ध में व्यक्ति की भावना सबसे महत्वपूर्ण है। परंपरा परिवार से अपेक्षा करती है कि इस अवसर पर वह क्रोध, लोभ और अहंकार से दूर रहे तथा पवित्र मन से अपने पूर्वजों को स्मरण करे। दान अपनी सामर्थ्य और ईमानदारी से अर्जित धन के अनुसार हो। दिखावे या सामाजिक दबाव में किया गया खर्च श्रद्धा की भावना को कमजोर करता है।
परिजन तर्पण करते समय अपने पूर्वजों का नाम लेकर उन्हें स्मरण करते हैं। कुछ परिवार जल, तिल, अक्षत, पुष्प और दीपक से पूजा करते हैं; कुछ लोग मौन प्रार्थना या दान को अधिक महत्व देते हैं। विधियां अलग हो सकती हैं, लेकिन अपने दिवंगत परिजन के प्रति सम्मान सबमें समान है।
अधूरे कार्य पूरे करना भी श्रद्धांजलि
अच्छी संतान अपने पूर्वजों की अच्छी बातों को आगे बढ़ाती है। किसी ने शिक्षा को महत्व दिया, किसी ने जरूरतमंदों की सेवा की, तो किसी ने कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदारी नहीं छोड़ी। उनके ऐसे गुणों को अपनाना और उनके अधूरे अच्छे कार्यों को पूरा करना श्रद्धांजलि का प्रभावी रूप है।
पूर्वजों की स्मृति में फलदार वृक्ष लगाए जा सकते हैं, जल संरक्षण का काम किया जा सकता है, विद्यार्थियों के लिए पुस्तकें जुटाई जा सकती हैं या किसी परिवार की कठिन समय में सहायता की जा सकती है। जो संपन्न हैं, वे बड़ा सार्वजनिक कार्य कर सकते हैं; जो ऐसा नहीं कर सकते, वे भी समय, श्रम और संवेदना दे सकते हैं। श्रद्धा का मूल्य खर्च की राशि से नहीं आंका जा सकता।
पितृपक्ष हमें ठहरकर यह सोचने का अवसर देता है कि हमने अपने पूर्वजों से क्या पाया और उनकी कौन-सी अच्छी बातें आगे पहुंचानी हैं। परिवार में उनकी स्मृतियों को जीवित रखना, उनके प्रति कृतज्ञ रहना और समाज के लिए कुछ उपयोगी करना—यही श्राद्ध को सार्थक बनाता है।








