डॉ. विनोद बब्बर

स्वतंत्रता अर्थात ‘स्व’ का तंत्र—अपना तीर, अपनी कमान और अपनी व्यवस्था। उच्च शिक्षा के सीमित अवसरों, बेरोजगारी, आर्थिक चुनौतियों, राजनीति में धनबल के बढ़ते प्रभाव और वैश्विक दबावों के बीच आजादी की बात करना शीतल, सुगंधित समीर के सुखद झोंके जैसा है।
स्वधर्म, स्वराज, सुराज और स्वतंत्रता को एक-दूसरे का पूरक माना जा सकता है, क्योंकि यह श्रृंखला प्रकृति के सिद्धांत के अनुरूप है। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति भी व्यक्ति और राष्ट्र को परतंत्र बना सकती है। इस दृष्टि से कहा जाए तो 15 अगस्त 1947 को हमें राजनीतिक स्वराज तो मिला, लेकिन स्वतंत्रता के अनेक आवश्यक लक्षण अभी प्राप्त होने शेष थे। देश का शासन भारतीयों के हाथों में आया, किंतु शासन-तंत्र का पूर्ण भारतीयकरण नहीं हो सका।
स्वदेशी, स्वभाषा और स्वाभिमान किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता के प्रमुख स्तंभ हैं। जब तक इनके आधार पर हम अपने शासन-तंत्र में आवश्यक बदलाव नहीं करते, तब तक स्वराज को सुराज में बदलना संभव नहीं है।
स्वभाषा के बिना स्वतंत्रता अधूरी
स्वराज की प्राप्ति हमारा स्वधर्म है। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि दूसरे के धर्म का पालन करने से अपना धर्म निभाते हुए नष्ट हो जाना भी श्रेष्ठ है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के 79 वर्ष बाद भी भारतीय भाषाओं की अस्मिता के सामने अनेक चुनौतियां हैं। शासन से प्रशासन तक और कानून से शिक्षा तक विदेशी भाषा का प्रभाव बना हुआ है। प्रशासनिक सेवाओं में हिंदी सहित भारतीय भाषाएं जानने और उनका व्यवहार में उपयोग करने वालों का अनुपात लगातार कम हो रहा है। अपनी भाषाओं के सम्मान और अधिकार के लिए बार-बार आवाज उठाने की आवश्यकता इस बात का प्रमाण है कि हमारी स्वतंत्रता अभी अपने पूर्ण स्वरूप तक नहीं पहुंची है।
यह केवल तथ्य नहीं, बल्कि कटु सत्य है कि अंग्रेजी शासन के समय की अनेक व्यवस्थाएं लंबे समय तक लगभग यथावत बनी रहीं। पुलिस, शिक्षा, शासन, न्याय, कृषि और चिकित्सा—अनेक क्षेत्रों में औपनिवेशिक मानसिकता का प्रभाव आज भी दिखाई देता है।
खंडित आजादी के बाद स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी त्रासदी नेतृत्व की मानसिकता का खंडित होना रही। जो व्यक्ति देश का ‘सरदार’ बनने की सर्वश्रेष्ठ योग्यता रखता था, उससे अवसर छीन लिया गया। इसके बावजूद उसने अल्प समय में ही राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का संकल्प पूरा करके दिखाया। लेकिन उसके बाद आने वाले नेतृत्व ने उस विरासत को कितना आगे बढ़ाया, यह विचारणीय प्रश्न है।
व्यवस्था के भारतीयकरण की पहल
निस्संदेह वर्तमान सरकार ने अंग्रेजी शासन के समय के अनेक अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त करने तथा इंडियन पीनल कोड के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता लागू करने का साहस दिखाया है। मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के विकल्प के रूप में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी आई है, लेकिन उसका संपूर्ण क्रियान्वयन अभी शेष है।
नई शिक्षा नीति प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने पर बल देती है। इसके बावजूद राष्ट्रीय राजधानी सहित लगभग हर नगर और महानगर में प्राथमिक शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। इस स्थिति में हम सिर उठाकर कैसे कह सकते हैं कि हम अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं?
हमने इस बात पर चिंतन करना भी लगभग छोड़ दिया है कि हमारी नई पीढ़ी को विदेशी वस्तुओं, विदेशी संस्कृति, विदेशी भाषा और विदेशी जीवनशैली की ओर क्यों धकेला जा रहा है। युवावस्था का अर्थ बल, बुद्धि और विद्या होना चाहिए, लेकिन युवाओं में धूम्रपान, मद्यपान और नशीले पदार्थों का सेवन बढ़ना गंभीर चिंता का विषय है। जीवन में संयम, धैर्य और शांति का स्थान स्वच्छंदता, उन्मुक्त जीवनशैली तथा विवेकहीन उन्माद लेता जा रहा है।
आखिर ऐसा क्यों है कि आजादी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले सेनानियों के बारे में नई पीढ़ी कम जानती है, जबकि क्रिकेट, सट्टेबाजी और मनोरंजन जगत से जुड़ी सूचनाओं से अधिक परिचित है? स्कूल-कॉलेजों में शारीरिक गतिविधियां लगभग गायब क्यों होती जा रही हैं? यदि खेलकूद की सुविधाएं हैं भी तो उनमें महंगे खेलों का ही वर्चस्व क्यों है? कम साधनों में अधिक ऊर्जा और स्वास्थ्य प्रदान करने वाले अपने परंपरागत खेलों के साथ भेदभाव क्यों किया जाता है?
दोहरी शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न
आज सभी को नौकरी तो सरकारी चाहिए, लेकिन सुविधाएं निजी क्षेत्र जैसी। दोहरी शिक्षा प्रणाली वर्ग-विभाजन को बढ़ावा दे रही है। अपने बच्चे की शिक्षा पर भारी-भरकम राशि खर्च कर सकने वालों के लिए ही मानो उच्च पदों तक पहुंचने के अवसर सुरक्षित होते जा रहे हैं।
अधिकांश सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। देश के अनेक दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों के विद्यालयों में न तो कोई शिक्षक जाना चाहता है और न ही अभिभावक अपने बच्चों को भेजना चाहते हैं। जिनका मुख्य कार्य पढ़ाना है, उनके जिम्मे मतदाता सूची तैयार करने से लेकर जनगणना तक अनेक गैर-शैक्षणिक कार्य सौंप दिए जाते हैं। मतदान से मतगणना तक लोकतंत्र भी उन्हीं के कंधों पर टिका रहता है।
क्या यह उचित नहीं होगा कि स्वतंत्रता की परिभाषा में शासन-तंत्र के भाग्यविधाताओं—सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, विधायकों, सांसदों, मंत्रियों से लेकर संतरी तक—के आश्रितों के लिए सरकारी स्कूलों, सरकारी अस्पतालों और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग अनिवार्य किया जाए? जिसे सरकारी व्यवस्था पर भरोसा नहीं है, उसे सरकारी पद और सार्वजनिक संसाधनों पर अधिकार क्यों मिलना चाहिए?
क्या केवल ध्वजारोहण ही आजादी है?
स्वतंत्रता दिवस इस बात पर चिंतन करने का अवसर है कि अनेक सरकारें बदलने के बाद भी देशभर में समान नागरिक संहिता लागू करने के मामले में ‘कछुआ गति’ क्यों बनी रही। एक छोटा-सा शरारती पड़ोसी इतने वर्षों तक हमारे आंगन में आतंक कैसे फैलाता रहा? उससे सहानुभूति रखने वाले भारत में क्यों मौजूद हैं? पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को वापस लेने के मामले में हमें अपने बल और विवेक पर भरोसा क्यों नहीं होना चाहिए? कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की ओर आशा भरी निगाहों से क्यों देखता रहा?
आजादी के 79 वर्षों में हमने प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते हुए अनेक बाधाएं देखी हैं। हम उन बाधाओं के कारणों से भी अनभिज्ञ नहीं हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या हम प्रगति की वर्तमान गति से संतुष्ट हैं? यदि नहीं, तो उसके कारणों की पड़ताल कौन करेगा?
क्या आजादी का अर्थ केवल संस्थानों, कार्यालयों, स्कूलों और कॉलेजों में तिरंगा फहराना भर है? भारत अपनी समृद्ध विरासत और मेहनतकश देशवासियों के कारण आगे बढ़ा है, लेकिन विदेशी आक्रांताओं जैसी मानसिकता रखने वाली शक्तियां आज भी देश को पीछे धकेलने में लगी हैं।
क्या दोहरे आचरण की सड़ांध हमें विचलित नहीं करती? क्या राजनीति के नाम पर मनमानी जारी रखकर हम स्वतंत्रता को सुराज की ओर बढ़ने से रोक नहीं रहे हैं? आजादी का अर्थ निरंकुशता और अनुशासनहीनता नहीं हो सकता। अधिकारों और कर्तव्यों के बीच सामंजस्य का नाम ही वास्तविक आजादी है।
दिशाहीन होती युवा पीढ़ी
किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा पीढ़ी होती है। शिक्षण संस्थानों में होने वाली स्वास्थ्य जांचों के दौरान युवाओं में गंभीर संक्रमण और नशे से जुड़ी समस्याओं के मामले सामने आना संकेत देता है कि हमारी युवा पीढ़ी के स्वास्थ्य, संस्कार और भविष्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।
महानगरों से लेकर सुदूर गांवों तक जिस प्रकार अनुशासनहीन स्वच्छंदता बढ़ रही है, वह चिंताजनक है। बेलगाम इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारी भावी पीढ़ी को भ्रमित एवं दिशाहीन कर रहे हैं। यदि हम सब कुछ मौन होकर देखते रहें तो इसे न स्वतंत्रता कहा जा सकता है और न ही सुराज।
क्या इसी आजादी के लिए भारत माता के महान सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी? क्या उन शहीदों ने कभी सपने में भी सोचा होगा कि आने वाली पीढ़ियां न केवल उन्हें, बल्कि राष्ट्र के गौरव और चरित्र के महत्व को भी भुला देंगी?
80वें स्वतंत्रता दिवस पर देश के साधारण नागरिक से लेकर कर्णधारों तक सभी को विचार करना चाहिए कि तुष्टिकरण आज भी क्यों जारी है और राजनीतिक अराजकता को बढ़ावा देने वाले लोग महत्वपूर्ण क्यों बने हुए हैं।
भारत की शक्ति उसके परिश्रमी नागरिक
पिछले दो दशकों में भारत ने जो अभूतपूर्व उन्नति की है, उसे पूरा विश्व देख रहा है। इसका श्रेय देश की 140 करोड़ जनता को है, जिसके मनोबल को लाखों मुसीबतें और चुनौतियां भी हिला नहीं सकीं।
आज हम दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र हैं तो इसका श्रेय किसी राजकुमार, ‘रिमोट कंट्रोल’ से संचालित व्यक्तित्व अथवा कमांडो से घिरे नेता-अभिनेता को नहीं, बल्कि करोड़ों श्रमशील और ईमानदार भारतीयों को जाता है।
हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस का अर्थ केवल रस्म अदायगी नहीं हो सकता। लालकिले की प्राचीर से ध्वजारोहण के बाद कुछ वादे, कुछ नई-पुरानी बातें और अपनी उपलब्धियों का गुणगान ही स्वतंत्रता दिवस की सार्थकता नहीं है।
किसी भी राज्य अथवा राष्ट्र का असली ध्वज उसकी जनता, उसकी खुशहाली, स्वच्छ राजनीति और निजी हितों पर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने की भावना में निहित होता है। राष्ट्र अपने कर्णधारों से बिना किसी दबाव में आए ‘राष्ट्रनायक’ जैसा व्यवहार करने की अपेक्षा करता है। उनसे यह भी अपेक्षा है कि युवाओं के देश भारत में जेन-जी को उसकी योग्यता और सामर्थ्य के अनुरूप उच्च शिक्षा तथा रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाएं।
अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे सुराज
स्वतंत्रता दिवस की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक स्वराज, सुराज, स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वाभिमान के विश्वास की सुगंधित समीर पहुंचे।
विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ने के विश्वास की रक्षा के लिए हर भारतीय के मन-मस्तिष्क में यह अहसास जगाना होगा—
‘बेशक रात अंधियारी है, लेकिन सुबह अब दूर नहीं।’
दुनिया उम्मीदों पर कायम है तो हम भी निराश क्यों हों? भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा और एक समर्थ महाशक्ति के रूप में दुनिया का मार्गदर्शन करेगा।
अपनी अस्थियां जलाकर हमारे लिए उजाला करने वाले भारत माता के वीर सपूतों को सश्रद्ध नमन!
दुनिया के कोने-कोने में बसे प्रत्येक भारतवंशी को स्वतंत्रता दिवस की अनंत शुभकामनाएं!








