12 वर्षों में बड़े उद्योगों के ₹9.95 लाख करोड़ बट्टे खाते में, किसानों का एक रुपया भी माफ नहीं: दीपेन्द्र हुड्डा

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·       केंद्र में किसान-विरोधी और कॉर्पोरेट-परस्त सरकार – दीपेन्द्र हुड्डा

·       दीपेन्द्र हुड्डा ने मांग करी कि कॉर्पोरेट घरानों को कर्ज राहत दे रही केंद्र सरकार तत्काल किसानों के लिए राष्ट्रीय कृषि ऋण माफी योजना की घोषणा करे

·  यदि राइट-ऑफ से कोई फायदा नहीं होता, तो बैंक हर साल कॉर्पोरेट घरानों के लाखों करोड़ रुपये क्यों बट्टे खाते में डाल रहे– दीपेन्द्र हुड्डा

·       बैंकों द्वारा बट्टे खाते डाले गए कॉर्पोरेट कर्जों की वास्तविक वसूली दर सार्वजनिक की जाए – दीपेन्द्र हुड्डा

·       किसानों और कॉर्पोरेट, दोनों के लिए ऋण राहत नीति में दोहरे मापदंड की बजाय समान और पारदर्शी मापदंड तय हों– दीपेन्द्र हुड्डा

चंडीगढ़, 10 अगस्त लोकसभा में सांसद दीपेन्द्र हुड्डा के सवाल पर केंद्र की बीजेपी सरकार ने कबूला कि पिछले 12 साल में धनाढ्यों का ₹10 लाख करोड़ माफ किया, किसानों की एक चवन्नी भी माफ नहीं की। लोकसभा में सांसद दीपेन्द्र हुड्डा के अतारांकित प्रश्न संख्या 3516 के जवाब में केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री श्री पंकज चौधरी ने कहा कि “केंद्र सरकार ने 2013-14 से 2025-26 के दौरान कोई कृषि ऋण माफी नहीं दी है। दूसरी ओर, सरकार ने संसद में जो आंकड़े दिए उसके मुताबिक 31 मार्च 2015 से 31 मार्च 2026 के बीच बड़े उद्योग और सेवा क्षेत्र के लिए अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने कुल मिलाकर लगभग ₹9,95,000 करोड़ (करीब 10 लाख करोड़ रुपये) के कर्ज “बट्टे खाते” में डाल दिए। जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (यानी जनता के पैसे) का हिस्सा सबसे बड़ा है। दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि “बट्टे खाते” में डाले गए कर्ज के आँकड़े भी पूरे नहीं हैं। केंद्र में किसान-विरोधी और कॉर्पोरेट-परस्त सरकार है। दीपेन्द्र हुड्डा ने मांग करी कि केंद्र सरकार कॉर्पोरेट घरानों को मिल रही कर्ज राहत की तर्ज पर तत्काल किसानों के लिए राष्ट्रीय कृषि ऋण माफी योजना की घोषणा करे। बैंकों द्वारा बट्टे खाते डाले गए कॉर्पोरेट कर्जों की वास्तविक वसूली दर सार्वजनिक की जाए । किसानों और कॉर्पोरेट, दोनों के लिए ऋण राहत नीति में दोहरे मापदंड की बजाय समान और पारदर्शी मापदंड तय हों।

उन्होंने कहा कि देश का किसान पहले ही बढ़ती महंगाई, बढ़ते कर्ज के बोझ से परेशान है। फसल खराबे पर जब किसान मुआवजे की मांग करता है या MSP की कानूनी गारंटी की मांग करता है तो उसे बीजेपी सरकार की लाठी, गोली का सामना करना पड़ता है। वहीं चंद पूँजीपतियों के हित में काम करने वाली बीजेपी सरकार देश के बड़े कॉर्पोरेट घरानों के लाखों करोड़ रुपये वर्ष-दर-वर्ष बट्टे खाते में डालकर उन्हें राहत दे रही है। सरकार अपने जवाब में लीपापोती करते हुए दिखाई दे रही है कि बट्टा खाता डालना केवल एक “लेखांकन प्रक्रिया” है और इससे कर्जदार को कोई राहत नहीं मिलती। यदि राइट-ऑफ से कोई फायदा नहीं होता, तो बैंक हर साल कॉर्पोरेट घरानों के लाखों करोड़ रुपये क्यों बट्टे खाते में डाल रहे हैं? सरकार बताए कि बट्टे खाते डाले गए ₹9.95 लाख करोड़ में से कितनी राशि असल में वसूल की गई? सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है। किसान से कर्ज की पाई-पाई वसूलने वाली बीजेपी सरकार की हकीकत को देश का किसान समझ चुका है।

दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि सरकार के इसी जवाब में यह भी सामने आया है कि कॉर्पोरेट को दिए गए कर्ज और उनसे हुई वसूली का राज्य/संघ राज्यक्षेत्र-वार कोई ब्यौरा केंद्र सरकार के पास नहीं है। कॉर्पोरेट राइट-ऑफ का राज्य-वार विवरण तक रिज़र्व बैंक के पास उपलब्ध नहीं है। दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि जब किसान के कर्ज की एक-एक किस्त, ब्याज पर ब्याज का हिसाब है, तो देश के बड़े पूँजीपतियों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज का हिसाब-किताब “केंद्रीय स्तर पर क्यों नहीं रखा जाता। इस जवाब से स्पष्ट है कि सरकार या तो जानकारी छुपा रही है या जवाबदेही से भाग रही है।

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Author: Bharat Sarathi

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