जेन-जी क्या बदल रही है भारतीय राजनीतिज्ञों की सोच?

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सौरभ वार्ष्णेय

भारत आज केवल विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं, बल्कि सबसे युवा लोकतंत्र भी है। देश की लगभग आधी आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और आने वाले वर्षों में मतदान करने वालों का सबसे बड़ा वर्ग जेन-जी और उसके बाद जेन-अल्फा होगा। ऐसे समय में यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत युवाओं के स्वभाव, सोच और लोकतांत्रिक भूमिका पर खुलकर अपनी बात रखते हैं, तो वह केवल एक सामाजिक टिप्पणी नहीं रह जाती, बल्कि उसके राजनीतिक, वैचारिक और सामाजिक निहितार्थ भी सामने आते हैं। हाल के एक कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि जेन-जी और जेन-अल्फा उनकी पीढ़ी से अधिक ईमानदार, अधिक देशभक्त और अधिक तार्किक हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि नई पीढ़ी प्रश्न पूछती है या विरोध करती है, तो उसे राष्ट्रविरोधी नहीं माना जाना चाहिए। लोकतंत्र में प्रश्न करना, असहमति व्यक्त करना और व्यवस्था से जवाब मांगना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह कथन केवल युवाओं की प्रशंसा नहीं, बल्कि बदलते भारत की वास्तविकता को स्वीकार करने का संकेत भी है। वहीं क्या यह पीढ़ी भारतीय राजनीतिज्ञों की सोच बदल रही है ।

भारत में पीढिय़ों का परिवर्तन केवल आयु का परिवर्तन नहीं है। यह सोच, जीवन शैली, तकनीक, शिक्षा, राजनीति और सामाजिक व्यवहार का भी परिवर्तन है। जेन-जी वह पीढ़ी है जिसने इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और डिजिटल क्रांति को बचपन से देखा है। वहीं जेन-अल्फा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, ऑटोमेशन और डिजिटल शिक्षा के दौर में विकसित हो रही है। इन दोनों पीढिय़ों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी भी बात को बिना तर्क स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। वे प्रमाण मांगते हैं, डेटा देखते हैं, कई स्रोतों से जानकारी प्राप्त करते हैं और उसके बाद अपनी राय बनाते हैं। यही कारण है कि आज की राजनीति भी केवल नारों के सहारे नहीं चल सकती। उसे तथ्यों, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की कसौटी पर खरा उतरना होगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन माना जाता है। उसका वैचारिक प्रभाव भारतीय राजनीति, विशेषकर व्यापक राष्ट्रवादी विमर्श, पर लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। इसलिए संघ प्रमुख का कोई भी सार्वजनिक वक्तव्य केवल व्यक्तिगत विचार नहीं माना जाता, बल्कि उसे व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भी पढ़ा जाता है। मोहन भागवत का यह कहना कि हमारी पीढ़ी बड़ों की बात बिना सवाल स्वीकार कर लेती थी, लेकिन आज का युवा प्रश्न पूछता है और यह अच्छी बात है, वास्तव में भारतीय समाज में आ रहे परिवर्तन की स्वीकारोक्ति है। यह स्वीकार करना कि नई पीढ़ी को आदेश नहीं, संवाद चाहिए, अपने आप में एक महत्वपूर्ण संदेश है।

भारतीय चुनावों का भविष्य अब युवाओं के हाथ में है। निर्वाचन आयोग के आंकड़े बताते हैं कि हर चुनाव में लाखों नए मतदाता जुड़ते हैं। इनमें अधिकांश जेन-जी के युवा होते हैं। अगले दस वर्षों में यही वर्ग देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति होगा। यही कारण है कि सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीति बदल रहे हैं। पहले चुनाव जातीय समीकरणों, स्थानीय प्रभाव और पारंपरिक प्रचार पर अधिक निर्भर रहते थे। आज सोशल मीडिया, डिजिटल अभियान, डेटा विश्लेषण, ऑनलाइन संवाद और युवा-केंद्रित घोषणाएँ चुनावी राजनीति का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे में भागवत का यह संदेश कि युवा अधिक तार्किक हैं और उन्हें सम्मानपूर्वक सुना जाना चाहिए, राजनीतिक दलों के लिए भी एक संकेत माना जा सकता है कि भविष्य की राजनीति संवाद आधारित होगी, केवल भाषण आधारित नहीं।

पिछले कुछ वर्षों में देश में विभिन्न मुद्दों पर छात्र आंदोलनों, प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, शिक्षा नीति, रोजगार, कृषि और सामाजिक विषयों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। इन आंदोलनों को लेकर राजनीतिक दलों और समाज में अलग-अलग मत रहे हैं। मोहन भागवत का यह कहना कि हर विरोध राष्ट्रविरोध नहीं होता, लोकतंत्र के मूल सिद्धांत की याद दिलाता है। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। शांतिपूर्ण विरोध और प्रश्न पूछना लोकतंत्र की आत्मा है।

हालाँकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि विरोध शांतिपूर्ण, संवैधानिक और रचनात्मक हो। हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या सामाजिक वैमनस्य किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की शक्ति को कमजोर करते हैं। इसलिए लोकतंत्र में अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। भागवत ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर भी बल दिया। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, भर्ती प्रक्रियाओं में विलंब, कौशल विकास और रोजगार जैसे विषय लगातार चर्चा में हैं। आज का युवा केवल डिग्री नहीं चाहता; वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, शोध के अवसर, स्टार्टअप का वातावरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढऩे की क्षमता चाहता है। यदि शिक्षा व्यवस्था इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं करती, तो युवाओं में असंतोष स्वाभाविक है।इ्रलिए यह वक्तव्य नीति-निर्माताओं के लिए भी एक संकेत है कि शिक्षा सुधार केवल पाठ्यक्रम बदलने का विषय नहीं, बल्कि अवसरों का विस्तार करने का भी प्रश्न है।

जेन-जी और जेन-अल्फा की सबसे बड़ी पहचान उनकी डिजिटल जीवनशैली है। समाचार पत्र, टेलीविजन और रेडियो आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सोशल मीडिया ने सूचना के प्रवाह को पूरी तरह बदल दिया है। यह पीढ़ी किसी भी समाचार को तुरंत कई स्रोतों से सत्यापित करती है। फर्जी खबरें, दुष्प्रचार और आधी-अधूरी सूचनाएँ भी इसी डिजिटल दुनिया की चुनौती हैं। इसलिए भविष्य की राजनीति में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी होगी।राजनीतिक दलों के लिए भी यह चुनौती है कि वे केवल भावनात्मक अपील पर निर्भर न रहें, बल्कि तथ्यों और नीति-आधारित संवाद को मजबूत करें।

मोहन भागवत ने युवाओं को देशभक्त बताया। लेकिन आज का राष्ट्रवाद पहले की तुलना में अधिक व्यापक स्वरूप ले चुका है। नई पीढ़ी के लिए राष्ट्रभक्ति केवल सीमाओं की सुरक्षा या राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान तक सीमित नहीं है। उनके लिए स्वच्छ पर्यावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, भ्रष्टाचार-मुक्त शासन, वैज्ञानिक सोच, तकनीकी प्रगति, लैंगिक समानता, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की सफलता भी राष्ट्र निर्माण का हिस्सा हैं। सवाल उठता है कि क्या बदल रही है संघ की भाषा?कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाज बदलने के साथ संगठनों की भाषा और संवाद शैली भी बदलती है। यह आवश्यक नहीं कि विचारधारा बदल जाए, लेकिन संवाद का तरीका बदलना समय की आवश्यकता बन जाता है। यदि संघ प्रमुख युवाओं के प्रश्न पूछने के अधिकार की प्रशंसा करते हैं, तो इसे बदलती सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप संवाद शैली का विस्तार भी माना जा सकता है।

दूसरी ओर, कुछ विश्लेषक इसे युवा मतदाताओं तक सकारात्मक संदेश पहुँचाने का प्रयास भी मानते हैं। दोनों दृष्टिकोण लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं और इन पर स्वस्थ बहस हो सकती है। इस बयान का महत्व केवल सत्तापक्ष तक सीमित नहीं है। विपक्ष के लिए भी यह उतना ही प्रासंगिक है। यदि युवा तार्किक उत्तर चाहते हैं, तो विपक्ष को भी केवल आलोचना नहीं, बल्कि स्पष्ट नीतिगत विकल्प प्रस्तुत करने होंगे। इसी प्रकार सरकार के सामने भी चुनौती है कि वह रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, डिजिटल सुरक्षा, डेटा संरक्षण और नवाचार जैसे विषयों पर ठोस परिणाम प्रस्तुत करे। आज का मतदाता घोषणाओं से अधिक परिणामों का मूल्यांकन करता है। आज जेन-अल्फा के अधिकांश सदस्य मतदान की आयु से दूर हैं, लेकिन अगले 10-15 वर्षों में यही वर्ग भारत की राजनीति की दिशा तय करेगा। यह पीढ़ी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, वर्चुअल रियलिटी और डिजिटल अर्थव्यवस्था के बीच बड़ी होगी।इनकी प्राथमिकताएँ पारंपरिक राजनीतिक मुद्दों से अलग भी हो सकती हैं। जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता, मानसिक स्वास्थ्य, वैश्विक रोजगार और तकनीकी नवाचार इनके लिए उतने ही महत्वपूर्ण होंगे जितने आज रोजगार और शिक्षा हैं।

लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं होती, बल्कि संवाद, असहमति के सम्मान, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व से होती है। यदि नई पीढ़ी प्रश्न पूछ रही है, तो इसे लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण माना जाना चाहिए। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विचारों की भिन्नता स्वाभाविक है। चुनौती यह है कि मतभेद को मनभेद बनने से रोका जाए। लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखते हुए संवाद की संस्कृति को मजबूत किया जाए। मोहन भागवत का जेन-जी और जेन-अल्फा पर दिया गया वक्तव्य केवल युवाओं की प्रशंसा भर नहीं है। यह बदलते भारत की उस सामाजिक वास्तविकता की स्वीकारोक्ति है, जहाँ नई पीढ़ी सम्मान के साथ संवाद, पारदर्शिता, अवसर और उत्तरदायी शासन चाहती है। इस वक्तव्य के राजनीतिक मायने कई स्तरों पर निकाले जा सकते हैं। कोई इसे बदलते राजनीतिक विमर्श का संकेत मानेगा, कोई इसे भविष्य के मतदाताओं की ओर बढ़ा हुआ वैचारिक संदेश कहेगा, तो कोई इसे लोकतांत्रिक संवाद की आवश्यकता की स्वीकारोक्ति के रूप में देखेगा। किंतु एक तथ्य निर्विवाद है—भारत की राजनीति का भविष्य अब जेन-जी और जेन-अल्फा की आकांक्षाओं, प्रश्नों और अपेक्षाओं से अलग होकर नहीं लिखा जा सकता। आने वाले वर्षों में वही राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और नीति-निर्माता अधिक सफल होंगे, जो युवाओं को केवल मतदाता नहीं, बल्कि भागीदार मानेंगे। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति आदेश में नहीं, संवाद में है; नारे में नहीं, विश्वास में है; और भविष्य उसी का होगा जो नई पीढ़ी की भाषा, उसकी आकांक्षाओं और उसकी ऊर्जा को समझकर आगे बढ़ेगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक हैं।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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