जातिगत आरक्षण से आगे बढ़कर आवश्यकता आधारित न्याय का समय

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डॉ. शैलेश शुक्ला

भारत का संविधान समानता, सामाजिक न्याय और अवसरों की समान उपलब्धता के सिद्धांत पर आधारित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश के निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि सदियों से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करने वाले समुदायों को मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान आवश्यक हैं। इसी सोच के अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। उस समय यह भी अपेक्षा थी कि यह व्यवस्था संविधान लागू होने से 10 वर्ष की अवधि के लिए एक संक्रमणकालीन उपाय होगी, जो समाज में समान अवसर स्थापित होने तक सहायक बनेगी। आज, स्वतंत्रता के आठ दशकों के बाद यह प्रश्न फिर से गंभीरता से उठ रहा है कि क्या वर्तमान आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य की दिशा में अपेक्षित परिणाम दे सकी है, अथवा अब समय आ गया है कि इसकी समीक्षा कर इसे अधिक व्यापक, न्यायसंगत और आवश्यकता-आधारित बनाया जाए।

यह एक कड़वा सत्य है कि देश में करोड़ों ऐसे गरीब परिवार हैं जो किसी भी आरक्षित वर्ग में नहीं आते, फिर भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों से वंचित हैं। ऐसे अनेक बच्चे हैं जिनके माता-पिता नहीं हैं, जो दिव्यांग हैं, जिनका परिवार अत्यंत निर्धन है, या जो दूरदराज़ के क्षेत्रों में संसाधनों के अभाव में जीवन संघर्ष कर रहे हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी जाति नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ हैं।

यही कारण है कि आज जातिगत आरक्षण के स्थान पर आवश्यकता-आधारित आरक्षण अथवा विशेष अवसरों की व्यवस्था पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए। यदि किसी बच्चे के पास पढ़ने के लिए विद्यालय नहीं, रहने के लिए सुरक्षित घर नहीं, भोजन की नियमित व्यवस्था नहीं और परिवार का सहारा भी नहीं है, तो उसके लिए सबसे बड़ी पहचान उसकी जाति नहीं बल्कि उसकी वंचित स्थिति है। ऐसे बच्चों को यदि उच्च शिक्षा, छात्रवृत्ति, प्रतियोगी परीक्षाओं, तकनीकी प्रशिक्षण और सरकारी नौकरियों में विशेष अवसर नहीं मिलेंगे, तो सामाजिक न्याय का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।

भारतीय समाज में यह स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि आरक्षण का लाभ कई परिवारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलता रहता है, जबकि उसी वर्ग के अनेक अत्यंत गरीब और पिछड़े परिवार आज भी लाभ से वंचित रह जाते हैं। यह विसंगति नीति-निर्माताओं के लिए विचार का विषय होना चाहिए कि लाभ वास्तव में सबसे अधिक जरूरतमंद तक कैसे पहुँचे। किसी भी कल्याणकारी नीति का मूल्यांकन समय-समय पर होना लोकतंत्र की सामान्य और स्वस्थ प्रक्रिया है। समीक्षा का अर्थ किसी अधिकार को समाप्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसका लाभ न्यायपूर्ण ढंग से वितरित हो।

भारत में गरीबी किसी एक जाति तक सीमित नहीं है। खेतों में मजदूरी करने वाला गरीब किसान, फुटपाथ पर जीवन बिताने वाला परिवार, अनाथालय में पल रहा बच्चा, दुर्घटना में माता-पिता खो चुका विद्यार्थी, गंभीर दिव्यांगता के साथ संघर्ष कर रहा युवा तथा अत्यंत पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लाखों नागरिक अवसरों की कमी से जूझ रहे हैं। यदि राज्य का उद्देश्य वास्तव में समान अवसर उपलब्ध कराना है, तो इन वर्गों के लिए भी सशक्त संवैधानिक और नीतिगत व्यवस्थाएँ विकसित की जानी चाहिए।

विशेष रूप से अनाथ बच्चों की स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। उनका कोई पारिवारिक संरक्षण नहीं होता। वे न सामाजिक पूंजी के सहारे आगे बढ़ पाते हैं और न आर्थिक संसाधनों के बल पर। ऐसे बच्चों के लिए विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक, प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर सरकारी सेवाओं तक, विशेष अवसर और आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं पर गंभीर विचार किया जाना चाहिए। यही बात दिव्यांग बच्चों पर भी लागू होती है। वे जीवन की शुरुआत ही अतिरिक्त चुनौतियों के साथ करते हैं। उन्हें केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि संस्थागत सहयोग और पर्याप्त प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है।

गरीबी भी अवसरों की सबसे बड़ी शत्रु है। आर्थिक अभाव प्रतिभा को जन्म लेने से पहले ही कुचल देता है। कितने ही मेधावी विद्यार्थी केवल इसलिए उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते क्योंकि उनके परिवार के पास फीस, पुस्तकें या आवास की व्यवस्था करने के लिए संसाधन नहीं होते। ऐसे में आवश्यकता-आधारित विशेष अवसर सामाजिक न्याय की अवधारणा को और अधिक व्यापक बना सकते हैं।

यह भी आवश्यक है कि आरक्षण को केवल सीटों की संख्या तक सीमित न रखा जाए। गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, बेहतर शिक्षक, डिजिटल संसाधन, छात्रावास, छात्रवृत्ति, कौशल प्रशिक्षण, करियर मार्गदर्शन और रोजगारपरक शिक्षा जैसी सुविधाएँ अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकती हैं। यदि प्रारंभिक स्तर पर ही अवसरों की समानता सुनिश्चित कर दी जाए, तो भविष्य में असमानता स्वाभाविक रूप से कम होने लगेगी।

नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन स्थापित करने की है। एक ओर उन समुदायों के ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, जिनके लिए संविधान ने विशेष संरक्षण की व्यवस्था की। दूसरी ओर वर्तमान समय की नई सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि व्यापक आँकड़ों, सामाजिक अनुसंधान और राष्ट्रीय सहमति के आधार पर समय-समय पर समीक्षा की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि सहायता का लाभ वास्तव में सबसे अधिक जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुँचे।

लोकतंत्र की शक्ति उसकी संवाद क्षमता में निहित होती है। किसी भी सार्वजनिक नीति पर विचार करना संविधान-विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आरक्षण पर भी बहस भावनाओं के बजाय तथ्यों, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर होनी चाहिए। समाज को विभाजित करने के बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित करने का प्रयास होना चाहिए जिसमें सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा—तीनों का संतुलन बना रहे।

भारत को आज ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो हर उस व्यक्ति का हाथ थामें जो वास्तव में पीछे छूट गया है। चाहे वह ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव का शिकार हो, चाहे आर्थिक रूप से अत्यंत निर्धन हो, चाहे अनाथ हो, चाहे दिव्यांग हो, चाहे किसी भी जाति या समुदाय से आता हो—यदि उसके पास अवसरों का अभाव है तो राज्य का दायित्व है कि उसे आगे बढ़ने का उचित अवसर प्रदान करे। सामाजिक न्याय का वास्तविक अर्थ भी यही है कि सहायता उस तक पहुँचे जिसे उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

इक्कीसवीं सदी का भारत यदि विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखता है, तो उसे ऐसी समावेशी नीतियों की आवश्यकता होगी जो किसी भी प्रतिभा को केवल जन्म की परिस्थितियों के कारण पीछे न रहने दें। आवश्यकता-आधारित सहायता, सामाजिक न्याय की मूल भावना और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित कर ही हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकते हैं जहाँ अवसर किसी पहचान का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का वास्तविक अधिकार बन जाए।

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Author: Bharat Sarathi

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