आजकल : धर्म, अधर्म और राजधर्म के बीच कांवड़ यात्रा

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डॉ. घनश्याम बादल

श्रावण का महीना आते ही उत्तर भारत की सड़कें भगवा रंग में रंग उठती हैं। लाखों-करोड़ों श्रद्धालु गंगाजल लेकर भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए निकल पड़ते हैं। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन की आस्था, तप, अनुशासन और सामूहिक विश्वास का विराट उत्सव है किंतु हर वर्ष इस यात्रा के साथ एक प्रश्न भी समानांतर चलता है—क्या हमारी आस्था उतनी ही संयमित है, जितनी प्रबल है?

यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि कांवड़ यात्रा के दो चेहरे दिखाई देते हैं। पहला चेहरा उस साधारण कांवड़िये का है जो सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर कठिन तपस्या के साथ शिवधाम की ओर बढ़ता है। दूसरा चेहरा उन कुछ लोगों का है जो इसी यात्रा की आड़ में सड़क को अपना अधिकार, कानून को अपनी सुविधा और धर्म को अपनी ढाल समझ बैठते हैं। दुर्भाग्य यह है कि दूसरे चेहरे की कुछ घटनाएँ पहले चेहरे की लाखों तपस्याओं पर भारी पड़ जाती हैं।

धर्म और धार्मिक आयोजन एक ही बात नहीं हैं। धार्मिक आयोजन में भी अधर्म प्रवेश कर सकता है। जब नशा श्रद्धा का स्थान ले ले, जब भक्ति की जगह शक्ति प्रदर्शन होने लगे, जब किसी विवाद का उत्तर हिंसा बन जाए, जब महिलाओं के साथ अभद्रता या छेड़खानी की घटनाएँ सामने आएँ, जब सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना “जोश” कहलाने लगे, तब समस्या कांवड़ यात्रा की नहीं बल्कि उसमें प्रवेश कर चुके अधर्म की होती है।

इतना ही नहीं, कुछ स्थानों पर कांवड़ यात्रा के दौरान मार्गों पर फैली प्लास्टिक, भोजन के अवशेष और अन्य कचरे का बोझ उन नगरों और कस्बों को कई दिनों तक उठाना पड़ता है, जहाँ से यात्रा गुजरती है। कई शहरों में घंटों और कभी-कभी दिनों तक लगने वाले जाम से आम नागरिकों का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। एम्बुलेंस तक प्रभावित होती हैं, विद्यार्थियों की परीक्षाएँ और कर्मचारियों की ड्यूटी प्रभावित होती है, छोटे व्यापारियों का कारोबार ठप पड़ जाता है। धार्मिक आस्था का सम्मान आवश्यक है, लेकिन किसी भी आस्था का मूल्य दूसरे नागरिक के अधिकारों की कीमत पर नहीं चुकाया जा सकता।

कुछ घटनाओं में दुकानदारों के साथ मारपीट, पहचान के आधार पर भेदभाव या संप्रदाय विशेष के नाम पर तनाव पैदा करने की कोशिशें भी सामने आती रही हैं। स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि ऐसे कृत्य धर्म नहीं, अधर्म हैं। किसी निर्दोष नागरिक को उसकी पहचान के कारण भयभीत करना भगवान शिव की आराधना नहीं हो सकती। जो शिव श्मशान में भी समभाव रखते हैं, उनके नाम पर समाज में विभाजन का बीज बोना उनकी शिक्षाओं का सबसे बड़ा अपमान है।

विडंबना यह है कि भगवान शिव के नाम पर वही सब किया जाता है, जिसे शिव का दर्शन स्वीकार नहीं करता। शिव विरक्ति के देव हैं, उन्माद के नहीं; करुणा के देव हैं, क्रूरता के नहीं; आत्मसंयम के देव हैं, आत्मप्रदर्शन के नहीं। यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि शिवभक्ति का अर्थ सड़क पर भय पैदा करना है, तो उसने शायद शिव को नहीं, केवल उनके बाहरी प्रतीकों को देखा है।

यहीं से राज्य की परीक्षा आरंभ होती है। लोकतंत्र में सरकार का राजधर्म किसी धार्मिक यात्रा को रोकना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित, गरिमापूर्ण और कानूनसम्मत बनाना है। यदि प्रशासन केवल सुविधाएँ देता रहे और अनुशासन लागू करने से हिचके, तो वह अपने दायित्व से पीछे हटता है। दूसरी ओर यदि वह आस्था को संदेह की दृष्टि से देखने लगे, तो भी वह अपने राजधर्म से भटकता है। राजधर्म का अर्थ है—न पक्षपात, न तुष्टीकरण, न पूर्वाग्रह; केवल निष्पक्ष व्यवस्था और कानून का समान अनुपालन।

हाल के दिनों में मुजफ्फरनगर प्रशासन ने कांवड़ यात्रा और मोहर्रम के जुलूस के मार्गों पर कुछ स्थानों पर पर्दे लगाकर दोनों आयोजनों को शांतिपूर्वक संपन्न कराने का प्रयास किया। प्रशासनिक दृष्टि से यह तत्कालिक समाधान माना जा सकता है और यदि उससे तनाव टला हो तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए किंतु यह भी उतना ही सच है कि किसी समाज का स्थायी समाधान पर्दों से नहीं निकलता। सड़क के बीच खड़े किए गए पर्दे कुछ घंटों के लिए दृश्य अलग कर सकते हैं, लेकिन मन के भीतर उठती दीवारों को नहीं गिरा सकते। आवश्यकता रास्तों को बाँटने की नहीं, विश्वास के पुल बनाने की है। भारत की साझी संस्कृति का भविष्य कपड़े के पर्दों पर नहीं, बल्कि पारस्परिक सम्मान, संवाद और संवेदनशीलता पर टिका है।

समस्या यह भी है कि हम कानून को व्यक्ति देखकर लागू करते हैं। यदि सड़क पर तोड़फोड़ करने वाला सामान्य नागरिक हो तो कार्रवाई तत्काल होती है, लेकिन वही काम यदि धार्मिक भीड़ का हिस्सा कर दे तो प्रशासन कई बार असहज दिखाई देता है। कानून की यह झिझक अंततः कानून की प्रतिष्ठा को कम करती है। आस्था सम्मान की पात्र है, किंतु कानून अपवाद स्वीकार नहीं कर सकता।

धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि प्रत्येक शिविर से यह संदेश जाए कि नशा, गंदगी फैलाना, यातायात में अनावश्यक बाधा उत्पन्न करना, महिलाओं के प्रति अभद्र व्यवहार, हिंसा, तोड़फोड़ और सांप्रदायिक विद्वेष शिवभक्ति नहीं, बल्कि शिव का अपमान हैं, तो उसका प्रभाव किसी सरकारी आदेश से अधिक होगा। शिव का सबसे बड़ा प्रसाद सद्भाव है और सबसे बड़ी पूजा मर्यादा।

मीडिया को भी सनसनी और मौन— दोनों अतियों से बचना होगा। कुछ घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पूरे आयोजन की पहचान बना देना भी अन्याय है और गलत घटनाओं को केवल इसलिए छिपा देना कि वे धार्मिक आयोजन से जुड़ी हैं, यह भी पत्रकारिता का धर्म नहीं है। संतुलित सत्य ही समाज का मार्गदर्शन कर सकता है।

अंततः कांवड़ यात्रा को केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि नागरिक उत्तरदायित्व के उत्सव के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। यदि हर कांवड़िया संकल्प ले कि वह रास्ते में गंदगी नहीं फैलाएगा, किसी के साथ अभद्र व्यवहार नहीं करेगा, कानून का सम्मान करेगा और अपने आचरण से भगवान शिव के आदर्शों को जीवित रखेगा, तो यह यात्रा देश की सबसे अनुशासित और प्रेरणादायी धार्मिक यात्रा बन सकती है।

धर्म का अर्थ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। अधर्म वह है जो दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करे। और राजधर्म वह है जो बिना किसी भेदभाव के दोनों के बीच न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित करे। कांवड़ यात्रा की वास्तविक सफलता गंगाजल के शिवलिंग तक पहुँचने में नहीं बल्कि उस श्रद्धा के समाज में सद्भाव बनकर प्रवाहित होने में है।

आज आवश्यकता सड़कों पर पर्दे खड़े करने की नहीं बल्कि मन में खड़ी होती दीवारों को गिराने की है। जिस दिन कांवड़ यात्रा से लौटने वाला प्रत्येक श्रद्धालु अपने साथ थोड़ा अधिक संयम, थोड़ा अधिक सम्मान और थोड़ा अधिक सद्भाव लेकर घर पहुँचेगा, उसी दिन भगवान शिव की आराधना अपने वास्तविक अर्थों में पूर्ण होगी।

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Author: Bharat Sarathi

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