दमन नहीं, संवाद ही समस्या का समाधान

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युवाओं के बढ़ते असंतोष, परीक्षा व्यवस्था पर अविश्वास और लोकतंत्र में संवाद की आवश्यकता पर एक विचार

ज्ञान चंद पाटनी ……. (वरिष्ठ पत्रकार)

दिल्ली में हाल के युवा विरोध-प्रदर्शन ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकार जनता की आवाज सुनना चाहती है या केवल उसे नियंत्रित करना? यह विरोध किसी एक परीक्षा, किसी एक पेपर लीक या किसी एक संगठन का आंदोलन नहीं है। यह उस पीढ़ी की बेचैनी है, जो वर्षों की मेहनत के बाद भी अपने भविष्य को अनिश्चित और व्यवस्था को अविश्वसनीय मानने लगी है।

देश का युवा आज सबसे अधिक आहत है। वह पढ़ाई करता है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपने जीवन के कई वर्ष लगा देता है, परिवार अपनी जमा-पूंजी खर्च कर देता है, लेकिन जब परीक्षा रद्द हो जाती है, पेपर लीक हो जाता है, भर्ती वर्षों तक अटक जाती है या परिणाम विवादों में घिर जाते हैं, तो उसके सपनों के साथ-साथ व्यवस्था पर उसका भरोसा भी टूट जाता है। यही टूटता हुआ विश्वास आज सड़कों पर दिखाई दे रहा है।

लोकतंत्र में विरोध कोई अपराध नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने का सबसे वैध माध्यम है। सरकारें जनता के वोट से बनती हैं और जनता के प्रति जवाबदेह भी होती हैं। इसलिए जब नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात कहने निकलते हैं, तो सत्ता का पहला उत्तर संवाद होना चाहिए, दमन नहीं।

दिल्ली में जो कुछ हुआ, उसने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस कार्रवाई, आंसू गैस, लाठीचार्ज और बल प्रयोग को लेकर बहस छिड़ी हुई है। सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियो ने भी गंभीर प्रश्न उठाए हैं, हालांकि इनकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। दूसरी ओर पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबरें भी सामने आई हैं। ऐसे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच आवश्यक है। लोकतंत्र में सच्चाई किसी एक पक्ष की नहीं, बल्कि तथ्यों की होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक के दोषियों के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट और कठोर कानून की घोषणा की है। यह स्वागतयोग्य कदम हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल कठोर कानून समस्या का स्थायी समाधान हैं? जब तक परीक्षा प्रणाली पारदर्शी नहीं होगी, भर्ती प्रक्रिया समयबद्ध नहीं होगी और युवाओं को निष्पक्ष अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक हर नया कानून अधूरा ही रहेगा।

असल संकट केवल पेपर लीक नहीं है। संकट उस भरोसे का है, जो धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। जब युवाओं को लगने लगे कि योग्यता से अधिक प्रभाव और संपर्क की कीमत है, जब मेहनत के बावजूद परिणाम अनिश्चित हों और नौकरी वर्षों तक प्रतीक्षा कराए, तब असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है। यह असंतोष किसी राजनीतिक दल ने नहीं पैदा किया, बल्कि व्यवस्था की लगातार होती चूकों ने जन्म दिया है।

दुर्भाग्य यह है कि आज असहमति को अक्सर विरोध नहीं, दुश्मनी समझ लिया जाता है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वालों को कभी विपक्ष का समर्थक, कभी व्यवस्था विरोधी और कभी राष्ट्रविरोधी तक घोषित कर दिया जाता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को कमजोर करती है। लोकतंत्र में सरकार और राष्ट्र एक-दूसरे के पर्याय नहीं होते। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन राष्ट्र और लोकतांत्रिक संस्थाएं स्थायी होती हैं।

पुलिस का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में बल प्रयोग हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए। यदि कहीं अनावश्यक कठोरता बरती गई है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि प्रदर्शनकारियों ने भी कानून हाथ में लिया है, तो उनके खिलाफ भी निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। कानून का सम्मान तभी होगा, जब उसका इस्तेमाल निष्पक्षता के साथ होगा।

आज देश के अलग-अलग हिस्सों में युवा लगभग एक जैसी शिकायतें कर रहे हैं—परीक्षा में अनियमितता, भर्ती में देरी, रोजगार का संकट और भविष्य को लेकर बढ़ती अनिश्चितता। यह केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। यदि करोड़ों युवाओं का विश्वास डगमगाता है, तो उसका असर केवल राजनीति पर नहीं, देश के विकास पर भी पड़ता है।

सरकार को यह समझना होगा कि हर आंदोलन राजनीतिक साजिश नहीं होता। अनेक आंदोलन व्यवस्था की खामियों से उपजे वास्तविक जन-असंतोष की अभिव्यक्ति होते हैं। यदि समय रहते संवाद हो, शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए और सुधार की ईमानदार पहल दिखाई दे, तो टकराव की नौबत ही नहीं आएगी।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है। यह विश्वास लाठी से नहीं, संवेदनशीलता से जीतना पड़ता है; आंसू गैस से नहीं, संवाद से बनता है; और सत्ता के अहंकार से नहीं, जवाबदेही से मजबूत होता है।

आज जरूरत यह नहीं कि विरोध की आवाज को दबाया जाए, बल्कि यह समझा जाए कि वह उठ क्यों रही है। क्योंकि इतिहास गवाह है—जहां संवाद के दरवाजे बंद होते हैं, वहां असंतोष सड़कों पर उतर आता है। लोकतंत्र की रक्षा दमन से नहीं, संवाद, न्याय और भरोसे से होती है।

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Author: Bharat Sarathi

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