श्री राधा जयंती : प्रेम, भक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा

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राधा भक्ति हैं तो कृष्ण ज्ञान; शक्ति और शक्तिमान का अस्तित्व एक-दूसरे के बिना संभव नहीं

आचार्य डॉ. महेंद्र शर्मा ‘महेश’

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी

राधा ऐसी भई श्याम की दीवानी कि ब्रज की कहानी हो गई,
एक भोली-भाली गांव की ग्वालिन पंडितों की वाणी हो गई।

राधा न होतीं तो वृंदावन भी वृंदावन न होता,
कान्हा तो होते, बंसी भी होती, पर बंसी में प्राण न होता।
प्रेम की परिभाषा जानता न कोई, कन्हैया को योगी मानता न कोई,
बिन परिणय वह प्रेम की पुजारिन, कान्हा की पटरानी हो गई।

पावन चातुर्मास का मध्य काल चल रहा है। भगवान विष्णु और भगवान शिव शयनावस्था में विश्राम कर रहे हैं। चातुर्मास के दो माह पूर्ण होने वाले हैं और तीन दिन बाद परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान करवट बदलेंगे। भगवान निश्चिंत हैं, क्योंकि सृष्टि की डोर आदिशक्ति के सुरक्षित हाथों में है। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को ही श्रीराधा का प्राकट्योत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी अष्टमी से महर्षि दधीचि तथा दूर्वाष्टमी का प्रसंग भी जुड़ा है। दूर्वाष्टमी का व्रत जीवन में आध्यात्मिक उन्नति, सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करने वाला माना गया है।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई का समय है, परंतु किसी भी धार्मिक और आध्यात्मिक विषय को समझने के लिए गंभीर चिंतन आवश्यक है। श्रीदेवी की कृपा से जो आध्यात्मिक रहस्य मुझे ज्ञात हुए हैं, उन्हें श्रीराधाष्टमी के पावन अवसर पर आप सभी के समक्ष निवेदित कर रहा हूं।

राधा हैं प्रेम और समर्पण

राधा प्रेम, भक्ति और पूर्ण समर्पण की प्रतीक हैं। यही प्रेम-भक्ति मनुष्य को श्रीकृष्ण अर्थात परम ज्ञान से जोड़ती है। जिस प्रकार श्रीदुर्गा सप्तशती का सार आदिशक्ति की महिमा और उनकी विभिन्न शक्तियों में निहित है, उसी प्रकार राधा प्रेम, भक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा हैं।

श्रीराधाष्टमी के पावन अवसर पर आइए, राधा-श्याम और राधा-कृष्ण के नामों में निहित बीज-तत्त्वों को आध्यात्मिक दृष्टि से समझने का प्रयास करें।

‘राधा-श्याम’ का बीज-तत्त्व

बीज ध्वनियों की आध्यात्मिक व्याख्या इस प्रकार की जाती है—

  • रं—रकार: अग्नि तत्त्व, तेज, रूपांतरण और शक्ति।
  • धं—धकार: पृथ्वी तत्त्व और धारण करने की शक्ति।
  • शं—शकार: शांति, आकाशीय सूक्ष्मता तथा शिव यानी कल्याणकारी तत्त्व।
  • मं—मकार: मन, चंद्रमा और अंतर्मुखी चेतना का संकेत।

इस दृष्टि से ‘राधा-श्याम’ का नाम तेज, धारण-शक्ति, शांति और अंतर्मुखी चेतना का अद्भुत समन्वय है।

‘कृष्ण’ नाम में पंचतत्त्व का संकेत

‘कृष्ण’ शब्द—क्, ऋ, ष् और ण—ध्वनियों से निर्मित है। इनकी प्रतीकात्मक आध्यात्मिक व्याख्या इस प्रकार है—

  • क्: कवर्ग का प्रथम स्पर्श वर्ण—आकाश और सृष्टि के आधार का संकेत।
  • ऋ: गति, प्रवाह, स्पंदन और वायु तत्त्व।
  • ष्: तीक्ष्ण शक्ति, अग्नि, तेज, रूपांतरण और आकर्षण।
  • ण: स्थिरता, पृथ्वी, धारण-शक्ति और आधार।

इस प्रकार श्रीकृष्ण के नाम में अवकाश, गति, तेज और धारण-शक्ति का समावेश दिखाई देता है।

‘राधा’ नाम का आध्यात्मिक रहस्य

‘राधा’ शब्द को र्, आ, ध् और आ के रूप में समझा जा सकता है—

  • र्—रंकार: तेजस्वी गति, अग्नि, ऊष्मा और शक्ति।
  • आ: विस्तार, आकाश, व्यापकता और अनंतता।
  • ध्: पृथ्वी और धारण करने की शक्ति।
  • आ: पूर्णता, व्यापक चेतना और दिव्य विस्तार।

राधा नाम में प्रेम की ऊष्मा, चेतना का विस्तार और समस्त सृष्टि को धारण करने वाली शक्ति का भाव समाहित है।

ऐं, ह्रीं और क्लीं का रहस्य

देवी उपासना में कहा गया है—

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तुते॥

इन बीज मंत्रों का आध्यात्मिक अर्थ है—

  • ऐं: विद्या और वाक्-शक्ति।
  • ह्रीं: महामाया और आदिशक्ति।
  • क्लीं: प्रेम, कामना और आकर्षण की शक्ति।

‘रा’ में तेज, विस्तार, प्रेम और आह्लादिनी शक्ति का भाव है, जबकि ‘कृ’ गति, आकर्षण और परम चेतना की ओर संकेत करता है। इस प्रकार राधा और कृष्ण प्रेम एवं परम चेतना के अभिन्न स्वरूप हैं।

राधा नाम में बहती ‘धारा’

‘राधा’ शब्द को तीन बार शीघ्रता से बोलने पर उसके बीच ‘धारा’ जैसी ध्वनि का अनुभव होता है। यह भक्ति, प्रेम और समर्पण की उस अविरल धारा का प्रतीक है, जो साधक को विशाल सागर के समान ईश्वरीय ज्ञान-तत्त्व की ओर ले जाती है। उस ज्ञान को पूर्ण रूप से समझना और उसकी गहराई का पार पाना सहज नहीं है।

श्रीकृष्ण का एक नाम ‘माधव’ भी है। परमात्मा का स्वरूप साधक को प्रकाश की भांति दिखाई देता है, किंतु जैसे ही मनुष्य उसे सांसारिक बुद्धि से पकड़ने का प्रयास करता है, वह ओझल होता प्रतीत होता है। परमात्मा को पाना समुद्र की गहराई नापने जैसा है—इसके लिए प्रेम, भक्ति, धैर्य और पूर्ण समर्पण आवश्यक है।

इसी आध्यात्मिक भाव का दर्शन श्रीवृंदावन धाम में श्रीबांके बिहारी जी के दिव्य स्वरूप के सम्मुख भी होता है, जहां थोड़ी-थोड़ी देर में पर्दा खुलता और बंद होता रहता है। मानो भगवान भक्त को दर्शन देकर पुनः अपनी रहस्यमयी लीला में छिप जाते हों।

राधा और कृष्ण एक ही तत्त्व

श्रीराधा और भगवान श्रीकृष्ण वस्तुतः एक ही परम तत्त्व के दो स्वरूप हैं। राधा शक्ति हैं और कृष्ण शक्तिमान। राधा भक्ति हैं और कृष्ण ज्ञान। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

एवं परस्परापेक्षा शक्तिः शक्तिमतो स्थिता।
न कृष्णेन विना राधा, न राधया विना कृष्णः॥

अर्थात शक्ति और शक्तिमान का अस्तित्व परस्पर एक-दूसरे पर आश्रित है। श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण और श्रीकृष्ण के बिना श्रीराधा की कल्पना नहीं की जा सकती।

श्रीराधाष्टमी का महापर्व हमें संदेश देता है कि ज्ञान तक पहुंचने का श्रेष्ठ मार्ग प्रेम है और ईश्वर को पाने का सबसे सरल साधन निष्काम भक्ति एवं पूर्ण समर्पण है।

सभी श्रद्धालुओं को श्रीराधाष्टमी महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

✍️ श्री निवेदन
श्रीगुरु शंकराचार्य पदाश्रित
आचार्य डॉ. महेंद्र शर्मा ‘महेश’
पानीपत

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Author: Bharat Sarathi

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