लोकतंत्र की रामलीला में नाराज फूफाओं के बिना पूरा नहीं होता कोई दृश्य
कस्तूरी दिनेश

अपना लोकतंत्र ‘फूफा प्रधान’ है। जिस दिशा में नजर दौड़ाइए, पूरा देश फूफाओं से भरा दिखाई देगा। सगाई हो, शादी हो, तेरहवीं हो, बरसी हो अथवा राजनीति—ये हर जगह कण-कण में भगवान की तरह आसन जमाए मिलेंगे।
जिस आयोजन में सभी आगंतुक व्यवस्थाओं से संतुष्ट दिखाई दें, वहां एक व्यक्ति मुंह फुलाए अवश्य बैठा मिलेगा। बस, समझ लीजिए—वही फूफा है! संतुष्टि से फूफाओं की जन्मजात दुश्मनी होती है। यदि कोई फूफा संतुष्ट दिखाई दे तो समझिए, वह असली फूफा नहीं है। वह फूफा परम्परा को बदनाम करने वाला कोई रंगा सियार है। अधिक संदेह हो तो उसके जीन की जांच करवा लीजिए, सच्चाई तुरंत सामने आ जाएगी।
फूफा नामक जीव को प्रसन्न करने के लिए इन्द्रलोक की सारी सुविधाएं भी कम पड़ सकती हैं। ऊपरवाले ने जब से इस जीव को धरती पर भेजा है, तब से लेकर आज तक उसे किसी आयोजन में पूरी तरह संतुष्ट नहीं देखा गया।
हिन्दू पारिवारिक परम्परा में पिता की बहन को बुआ और उनके पति को फूफा कहा जाता है। सामाजिक जीवन में यह अत्यंत महत्वपूर्ण और वजनदार रिश्ता माना जाता है। शादी-ब्याह अथवा किसी मांगलिक कार्य में सबसे पहले इनकी ही अभ्यर्थना होती है। यदि फूफा नाराज हो जाए तो समझिए—गई भैंस पानी में! फिर उसे हरा-हरा चारा दिखाए बिना वह पानी से बाहर आने को तैयार नहीं होता।
जिस व्यक्ति की बहन है, उसके परिवार में एक अदद फूफा होना ही होना है। इस दृष्टि से फूफा लगभग हर परिवार में पाया जाने वाला एक प्रभावशाली और ताकतवर घरेलू जीव है।
राजनीति में भी फूफाओं का दबदबा
सामाजिक जीवन ही नहीं, राजनीति के दरबार में भी फूफाओं का चरण अंगद के पांव की तरह जमा हुआ है। महिला आरक्षण से लेकर किसी भी जनकल्याणकारी विधेयक तक—राजनीतिक फूफाओं की रजामंदी के बिना उसका पारित होना आसान नहीं। सरकार एक मांगलिक विधेयक लेकर आती है तो उसके विरोध में सौ फूफा मुंह फुलाए खड़े हो जाते हैं।
राजनीति के अखाड़े में भिन्न-भिन्न प्रकार के फूफा पहलवान मौजूद हैं। कोई समाजवादी फूफा है तो कोई कांग्रेसी; कोई आम आदमी फूफा है तो कोई तृणमूली। कोई दक्षिणपंथी फूफा है तो कोई वामपंथी। देश की संसद और राज्यों की विधानसभाएं इन्हीं फूफा पहलवानों की गर्जना से हर समय कम्पायमान रहती हैं।
सत्ताधारी दल को ये फूफागण भले ही रावण दिखाई दें, परन्तु इनके बिना लोकतंत्र की रामलीला भी पूरी नहीं हो सकती। प्रजातंत्र की वंदे भारत ट्रेन चलानी है तो फूफाओं को उसके प्रथम श्रेणी के डिब्बे में पूरे मान-सम्मान के साथ बैठाना ही पड़ेगा—चाहे वे बंदरों की तरह कितनी भी उछल-कूद क्यों न करें!








