वेद प्रकाश विद्रोही बोले— सरकार करे विस्तृत समीक्षा, योजनाओं का लाभ केवल वास्तविक पात्रों तक पहुंचे
रेवाडी, 24 जुलाई। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेद प्रकाश विद्रोही ने हरियाणा में परिवार पहचान पत्र (फैमिली आईडी) और राशन कार्डों की संख्या में बड़े अंतर पर सवाल उठाते हुए इसकी गंभीर समीक्षा की मांग की है। उन्होंने कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में जहां लगभग 40 लाख राशन कार्ड हैं, वहीं फैमिली आईडी के तहत पंजीकृत परिवारों की संख्या 77.41 लाख से अधिक बताई जा रही है। दोनों आंकड़ों के बीच का बड़ा अंतर कई सवाल खड़े करता है।
विद्रोही ने कहा कि यदि प्रदेश में वास्तविक परिवारों की संख्या 77 लाख से अधिक है तो राशन कार्डों की संख्या लगभग आधी क्यों है? वहीं यदि राशन कार्ड वास्तविक पारिवारिक इकाइयों के अधिक निकट हैं तो फैमिली आईडी में परिवारों की संख्या इतनी अधिक कैसे हो गई? उनके अनुसार यह केवल तकनीकी या प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक पहलुओं से भी जुड़ा मामला है।
उन्होंने आशंका जताई कि विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ लोग संयुक्त परिवारों को कागजों में अलग-अलग परिवारों के रूप में दर्ज करा रहे हों। चूंकि कई योजनाओं की पात्रता परिवार की आय, आकार और सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर आधारित होती है, इसलिए अधिक लाभ लेने के उद्देश्य से इस प्रकार की प्रवृत्ति सामने आ सकती है।
विद्रोही ने कहा कि यदि ऐसा हो रहा है तो यह केवल सरकारी व्यवस्था के लिए चुनौती नहीं, बल्कि समाज के लिए भी चिंता का विषय है। भारतीय संस्कृति में संयुक्त परिवार सामाजिक मजबूती का आधार रहा है। यदि सरकारी लाभ के लिए परिवारों का कृत्रिम विभाजन किया जा रहा है तो यह सामाजिक मूल्यों में गिरावट का संकेत माना जा सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि फैमिली आईडी और राशन कार्ड दोनों की उपयोगिता और उद्देश्य अलग-अलग हैं। कई ऐसे परिवार भी हो सकते हैं जो राशन कार्ड के पात्र नहीं हैं, लेकिन उनकी फैमिली आईडी बनी हुई है। इसलिए केवल आंकड़ों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। इस पूरे विषय का गहन अध्ययन और सही विश्लेषण आवश्यक है।
विद्रोही ने सरकार से मांग की कि वह दोनों आंकड़ों का विस्तृत परीक्षण कर यह सुनिश्चित करे कि सरकारी योजनाओं का लाभ केवल वास्तविक पात्र लाभार्थियों तक पहुंचे। साथ ही उन्होंने नागरिकों से भी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों का पालन करने की अपील करते हुए कहा कि जनकल्याणकारी योजनाओं का उपयोग ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ होना चाहिए, न कि व्यवस्था की खामियों का लाभ उठाने के लिए।
उन्होंने कहा कि यदि समाज केवल आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण से सोचता रहा तो सामाजिक और नैतिक मूल्यों का क्षरण होगा तथा भ्रष्टाचार और आर्थिक लालच को बढ़ावा मिलेगा। इसलिए विकास के साथ-साथ पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।








