लैंगिक न्याय, समान अधिकार और संस्थागत सुधार पर नई बहस को मिली गति
अधिवक्ता सुचेता नाथ (बी.बी.ए., एल.एल.बी.)

कुरुक्षेत्र,(प्रमोद कौशिक) 18 जुलाई। दिल्ली उच्च न्यायालय एवं जिला न्यायालयों में प्रैक्टिसरत अधिवक्ता सुचेता नाथ (बी.बी.ए. एल.एल.बी.) ने कहा है कि भारत में विभिन्न वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अनेक वैधानिक आयोग कार्यरत हैं, लेकिन पुरुषों के अधिकारों और कल्याण के लिए अब तक कोई पृथक राष्ट्रीय आयोग नहीं है। इसी संदर्भ में राज्यसभा में प्रस्तुत राष्ट्रीय पुरुष आयोग विधेयक, 2025 ने देशभर में नई बहस को जन्म दिया है।
उन्होंने बताया कि यह विधेयक एक निजी सदस्य विधेयक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसका उद्देश्य पुरुषों से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई, मानसिक स्वास्थ्य, आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं, घरेलू हिंसा के पुरुष पीड़ितों तथा अन्य सामाजिक समस्याओं पर अध्ययन कर सरकार को सुझाव देना है।
प्रस्तावित विधेयक के अनुसार आयोग को शिकायतों की जांच, अनुसंधान, सरकार को अनुशंसाएं भेजने, जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने तथा वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करने जैसे अधिकार दिए जाने का प्रस्ताव है।
अधिवक्ता सुचेता नाथ के अनुसार हाल के कुछ चर्चित मामलों, विशेषकर केतन अग्रवाल प्रकरण, के बाद इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा तेज हुई है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि मामले की जांच अभी जारी है और न्यायालय का अंतिम निर्णय आना शेष है, इसलिए इसे किसी निष्कर्ष का आधार नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद इसने पुरुषों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा अवश्य बनाया है।
उन्होंने बताया कि विधेयक के समर्थकों का मानना है कि पुरुषों के लिए भी एक ऐसा स्वतंत्र मंच होना चाहिए जहां उनकी समस्याओं पर निष्पक्ष रूप से विचार किया जा सके। वहीं विरोध करने वालों का तर्क है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की आवश्यकता आज भी बनी हुई है और किसी भी सुधार का उद्देश्य महिला अधिकारों को कमजोर करना नहीं होना चाहिए।
सुचेता नाथ ने कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, गरिमा और न्याय का अधिकार प्रदान करता है। ऐसे में आवश्यकता ऐसी न्याय व्यवस्था की है जो किसी भी पीड़ित को केवल उसके लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर न्याय उपलब्ध कराए।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय पुरुष आयोग विधेयक, 2025 अभी कानून नहीं बना है, लेकिन इसने देश में लैंगिक न्याय, समान अधिकार और संस्थागत सुधारों पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में संसद इस विषय पर क्या निर्णय लेती है।









