— कस्तूरी दिनेश

चोरी भी एक कला है—और साधारण नहीं, उत्कृष्ट कोटि की कला। चोर भी कोई मामूली व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने-अपने क्षेत्र के सिद्धहस्त कलाकार होते हैं। यह कला परिश्रम-साध्य भी है और कष्ट-साध्य भी। परिश्रम इसलिए कि इसे दो-चार दिनों में नहीं सीखा जा सकता, और कष्ट इसलिए कि इसमें पारंगत होने के लिए लात, जूते और हवालात की दीक्षा अनिवार्य मानी जाती है।
जिस प्रकार कोई योगी घने जंगल में शीत, तपन, वर्षा और हिंसक पशुओं के बीच वर्षों तपस्या करके सिद्धि प्राप्त करता है, उसी प्रकार चौर्य-कला का साधक भी पुलिस की दौड़, जनता की धुनाई और जेल की सलाखों के बीच तपकर ही सिद्धावस्था को प्राप्त करता है। बिना इन कठिन परीक्षाओं के कोई भी चोर “महान” नहीं बन सकता।
इस साधना का श्रीगणेश अधिकांश साधक अपने ही घर से करते हैं। बचपन में माँ की गुल्लक, पिता की जेब या पड़ोसी के आम से शुरुआत होती है। यदि परिवार और परिस्थितियों का निरंतर “प्रोत्साहन” मिलता रहे तो यही कलाकार गाँव, शहर, राज्य और देश की सीमाएँ लांघते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँच जाता है। फिर वह ऐसा नाम कमाता है कि अख़बारों की सुर्खियाँ और अदालतों की फाइलें वर्षों तक उसका पीछा करती रहती हैं।
जो साधक बीच रास्ते में असफल हो जाते हैं, वे मोहल्लों और कॉलोनियों में छोटी-मोटी चोरियाँ करके जीवन भर पुलिस और जनता के प्रेमपूर्ण “सम्मान” का आनंद लेते रहते हैं। उनका अधिकांश जीवन जेल की अंधेरी कोठरियों में बीतता है। लेकिन जो साधना में सफल हो जाते हैं, वे अरबों-खरबों का माल समेटकर विदेशों की सुहानी वादियों में ऐश करते हैं और भारतीय एजेंसियों को वर्षों तक आँख-मिचौली खिलाते रहते हैं।
चोरों की एक विशिष्ट प्रजाति ऐसी भी है, जो अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता के बल पर संसदों और विधानसभाओं तक पहुँच जाती है। वहाँ पहुँचते ही उनका सामाजिक दर्जा इतना ऊँचा हो जाता है कि उन पर हाथ डालने से पहले कानून के रखवालों के भी पसीने छूट जाते हैं। और यदि कभी भूलवश गिरफ्तारी हो भी जाए तो समर्थकों का प्रेम उमड़ पड़ता है। गिरफ्तारी भी जुलूस बन जाती है और जेल यात्रा मानो विजय-यात्रा का रूप ले लेती है।
लेकिन इन सबमें सबसे अद्भुत वे चोर हैं, जो इंसान तो इंसान, भगवान तक को नहीं छोड़ते। माथे पर चंदन, कंधे पर रामनामी, हाथ में माला और चेहरे पर ऐसी भक्ति कि देखकर बड़े-बड़े संत भी धोखा खा जाएँ। मंदिर की परिक्रमा करते हुए वे इतने श्रद्धालु दिखाई देते हैं कि भक्तगण उन्हें धर्मात्मा समझ बैठते हैं। मगर अवसर मिलते ही भगवान के मुकुट, चाँदी के छत्र, चरण-पादुकाएँ, हीरे-जड़े आभूषण और दानपात्र का धन कब उनकी कला का हिस्सा बन जाता है, इसका पता पुजारियों को बाद में चलता है। कभी-कभी तो लगता है कि स्वयं भगवान भी उनकी “हाथ की सफाई” देखकर आश्चर्यचकित रह जाते होंगे।
सच तो यह है कि चोरी केवल ताले तोड़ने की कला नहीं रही; यह समय के साथ विकसित होकर व्यवस्था, विश्वास, नैतिकता और जनभावनाओं तक पहुँच चुकी है। फर्क केवल इतना है कि छोटा चोर जेल की सलाखों के पीछे मिलता है और बड़ा चोर अक्सर सम्मान, सुरक्षा और प्रतिष्ठा के कवच में दिखाई देता है। शायद इसी विरोधाभास ने चोरी को कला और चोर को कलाकार बना दिया है।









