करोड़ों के प्रचार अभियानों के बावजूद नशे पर नहीं लगी लगाम, महिलाओं की सुरक्षा और युवाओं के भविष्य के लिए राजनीतिक नेतृत्व को पहले स्वयं नशामुक्त बनने का दिया संदेश
गुरुग्राम। हरियाणा प्रदेश महिला कांग्रेस की अध्यक्ष पर्ल चौधरी ने भाजपा सरकार के ‘एक युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान को केवल प्रचार तक सीमित बताते हुए कहा कि जब तक राजनीतिक नेतृत्व स्वयं नशामुक्त जीवन का उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेगा, तब तक ऐसे अभियान प्रभावी नहीं हो सकते। उन्होंने सुझाव दिया कि पंचायत से लेकर लोकसभा तक प्रत्येक उम्मीदवार से नामांकन के समय नशामुक्त जीवन का सार्वजनिक शपथपत्र और हलफनामा लिया जाना चाहिए।
पर्ल चौधरी ने कहा कि पिछले कई वर्षों में सरकार ने ‘एक युद्ध नशे के विरुद्ध’, ‘नशा मुक्त हरियाणा अभियान’ और ‘नशा मुक्त हरियाणा साइक्लोथॉन’ जैसे अनेक कार्यक्रम चलाए तथा करोड़ों रुपये प्रचार-प्रसार पर खर्च किए, लेकिन जमीनी स्तर पर नशे की समस्या आज भी गंभीर बनी हुई है। उनका कहना था कि यदि सरकार वास्तव में नशे के खिलाफ गंभीर होती तो केवल प्रचार अभियान नहीं चलाती, बल्कि ऐसी नीतियां बनाती जिनसे नशे की उपलब्धता और तस्करी पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।
उन्होंने आरोप लगाया कि गुरुग्राम में शराब की दुकानें सबसे अधिक सक्रिय और आकर्षक दिखाई देती हैं। कुछ दुकानों को सुबह चार बजे तक संचालन की अनुमति मिलने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इससे सरकार के नशा मुक्ति अभियान की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। एक ओर सरकार नशा मुक्ति का संदेश देती है, वहीं दूसरी ओर शराब की आसान उपलब्धता विरोधाभासी स्थिति पैदा करती है।
पर्ल चौधरी ने कहा कि पिछले लगभग 17 वर्षों में गुरुग्राम और आसपास के विकसित शहरी क्षेत्रों में नशे की समस्या को लेकर लगातार चिंताएं सामने आती रही हैं। विशेष रूप से बादशाहपुर विधानसभा क्षेत्र के कई इलाकों में स्थानीय लोग समय-समय पर नशे के कारोबार और उसकी उपलब्धता को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने सरकार से इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की।
उन्होंने कहा कि नशे का सबसे अधिक दुष्प्रभाव महिलाओं और बेटियों पर पड़ता है। घरेलू हिंसा, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, सड़क अपराध और अन्य सामाजिक अपराधों में नशा एक महत्वपूर्ण कारण बनकर सामने आता है। इसलिए नशा मुक्ति केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण विषय है।
पर्ल चौधरी ने कहा कि जो नेता समाज को नशा छोड़ने की सलाह देते हैं, उन्हें सबसे पहले सार्वजनिक रूप से यह संकल्प लेना चाहिए कि वे स्वयं किसी भी प्रकार का नशा नहीं करेंगे, न नशा तस्करों को संरक्षण देंगे और न ही चुनावों में शराब या अन्य नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करेंगे। उनका कहना था कि जब तक राजनीति स्वयं नशे से दूरी नहीं बनाएगी, तब तक नशे के खिलाफ कोई भी सरकारी अभियान पूरी तरह सफल नहीं हो सकता।
अपने वक्तव्य में उन्होंने तथागत बुद्ध के पंचशील का उल्लेख करते हुए कहा कि लगभग ढाई हजार वर्ष पहले ही बुद्ध ने नशे के दुष्परिणामों से सावधान करते हुए कहा था— “सुरा-मेरय-मज्ज-पमादट्ठाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि”, अर्थात “मैं ऐसे सभी मादक पदार्थों से दूर रहने का संकल्प लेता हूँ जो मनुष्य के विवेक और चेतना को नष्ट करते हैं।” उन्होंने कहा कि जब बुद्ध ने सदियों पहले नशामुक्त जीवन का संदेश दिया था, तो आज के जनप्रतिनिधियों का नैतिक दायित्व है कि वे स्वयं भी उसी आदर्श का पालन करें।
अंत में पर्ल चौधरी ने कहा कि हरियाणा की माताएं और बहनें केवल पोस्टरबाजी नहीं, बल्कि नशामुक्त समाज चाहती हैं। यदि राजनीतिक नेतृत्व स्वयं उदाहरण प्रस्तुत नहीं करेगा तो ‘एक युद्ध नशे के विरुद्ध’ जैसे अभियान केवल सरकारी विज्ञापनों तक सीमित रह जाएंगे।








