— सतवंती नेहरा…….. सोशल एक्टिविस्ट
भारत की सभ्यता में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं रहे, बल्कि वे शिक्षा, सेवा, संस्कृति, सामाजिक समरसता और जनकल्याण के महत्वपूर्ण केंद्र भी रहे हैं। प्राचीन भारत में गुरुकुल, अन्नक्षेत्र, धर्मशालाएँ, जल संरक्षण, कला-संरक्षण और गरीबों की सहायता जैसी अनेक व्यवस्थाएँ मंदिरों से संचालित होती थीं। मंदिर समाज की सामूहिक चेतना का केंद्र थे, जहाँ धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था, बल्कि लोकमंगल का माध्यम भी था।
आज भी करोड़ों श्रद्धालु मंदिरों में अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान एवं चढ़ावा अर्पित करते हैं। यह दान किसी व्यक्ति, परिवार या संस्था के निजी हित के लिए नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और समाज की सेवा के उद्देश्य से दिया जाता है। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि मंदिरों में आने वाले इस विशाल चढ़ावे का उपयोग किस प्रकार हो रहा है और क्या उसका लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँच रहा है?
यह विषय केवल धार्मिक नहीं, बल्कि नैतिक, सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक उत्तरदायित्व
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों के संचालन का अधिकार प्रदान करता है। अर्थात मंदिरों के प्रबंधन में धार्मिक स्वायत्तता संविधान द्वारा संरक्षित है।
लेकिन संविधान का यही ढाँचा यह भी स्पष्ट करता है कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और कानून के अधीन है। यदि कोई धार्मिक संस्था सार्वजनिक दान प्राप्त कर रही है तो उसके वित्तीय संचालन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व भी उतना ही आवश्यक है। यह हस्तक्षेप का विषय नहीं, बल्कि सुशासन और जनविश्वास का प्रश्न है।
इसी कारण देश के अनेक राज्यों में सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्टों के लिए अलग-अलग कानून बनाए गए हैं। कहीं देवस्थान बोर्ड हैं, कहीं एंडोमेंट विभाग, तो कहीं स्वतंत्र ट्रस्ट व्यवस्थाएँ। किंतु पूरे देश में मंदिरों के लिए कोई समान और व्यापक नीति नहीं है।
मंदिरों की संपदा: केवल धन नहीं, सामाजिक पूंजी
देश के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। यह धन श्रद्धालुओं के विश्वास की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है।
इस धन का सर्वोत्तम उपयोग कैसे हो सकता है, इसके प्रेरक उदाहरण भी हमारे सामने हैं।
आंध्र प्रदेश का तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् (टीटीडी) केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है। यह अनेक अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, अन्नदान योजनाएँ, वैदिक विश्वविद्यालय, गौसंरक्षण केंद्र और सामाजिक सेवा परियोजनाएँ संचालित करता है। प्रतिदिन हजारों लोगों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है।
केरल का गुरुवायूर मंदिर चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देता है।
इसी प्रकार गुजरात का सोमनाथ ट्रस्ट, उत्तराखंड का बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति, राजस्थान और अन्य राज्यों के कई मंदिर श्रद्धालुओं की सुविधाओं और जनसेवा के लिए योजनाएँ संचालित कर रहे हैं।
ये उदाहरण बताते हैं कि यदि प्रबंधन की स्पष्ट नीति हो तो मंदिर समाज के सबसे बड़े सेवा संस्थान बन सकते हैं।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है
देश में हजारों ऐसे मंदिर भी हैं जो निजी अथवा पारिवारिक ट्रस्टों के रूप में संचालित होते हैं। इनमें से अनेक मंदिरों में पर्याप्त चढ़ावा आता है, किंतु श्रद्धालुओं को मूलभूत सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं हैं।
आज भी अनेक धार्मिक स्थलों पर—
- स्वच्छ पेयजल का अभाव है,
- शौचालय अपर्याप्त हैं,
- दिव्यांगजनों के लिए सुविधाएँ नहीं हैं,
- पार्किंग और यातायात व्यवस्था अव्यवस्थित है,
- धर्मशालाओं की स्थिति खराब है,
- स्वच्छता और कचरा प्रबंधन संतोषजनक नहीं है।
जब श्रद्धालु लंबी यात्रा कर मंदिर पहुँचते हैं और उन्हें बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होतीं, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि करोड़ों रुपये का चढ़ावा कहाँ और किस प्रकार खर्च हो रहा है।
पारदर्शिता क्यों आवश्यक है?
विश्वास किसी भी धार्मिक संस्था की सबसे बड़ी पूँजी होता है।
यदि किसी मंदिर की आय, व्यय और परियोजनाओं का सार्वजनिक विवरण उपलब्ध हो तो श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत होता है।
आज अधिकांश बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियाँ अपने वित्तीय विवरण सार्वजनिक करती हैं। अनेक गैर-सरकारी संस्थाएँ भी वार्षिक रिपोर्ट जारी करती हैं। ऐसे में करोड़ों रुपये के सार्वजनिक दान से संचालित धार्मिक ट्रस्टों से भी न्यूनतम वित्तीय पारदर्शिता की अपेक्षा असंगत नहीं कही जा सकती।
यह पारदर्शिता किसी सरकारी नियंत्रण के लिए नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के प्रति नैतिक उत्तरदायित्व के लिए आवश्यक है।
राष्ट्रीय आचार-संहिता की आवश्यकता
देश के सभी मंदिरों पर एक जैसा कानून लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा, क्योंकि प्रत्येक मंदिर की ऐतिहासिक, धार्मिक और प्रशासनिक परिस्थितियाँ भिन्न हैं।
फिर भी एक स्वैच्छिक राष्ट्रीय आचार-संहिता विकसित की जा सकती है, जिसमें निम्नलिखित बिंदु शामिल हों—
- प्रत्येक मंदिर ट्रस्ट का वार्षिक ऑडिट।
- आय-व्यय का सार्वजनिक प्रकाशन।
- दान के उपयोग का स्पष्ट विवरण।
- श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए पृथक बजट।
- सामाजिक सेवा परियोजनाओं के लिए निर्धारित प्रतिशत।
- स्वतंत्र लेखा परीक्षण।
- डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन पारदर्शिता।
- शिकायत निवारण प्रणाली।
- पर्यावरण संरक्षण एवं स्वच्छता की अनिवार्य व्यवस्था।
ऐसी व्यवस्था धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित किए बिना मंदिरों की विश्वसनीयता और सामाजिक उपयोगिता दोनों को बढ़ा सकती है।
सेवा ही सनातन की आत्मा है
भारतीय संस्कृति में दान का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा।
उपनिषदों में “त्याग” और “दान” को श्रेष्ठ जीवन का आधार बताया गया है। भगवद्गीता में सात्त्विक दान को ऐसा दान कहा गया है जो बिना किसी अपेक्षा के योग्य स्थान और योग्य उद्देश्य के लिए दिया जाए।
इसी प्रकार हमारे शास्त्रों में “नर सेवा ही नारायण सेवा”, “परोपकाराय सतां विभूतयः” तथा “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे आदर्श बार-बार समाज सेवा को धर्म का अभिन्न अंग बताते हैं।
यदि मंदिरों का चढ़ावा निर्धनों की शिक्षा, गरीबों की चिकित्सा, गौसंरक्षण, संस्कृत एवं वैदिक अध्ययन, प्राकृतिक आपदाओं में राहत, पर्यावरण संरक्षण और समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान में लगे, तो यह सनातन परंपरा की वास्तविक भावना का विस्तार होगा।
निष्कर्ष
मंदिरों की आय पर नियंत्रण स्थापित करना समाधान नहीं है, और न ही धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कम करना उचित होगा। आवश्यकता केवल इतनी है कि आस्था के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ सके।
मंदिरों की भव्यता उनके स्वर्ण शिखरों, विशाल प्रांगणों या करोड़ों रुपये के चढ़ावे से नहीं मापी जाती। उनका वास्तविक वैभव उस सेवा, करुणा और लोकमंगल में निहित है, जो वहाँ से समाज तक पहुँचता है।
यदि भारत के प्रमुख मंदिर पारदर्शिता, सुशासन और जनसेवा के आदर्श मॉडल बन जाएँ, तो श्रद्धालुओं का विश्वास और अधिक सुदृढ़ होगा। तब मंदिर केवल आध्यात्मिक शक्ति के केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति और सामाजिक पुनर्निर्माण के ऐसे संस्थान बनेंगे जो भारत की उस सनातन परंपरा को पुनः जीवंत करेंगे, जिसमें धर्म और लोककल्याण एक-दूसरे के पूरक माने गए हैं।
मंदिरों का चढ़ावा तभी अपनी पूर्ण सार्थकता प्राप्त करेगा, जब वह केवल आरती की थाली तक सीमित न रहकर समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में भी प्रकाश पहुँचा सके।








