भाजपा आपातकाल पर राजनीति करने से पहले आरएसएस के तत्कालीन रुख पर भी जवाब दे : विद्रोही
लोकतांत्रिक संस्थाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते दबाव को बताया चिंता का विषय
रेवाडी, 25 जून। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने कहा कि 51 वर्ष पूर्व लगाए गए आपातकाल पर केवल राजनीतिक लाभ के लिए बहस करने के बजाय उससे सबक लेते हुए देश में लोकतंत्र, संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
आरएसएस के तत्कालीन रुख पर उठाए सवाल
विद्रोही ने कहा कि भाजपा के वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उस समय के संघ प्रमुख बाला साहब देवरस ने आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर संघ पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि आज वही विचारधारा आपातकाल को लेकर लोकतंत्र की सबसे बड़ी संरक्षक होने का दावा कर रही है, जबकि इतिहास के इस पहलू पर चर्चा से बचती है।
इंदिरा गांधी के फैसले और जनता के जनादेश का किया उल्लेख
उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं अपने जीवनकाल में आपातकाल को एक गलत निर्णय माना था। विद्रोही ने कहा कि 1977 में जनता ने कांग्रेस सरकार को सत्ता से बाहर कर लोकतांत्रिक निर्णय दिया, वहीं 1980 के आम चुनाव में पुनः भारी बहुमत देकर इंदिरा गांधी को सत्ता में वापस लाया। इससे स्पष्ट होता है कि अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है।
राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी पर दिया जोर
वेदप्रकाश विद्रोही ने कहा कि 1975 में आपातकाल क्यों लगा और उसके पीछे क्या परिस्थितियां थीं, इसका विश्लेषण इतिहासकारों और संवैधानिक विशेषज्ञों का विषय है। राजनीतिक दलों की प्राथमिक जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि देश में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न ही न हों, जिनसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर संकट आए।
वर्तमान दौर को बताया ‘अघोषित आपातकाल’
विद्रोही ने आरोप लगाया कि वर्ष 2014 से देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति बनी हुई है। उन्होंने कहा कि सत्ता के दुरुपयोग के माध्यम से नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जैसी एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप भी लगाए।
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जताई चिंता
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ रहा है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। विद्रोही ने आरोप लगाया कि विभिन्न संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर होने से लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंच रहा है।
संविधान की रक्षा के लिए जागरूकता का आह्वान
वेदप्रकाश विद्रोही ने कहा कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा केवल सरकारों की नहीं, बल्कि नागरिकों की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने देशवासियों से लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की रक्षा के प्रति सजग रहने का आह्वान करते हुए कहा कि मजबूत लोकतंत्र ही देश की सबसे बड़ी शक्ति है।








