राम मंदिर में चंदे की चोरी: लापरवाही या नीयत में खोट?

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दानराशि में कथित हेराफेरी, सीसीटीवी डेटा से छेड़छाड़ और बहुमूल्य दान सामग्री के गायब होने के आरोपों ने मंदिर प्रबंधन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजेश श्रीवास्तव

राम मंदिर की दान राशि हेरफ़ेर का मामला इन दिनों सुर्खियों में है। जिन लोगों के हाथ में मंदिर की व्यवस्था थी वो सभी सवालों के घेरे में हैं। ट्रस्ट के पदाधिकारियों और कर्मचारियों से लेकर चंदे की गणना में लगे बैंककर्मी तक सवालों के घेरे में हैं। पूरे प्रांगण में 8०० कैमरे लगे हैं, उसके बाद भी चोरी कैसे हो गई। जब राम मंदिर आंदोलन चल रहा था, तब से लेकर आजतक चंदे का कोई लेखा-जोखा नहीं आया। इस मामले में बहुत बड़े-बड़े लोगों की संलिप्तता है। दावा तो ये भी किया जा रहा है कि कंस्ट्रक्शन में भी बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार हुआ है। वहां लगातार चोरी हुई और उसे टालने की कोशिश की जा रही है। ये मामला गंभीर है। अब तक ट्रस्ट क्यों बना हुआ है। उसे अब तक बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए था। अगर चंदे की चोरी हो रही थी तो खुद ट्रस्ट को इसकी एफआईआर दर्ज करानी चाहिए थी। उसने ऐसा क्यों नहीं कराया? एसआईटी ने इतने दिन पूछताछ की, क्या उसने अभी तक कुछ बताया?

मुझे लगता है कि इन सबका बयान आना चाहिए था। इस मामले में संघ की चुप्पी ने मुझे हैरान किया है, प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी ने मुझे हैरान किया है। ये धर्म के साथ बहुत बड़ा अपराध है। सच्चाई सामने आनी चाहिए। एक हिदू होने के नाते मैं शîमदा महसूस कर रहा हूं। चंपत राय मौन क्यों हैं? उन्हें सामने आकर बताना चाहिए। ये आस्था की चोरी हुई है। राम मंदिर आंदोलन के समय से ही पैसे का कभी कोई हिसाब नहीं दिया गया। रुपये दिए, लोगों ने जेवर दिए, शिलाएं दान कीं, जिनमें सोने-चांदी की शिलाएं थीं वो सब कहां गईं? ये सिर्फ हिंदुओं की आस्था का मामला नहीं है। राम भारतीयता का प्रतीक हैं। ये भारतीयता को तकलीफ देने वाला मामला है। ये जो एसआईटी बनी है, वो एसआईटी है ही नहीं। एसआईटी हमेशा एफआईआर के बाद गठित होती है। ये सिर्फ एक जांच कमेटी है। यहां ऐसा कुछ नहीं है।

आरोप सबसे अधिक अगर किसी पर लग रहे हैं तो वह चंपत राय, और उनके पूर्व चालक टिन्नू यादव पर । चंपत की नीयत पर किसी को संदेह नहीं है क्योंकि वह सरकारी नौकरी छोड़कर जिस तरह से संघ के कामकाज व राम मंदिर आंदोलन के लिए अपनी सर्वोच्च क्षमता के साथ पूरी ईमानदारी से लगे थे । मुझे अच्छी तरह याद है जब राम मंदिर का उद्घाटन था और मैंने उनसे पूछा कि राम मंदिर के निर्माण में बहुत पैसा आयेगा, इसको कैसे व्यवस्थित रखा जायेगा, तो उन्होंने कहा था कि राम के पैसे की व्यवस्था की जरूरत नहीं, उनके पैसे की निगरानी नहीं. सारा पैसा ईमानदारी से मंदिर निर्माण में लगेगा, और जो राम का पैसा लेगा, उसे कुष्ठ रोग जैसी बीमारी लगेगा। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी कोई संलिप्तता होगी लेकिन चूंकि व्यवस्था उन्हीं के हाथों में है तो उनको जांच रिपोर्ट आने तक खुद को इस्तीफा देकर अलग कर लेना चाहिए।

अगर सही समझें तो राम मंदिर के दानपात्रों की धनराशि में हेराफ़ेरी किए जाने के साथ ही इससे जुड़े साक्ष्यों को मिटाने का खेल भी लंबे समय से चल रहा था। गबन के खेल में जो ट्रस्ट कर्मी नहीं शामिल होते थे, उन्हें निकाल दिया जाता था या फिर धमकियां देकर अयोध्या छोड़ने को मजबूर किया जाता था। यह तथ्य न केवल विशेष जांच दल (एसआईटी) की जांच में साबित होता नजर आ रहा है बल्कि पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिह व ट्रस्ट के इंजीनियर रहे प्रयागराज के दीनानाथ वर्मा के बयान भी इसे प्रमाणित कर रहे हैं।

महिपाल सिह के दावे तब सत्य होते दिखे, जब एसआईटी जांच में गणना कक्ष के सीसी कैमरों की फुटेज केवल डेढ़ माह की मिली। टीम ने डिलीट किए गए पुराने डेटा को रिकवर कराने और छेड़छाड़ की जांच के लिए इसे दिल्ली स्थित प्रयोगशाला में भेजा है। दानराशि में चोरी का प्रकरण पांच जून को सामने आने के बाद से अब तक कई तथ्य व पूर्व कर्मियों के बयान सामने आ चुके हैं। यहां तक कि राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र भी मीडिया के सामने आकर इसकी स्वीकारोक्ति कर चुके हैं। उन्होंने भी दानराशि के संग्रहण में हुई वित्तीय पारदर्शिता की चूक को स्वीकारा है और पूरे सिस्टम को बदलने की आवश्यकता जताई है। इससे पहले ट्रस्ट के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिह ने सामने आकर यह दावा पहले ही कर दिया था कि मंदिर व्यवस्था से जुड़े रामशंकर यादव टिन्नू ने गणना कक्ष के सीसीटीवी फुटेज से छेड़छाड़ करके आठ महीने का डेटा डिलीट करा दिया था। उन्होंने विरोध किया तो उन्हें निकलवा दिया गया और धमकियां दी गईं। प्रकरण ने तूल पकड़ा तो 13 जून को राज्य सरकार ने एसआईटी गठित कर मामले की जांच शुरू करा दी। छह दिनों की जांच में यह प्रमाणित हो गया कि सीसीटीवी फुटेज से छेड़छाड़ की गई है। इसी बीच ट्रस्ट के पूर्व इंजीनियर दीनानाथ वर्मा भी सामने आ गए और उन्होंने निर्माण सामग्री के बिल पर ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र के 4० प्रतिशत कमीशन लेने का आरोप लगाते हुए सनसनी फैला दी। वर्मा ने यह भी बताया कि वह जब विरोध करने लगे तो उन्हें गणना में लगा दिया गया। वहां भी जब विरोध किया तो अयोध्या छोड़ देने की धमकियां दी गईं। इससे स्पष्ट है कि गबन का यह खेल वर्षों से चल रहा था। इसे अपने रिश्तेदारों व परिचितों को भर्ती करा कर अनुकल्प मिश्रा गति देता रहा।

अयोध्या स्थित राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण में हर दिन नए तथ्य सामने आ रहे हैं। इससे मंदिर प्रबंधन पर लग रहे आरोपों के साथ-साथ संदेह भी बढ़ता जा रहा है। मंदिर निर्माण के समय दान देने वाले कुछ श्रद्धालु अब खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं और दान में दी गई वस्तुओं का सार्वजनिक हिसाब मांग रहे हैं।

इंडियन बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन के नॉर्थ इंडिया हेड अनुराग रस्तोगी ने बताया कि देशभर के सराफा कारोबारियों ने 1०-1० और 2०-2० ग्राम चांदी भेजकर करीब 6० किलो चांदी एकत्र की थी। इस चांदी को गलाकर एक से सवा किलो वजन की ईंटें तैयार की गई थीं जिन पर दानदाताओं के नाम और गोत्र अंकित थे। इसके अलावा ऋषिकेश एसोसिएशन की ओर से एक किलो चांदी का कलश भी भेंट किया गया था। रस्तोगी के मुताबिक, 2० जुलाई 2०2० को चंपत राय की सहमति के बाद ये चांदी की ईंटें अयोध्या स्थित रामकचहरी में सौंपी गई थीं। उस समय चंपत राय, डॉ. अनिल मिश्रा और कैशियर प्रकाश गुप्ता मौजूद थे। दान सामग्री स्वीकार करने के बाद शुद्धता प्रमाण पत्र और रसीद भी जारी की गई थी। उनका कहना है कि इन ईंटों को नींव पूजन में उपयोग करने का अनुरोध किया गया था लेकिन बाद में इनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। रस्तोगी ने यह भी दावा किया कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से एक-एक किलो के दो चांदी के दीपक, दो चांदी के कटोरे, 2०० ग्राम की पंचधातु सिल्ली और नाग-नागिन का जोड़ा दान किया था। उनके मुताबिक, एक दीपक में डॉ. अनिल मिश्रा और उनकी पत्नी ने अखंड ज्योति जलाई थी जो प्राण प्रतिष्ठा के दौरान तस्वीरों में भी दिखाई दी थी हालांकि, भव्य मंदिर बनने के बाद न तो वह दीपक दिखाई दे रहा है और न ही भगवान के भोग के लिए दान किए गए चांदी के कटोरे।

यह एक इकलौता मामला नहीं है। सूत्रों की मानें तो श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे और दान राशि से जुड़े कथित अनियमितता प्रकरण की जांच कर रही विशेष जांच टीम (एसआईटी) को जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण पहलू मिला है। सूत्रों के मुताबिक, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की हर तीसरे माह होने वाली बैठक में मंदिर की आय और नकद दान का विवरण प्रस्तुत किया जाता था लेकिन सोने-चांदी एवं अन्य बहुमूल्य दान सामग्री की मात्रा, मूल्यांकन और उपलब्ध स्टॉक का विस्तृत ब्योरा बैठक के एजेंडे का नियमित हिस्सा नहीं था।

ऐसे में एसआईटी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि वर्षों के दौरान प्राप्त हुई बहुमूल्य दान सामग्री का समुचित लेखा-जोखा किस स्तर पर रखा गया और उसकी निगरानी की व्यवस्था क्या थी। जांच से जुड़े सूत्र बताते हैं कि एसआईटी को दान से संबंधित कई रसीदें और अभिलेख मिले हैं जिनमें श्रद्धालुओं की ओर से सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के और अन्य कीमती वस्तुएं चढ़ाने का उल्लेख है हालांकि कई वस्तुओं के संग्रह, भंडारण और अंतिम स्थिति से संबंधित रिकॉर्ड अभी तक स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने भारत सरकार की संस्था ‘मिट’ (टकसाल) को जांच और गलाने के लिए पहले चरण में 9.44 क्विंटल (944 किलो) चांदी दी थी। राम मंदिर के लिए भक्तों की ओर से दान किए गए सोने और चांदी की गुणवत्ता और मात्रा के मूल्यांकन के लिए ट्रस्ट ने यह फैसला लिया था। चंपत राय ने कुछ महीने पहले यह जानकारी सार्वजनिक करते हुए बताया था कि दान के रूप में कुल 13 क्विंटल चांदी और 2० किलो सोना प्राप्त हुआ है। पहले चरण में 9.44 क्विंटल (944 किलो) चांदी गलाने के लिए भेजी गई।

लेख का सार यह है कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान और चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। सीसीटीवी फुटेज के गायब होने, पूर्व कर्मचारियों के आरोपों, बहुमूल्य दान सामग्री के लेखा-जोखा पर उठे सवालों और एसआईटी जांच के बीच यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय बन गया है। ऐसे में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के माध्यम से सच्चाई सामने आना आवश्यक है ताकि जनता का विश्वास बना रहे और दोषियों की जवाबदेही तय हो सके।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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