डॉ रजनी चौबे

भारतीय लोकतंत्र की चर्चा जब भी होती है, तब न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे संवैधानिक मूल्यों का उल्लेख स्वाभाविक रूप से सामने आता है। किंतु संविधान की प्रस्तावना में इन मूल्यों के साथ प्रतिष्ठित एक अन्य आदर्श बंधुत्वअक्सर विमर्श के केंद्र से अनुपस्थित दिखाई देता है। यह विमर्श इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बंधुत्व केवल एक नैतिक आकांक्षा नहीं, बल्कि वह सामाजिक आधार है जिस पर न्याय, स्वतंत्रता और समानता की संपूर्ण संवैधानिक संरचना टिकी हुई है। न्याय पर न्यायालयों में बहस होती है, स्वतंत्रता पर राजनीतिक और वैचारिक विमर्श चलता है तथा समानता सामाजिक न्याय की नीतियों का आधार बनती है। इसके विपरीत बंधुत्व अपेक्षाकृत कम चर्चित विषय बना रहता है। जबकि वास्तविकता यह है कि यही वह मूल्य है जो अन्य सभी संवैधानिक आदर्शों को सामाजिक जीवन में सार्थक बनाता है।
भारतीय संविधान ऐसे समय में निर्मित हुआ था जब देश विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक हिंसा और सामाजिक अस्थिरता से गुजर रहा था। संविधान निर्माताओं ने अनुभव किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता किसी राष्ट्र को स्थायी रूप से एकजुट नहीं रख सकती। विविध धर्मों, भाषाओं, जातियों और संस्कृतियों वाले भारत को सामाजिक एकता तथा पारस्परिक सम्मान की भी आवश्यकता होगी। यही कारण था कि संविधान की प्रस्तावना में बंधुत्व को स्थान दिया गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। यदि इनमें से किसी एक की उपेक्षा होती है, तो लोकतंत्र का संतुलन प्रभावित होता है।भारतीय संदर्भ में बंधुत्व का अर्थ केवल भाईचारे तक सीमित नहीं है। यह साझा नागरिकता, पारस्परिक सम्मान, सह-अस्तित्व और राष्ट्रीय एकता की भावना का प्रतिनिधित्व करता है। संविधान की प्रस्तावना बंधुत्व को व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता से जोड़ती है। इसका आशय यह है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों की व्यवस्था नहीं है, बल्कि नागरिकों के बीच विश्वास और सम्मान का संबंध भी है। यदि नागरिक एक-दूसरे की गरिमा का सम्मान नहीं करेंगे, तो संवैधानिक अधिकारों का वास्तविक लाभ भी सीमित हो जाएगा।
भारतीय लोकतंत्र ने स्वतंत्रता के बाद उल्लेखनीय संस्थागत सफलताएँ प्राप्त की हैं। नियमित चुनाव, स्वतंत्र न्यायपालिका, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और मजबूत संवैधानिक संस्थाएँ इसकी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं किंतु सामाजिक स्तर पर अनेक चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं। जातीय तनाव, सांप्रदायिक अविश्वास, लैंगिक असमानताएँ, क्षेत्रीय विभाजन और बढ़ता वैचारिक ध्रुवीकरण इस बात की ओर संकेत करते हैं कि राजनीतिक लोकतंत्र की तुलना में सामाजिक लोकतंत्र का विकास अपेक्षाकृत धीमा रहा है।आज के समय में यह चुनौती और भी गंभीर हो गई है। डिजिटल युग ने संवाद के अवसरों का विस्तार किया है लेकिन इसके साथ-साथ वैचारिक ध्रुवीकरण भी बढ़ा है। सोशल मीडिया के माध्यम से सूचनाओं का तीव्र प्रसार लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करता है, किंतु कई बार यही माध्यम घृणात्मक भाषण, दुष्प्रचार और सामाजिक तनाव को भी बढ़ावा देता है। असहमति को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा मानने के बजाय विरोध को शत्रुता के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है। ऐसी परिस्थितियों में बंधुत्व का महत्व पहले से अधिक बढ़ जाता है।
लोकतंत्र की सफलता केवल संस्थागत व्यवस्थाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नागरिक संस्कृति पर भी निर्भर करती है। न्यायालय न्याय प्रदान कर सकते हैं, सरकारें नीतियाँ बना सकती हैं और संविधान अधिकारों की रक्षा कर सकता है, किंतु नागरिकों के बीच विश्वास और आत्मीयता का निर्माण केवल कानूनों से संभव नहीं है। यह कार्य समाज, शिक्षा, संस्कृति और नागरिक चेतना के माध्यम से ही किया जा सकता है। इसी कारण बंधुत्व को एक नैतिक और सामाजिक मूल्य माना जाता है। भारतीय परंपरा में भी बंधुत्व का विचार नया नहीं है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सूत्र मानवता के व्यापक दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं। संविधान की प्रस्तावना में निहित बंधुत्व इसी मानवीय दृष्टि का आधुनिक लोकतांत्रिक रूप है। यह नागरिकों को उनकी संकीर्ण पहचानों से ऊपर उठाकर साझा नागरिकता और राष्ट्रीय समुदाय की भावना से जोड़ता है।
भारतीय समाज ने अनेक अवसरों पर बंधुत्व की शक्ति का परिचय भी दिया है। प्राकृतिक आपदाओं, महामारी और राष्ट्रीय संकटों के समय लोगों ने जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर सहयोग और संवेदनशीलता का प्रदर्शन किया है। कोविड-19 महामारी के दौरान विभिन्न सामाजिक समूहों और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किए गए प्रयास इसका उदाहरण हैं। यह दर्शाता है कि भारतीय समाज में बंधुत्व की भावना अभी भी विद्यमान है। आवश्यकता केवल इसे संकट की परिस्थितियों तक सीमित न रखकर सामान्य सामाजिक जीवन का हिस्सा बनाने की है।संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। संवैधानिक नैतिकता का अर्थ केवल संविधान के प्रावधानों का पालन करना नहीं है बल्कि उसके मूल्यों को व्यवहार में अपनाना भी है। न्याय, स्वतंत्रता और समानता तभी स्थायी रूप से स्थापित हो सकते हैं जब समाज में बंधुत्व की भावना मौजूद हो। यदि लोकतांत्रिक संवाद सम्मान और सहिष्णुता के स्थान पर कटुता और अविश्वास का रूप ले लेता है, तो संवैधानिक मूल्यों का वास्तविक उद्देश्य प्रभावित होता है।
आज भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है। आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और अवसंरचनात्मक विस्तार निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, किंतु किसी राष्ट्र का विकास केवल आर्थिक संकेतकों से नहीं मापा जा सकता। सामाजिक विश्वास, नागरिक गरिमा, सामुदायिक सहयोग और राष्ट्रीय एकता भी उतने ही महत्वपूर्ण तत्व हैं। विकसित समाज वे होते हैं जहाँ नागरिकों और संस्थाओं के बीच विश्वास का स्तर उच्च होता है तथा सामाजिक सहयोग विकास की प्रक्रिया को मजबूत बनाता है।भारतीय संविधान के निर्माताओं ने इसी कारण बंधुत्व को प्रस्तावना में स्थान दिया था। यह कोई सजावटी आदर्श नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की आधारभूत शर्त है। यदि न्याय, स्वतंत्रता और समानता को व्यवहारिक जीवन में सार्थक बनाना है तो बंधुत्व को पुनः राष्ट्रीय विमर्श और नागरिक चेतना के केंद्र में स्थापित करना होगा। विकसित भारत की यात्रा अंततः उतनी ही सामाजिक है जितनी आर्थिकऔर इस यात्रा का सबसे विश्वसनीय पथप्रदर्शक संभवतः संविधान का यही अपेक्षाकृत मौन किंतु अनिवार्य आदर्श है बंधुत्व।








