तेल बचाने की नौटंकी या जनता को भ्रमित करने की राजनीति? — वेदप्रकाश विद्रोही

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मुख्यमंत्री और मंत्रियों की साइकिल-रिक्शा यात्रा सिर्फ फोटो इवेंट साबित हुई, वास्तविकता में काफिलों की फिजूलखर्ची जारी : विद्रोही

तेल बचाने के नाम पर जनता को संदेश, लेकिन सरकारी काफिलों में नहीं आई कोई कमी : ग्रामीण भारत

चंडीगढ़/रेवाडी, 8 जून 2026। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने आरोप लगाया कि पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों और तेल बचत के नाम पर हरियाणा सरकार द्वारा किया गया तथाकथित सादगी अभियान केवल एक मीडिया इवेंट बनकर रह गया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री से लेकर छोटे-बड़े मंत्री और भाजपा नेता साइकिल, रिक्शा, ऑटो रिक्शा, ट्रेन तथा सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करके मीडिया की सुर्खियां तो बटोरते रहे, लेकिन यह कभी नहीं बताया गया कि इन प्रतीकात्मक यात्राओं से वास्तव में कितना तेल बचाया गया।

विद्रोही ने कहा कि यदि तेल बचत का अभियान गंभीरता और ईमानदारी से चलाया गया था तो फिर आज वही मुख्यमंत्री, मंत्री और भाजपा पदाधिकारी पुनः बड़े-बड़े सरकारी काफिलों के साथ यात्रा क्यों कर रहे हैं? यदि सार्वजनिक परिवहन का उपयोग इतना ही आवश्यक और उपयोगी था तो उसे केवल एक दिन या कुछ घंटों तक सीमित क्यों रखा गया? उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरा अभियान जनता के बीच सादगी का दिखावा करने और राजनीतिक छवि चमकाने का प्रयास था।

उन्होंने कहा कि भाजपा एक ओर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि करके आम जनता की जेब पर बोझ डालती है, वहीं दूसरी ओर सादगी और तेल बचत के नाम पर प्रतीकात्मक कार्यक्रम आयोजित करके जनता को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने का प्रयास करती है। यह दोहरा चरित्र अब जनता के सामने पूरी तरह उजागर हो चुका है।

मीडिया की भूमिका पर भी उठाए सवाल

वेदप्रकाश विद्रोही ने उन मीडिया संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाए जिन्होंने मुख्यमंत्री और मंत्रियों की साइकिल, रिक्शा अथवा बस यात्रा की तस्वीरों और वीडियो को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। उन्होंने कहा कि जिस उत्साह से इन कार्यक्रमों को प्रचारित किया गया, उसी उत्साह से अब यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि उन अभियानों का परिणाम क्या निकला?

उन्होंने कहा कि यदि तेल बचत वास्तव में सरकार की प्राथमिकता थी तो मुख्यमंत्री और मंत्रियों के काफिलों में वाहनों की संख्या कम क्यों नहीं की गई? सरकारी वाहनों के उपयोग में कटौती क्यों नहीं हुई? सुरक्षा और प्रोटोकॉल के नाम पर आज भी दर्जनों वाहनों के काफिले सड़कों पर दौड़ते दिखाई देते हैं, जिनमें प्रतिदिन लाखों रुपये का ईंधन खर्च होता है।

काफिलों की फिजूलखर्ची पर सरकार मौन क्यों?

ग्रामीण भारत अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि हरियाणा का कोई भी नागरिक आसानी से देख सकता है कि मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के काफिले पहले की तरह ही लंबे-चौड़े हैं। उन्होंने कहा कि तेल बचाने का संदेश जनता को दिया जा रहा है, लेकिन स्वयं सत्ता प्रतिष्ठान उसी दिशा में कोई ठोस कदम उठाने को तैयार नहीं दिखता।

विद्रोही ने कहा कि प्रदेशभर में आयोजित भाजपा के कार्यक्रमों, रैलियों और सरकारी आयोजनों में प्रतिदिन भारी मात्रा में डीजल और पेट्रोल की खपत होती है। सरकारी संसाधनों और वाहनों के व्यापक उपयोग से करोड़ों रुपये का ईंधन खर्च किया जाता है। ऐसे में तेल बचाने के नाम पर साइकिल या बस की एक-दो प्रतीकात्मक यात्राएं केवल दिखावा प्रतीत होती हैं।

सरकार सार्वजनिक करे तेल खपत का पूरा रिकॉर्ड

वेदप्रकाश विद्रोही ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से मांग की कि जिस दिन प्रधानमंत्री द्वारा तेल बचाने का संदेश दिया गया था, उससे एक माह पहले तक मुख्यमंत्री, मंत्रियों और अन्य सरकारी वीआईपी काफिलों में प्रतिदिन तथा प्रतिमाह कितना ईंधन खर्च होता था, उसके आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। साथ ही तेल बचत अभियान शुरू होने के बाद सरकारी वाहनों में ईंधन की खपत में कितनी कमी आई, इसका पूरा विवरण भी जनता के सामने रखा जाए।

उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में तेल बचत के प्रति गंभीर है तो उसे केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रमों की बजाय प्रशासनिक स्तर पर ठोस निर्णय लेने चाहिए। सरकारी काफिलों में वाहनों की संख्या कम करना, अनावश्यक सरकारी यात्राओं पर रोक लगाना और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना ही वास्तविक तेल बचत का मार्ग है।

जनता दिखावे नहीं, जवाबदेही चाहती है

विद्रोही ने कहा कि हरियाणा की जनता बढ़ती महंगाई, महंगे पेट्रोल-डीजल और घरेलू बजट पर पड़ रहे अतिरिक्त बोझ से पहले ही परेशान है। ऐसे समय में सरकार का दायित्व केवल संदेश देने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे अपने आचरण से भी उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता अब फोटो खिंचवाने वाले अभियानों से प्रभावित होने वाली नहीं है, बल्कि वह यह जानना चाहती है कि सरकार ने वास्तव में कितना ईंधन बचाया और सार्वजनिक धन की बचत के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाए।

उन्होंने कहा कि पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतंत्र की मूल भावना है, इसलिए सरकार को तेल बचत अभियान के वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक करके जनता के सामने सच रखना चाहिए। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह अभियान वास्तविक बचत का प्रयास था या केवल राजनीतिक प्रचार का एक और अध्याय।

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Author: Bharat Sarathi

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