मुद्दा तो पेपर लीक है, रोजगार है, छात्रों का आक्रोश है

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12 वर्षों में 15 राज्यों में 89 पेपर लीक, 1.7 करोड़ से अधिक छात्रों के सपने चूर। 2,000 से ज्यादा गिरफ्तारियां लेकिन दोषसिद्धि दर 5% से नीचे।

ओंकारेश्वर पांडेय 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा। पेपर लीक, बेरोजगारी और टूटी परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ उन्होंने केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा। काक्रोच जनता पार्टी के बैनर तले यह प्रदर्शन हुआ लेकिन मुद्दा राजनीतिक रंग से ऊपर है। मोदी सरकार के 12 सालों में युवाओं के भविष्य को निष्पक्ष परीक्षाओं और नौकरियों की गारंटी देने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। छात्र तिलचट्टे नहीं हैं। वे इस राष्ट्र का भविष्य हैं लेकिन सिस्टम उन्हें कुचल रहा है, रौंद रहा है और फिर कोलैटरल डैमेज कहकर आगे बढ़ रहा है।

चार दिन पहले 2 जून 2026 को CBSE अध्यक्ष राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता को हटाया गया। ऑन-स्क्रीन मार्किंग घोटाले में 13,000 उत्तर पुस्तिकाएं गुम हो गईं और 4 लाख छात्रों को अपनी कॉपियों के लिए भीख मांगनी पड़ी। एक छात्र वेदांत को दूसरे की उत्तर पुस्तिका मिल गई। CBSE ने गलती मानी लेकिन यह कोई अलग घटना नहीं है। यह पूरी परीक्षा मशीनरी की सड़न का एक और लक्षण है।

पिछले 12 वर्षों में 15 राज्यों में 89 पेपर लीक हो चुके हैं जिनमें 1.7 करोड़ से अधिक छात्रों के सपने चूर-चूर हुए। 2,000 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं लेकिन दोषसिद्धि दर 5% से नीचे रही। अपराधियों के लिए हाई रिवॉर्ड, लो रिस्क का खेल चल रहा है। 

पेपर लीक रोकने के लिए सरकार ने 21 जून 2024 को सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2024 लागू किया। यह बाहरी सिंडिकेट्स को डराने का दिखावा भर साबित हुआ क्योंकि जब स्थानीय पार्टी सर्किल, भ्रष्ट अधिकारी और कोचिंग माफिया एक साथ मिल जाते हैं, तो कानून मखौल बन जाता है। इसीलिए भ्रष्ट कोचिंग माफिया और राजनीतिक साठगांठ पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।

समस्तीपुर की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली। टूटी हुई व्यवस्था ने उसे कगार पर ला खड़ा किया था। यह कोई इंसिडेंट नहीं बल्कि उस राज्य तंत्र पर आरोप है जो युवाओं को कोलैटरल डैमेज मानता है। स्पष्ट कहें — छात्र तिलचट्टे नहीं हैं। वे राष्ट्र का भविष्य हैं, वही युवा जिनकी दुहाई मोदी सरकार देश-विदेश में देती फिरती है लेकिन विगत एक दशक में भारत की हाई-स्टेक्स परीक्षा प्रणाली अंदर से सड़ चुकी है। 

इस सड़न के दो प्रमुख पहलू हैं — परीक्षाओं का बाजार और नौकरियों का सूखता कुआं।
परीक्षा तंत्र का पतन: सपनों का कत्लखाना

हर साल भारत में कितनी परीक्षाएं होती हैं और कितने छात्र इनमें भाग लेते हैं? ये आंकड़े बताते हैं कि यह सिर्फ पेपर लीक का मुद्दा नहीं बल्कि एक पूरी प्रणाली का व्यवस्थित पतन है। प्रमुख परीक्षा आयोजक एजेंसियां हर साल करोड़ों युवाओं को इस चक्र में फंसाए रखती हैं।

CBSE बोर्ड परीक्षाएं (कक्षा 10 और 12) साल में दो बार आयोजित होती हैं जिसमें लगभग 46 लाख छात्र शामिल होते हैं। 

NTA NEET, JEE, CUET, UGC-NET जैसी 6-8 प्रमुख परीक्षाएं कराती है, जिसमें 2.5 करोड़ से अधिक छात्र दौड़ते हैं। 

SSC की CGL, CHSL, GD, MTS, CPO आदि 7-9 परीक्षाओं में 3.5 करोड़ से ज्यादा आवेदन आते हैं। 

UPSC सिविल सर्विसेज, NDA, CDS आदि 8-10 परीक्षाओं के लिए 15-20 लाख युवा तैयारी करते हैं।

IBPS बैंक PO और क्लर्क जैसी 4-6 परीक्षाओं में 2.5 करोड़ आवेदक, रेलवे की NTPC, Group D, ALP आदि 5-8 परीक्षाओं में 4 करोड़, और राज्यों की कर्मचारी चयन बोर्डों की 50+ परीक्षाओं में 5 करोड़ से अधिक छात्र भाग लेते हैं।

कुल मिलाकर हर साल 15-20 करोड़ आवेदन आते हैं। एक छात्र कई परीक्षाओं में आवेदन करता है लेकिन चयन दरें दिल दहला देने वाली हैं। 

UPSC सिविल सेवा में 10-12 लाख आवेदनों में से सिर्फ करीब 1,000 चयनित होते हैं — चयन दर 0.01% से भी कम। 

SSC CGL में 30-40 लाख में 10,000, रेलवे NTPC में 2-2.5 करोड़ में 35,000, IBPS PO में 20-25 लाख में 8,000, NEET-UG में 22-24 लाख में लगभग 1 लाख MBBS सीटें (चयन दर ~4%), और JEE में 12-14 लाख में IIT की ~16,000 सीटें (चयन दर ~1.2%)।

हर साल 10 करोड़ से अधिक युवा इन परीक्षाओं में कूदते हैं लेकिन 90 प्रतिशत से ज्यादा असफल हो जाते हैं क्योंकि सीटें ही नहीं बढ़ाई गईं। फिर यही बच्चे अगले साल फिर लाइन में लग जाते हैं। उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। कोचिंग सेंटर्स का कारोबार फलता-फूलता है जबकि छात्रों की जेबें खाली होती जाती हैं और सपने टूटते जाते हैं।

पेपर लीक इस सड़न को बार-बार उजागर करते हैं। NEET-UG 2026 की परीक्षा 3 मई को होगी लेकिन लीक होने पर 12 मई को रद्द कर दी गई। फिर से परीक्षा 21 जून को हुई, परिणाम जुलाई में, काउंसलिंग अगस्त-सितंबर में और प्रवेश नवंबर में — सामान्य वर्ष में जुलाई में होता है। छात्रों के 4-5 महीने बर्बाद हो गए। 

रेलवे NTPC 2018-2020 में लीक और देरी से 2.5 करोड़ छात्रों को 5 साल का नुकसान हुआ। SSC CGL 2018 में रिमोट एक्सेस नकल से 2 साल बर्बाद।

प्रत्येक बड़े पेपर लीक औसतन 1-2 लाख छात्रों को प्रभावित करता है — 1-2 साल का करियर गैप, 1-2 लाख रुपये का कोचिंग खर्च और भारी मानसिक तनाव। पिछले 12 सालों में पेपर लीक ने अनुमानित 5-7 करोड़ परीक्षा प्रयासों को बर्बाद किया है और छात्रों की जेब से अनुमानतः 50,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की प्रत्यक्ष आर्थिक क्षति पहुंचाई है।

सरकार के पास हर परीक्षा का पूरा डेटा है लेकिन वह इसे सार्वजनिक नहीं करती। कितने छात्र 5 साल से ज्यादा परीक्षाओं के चक्र में फंसे हैं? कितनी आत्महत्याएं परीक्षा तनाव से होती हैं? कोई आंकड़ा नहीं। अगर डेटा जारी हो तो पता चलेगा कि 50 प्रतिशत से अधिक युवा 5 साल से परीक्षाओं में फंसे हैं, 10 प्रतिशत ने 10 साल में कुछ और नहीं किया। 

एआई रिसर्च बताता है कि हर साल 1,000 से ज्यादा युवा आत्महत्या करते हैं, लेकिन सरकार 100-200 मानकर छुपा लेती है। मशीन सड़ गई है और तिलचट्टे उसी मशीन के उत्पाद हैं — जो रेंगते हैं, लेकिन कभी पहुंच नहीं पाते।

नौकरियों का सफाया: वादों का खोखला खेल

यह सिर्फ पेपर लीक नहीं, बल्कि असली बीमारी सरकारी नौकरियों का सूखना है। 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने युवाओं से वादा किया था — “हर साल दो करोड़ नौकरियां देंगे” लेकिन 12 साल बाद हकीकत उलटी है। 

रेलवे में 2014 तक 13.5 लाख कर्मचारी थे, 2026 में अनुमानित 11.2 लाख रह गए — 2.3 लाख पद समाप्त। रेलवे ने 2015-2024 में 10 लाख पदों पर भर्ती निकाली, लेकिन चयन सिर्फ 4 लाख से कम। बाकी पद ठप्प या अनंत टलते रहे। क्या रेलवे की दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण यह भी है? 

राष्ट्रीयकृत बैंकों में 2014 तक 27 बैंक और 9 लाख कर्मचारी थे। 30 अगस्त 2019 के बड़े विलय के बाद 12 बैंक बचे, कर्मचारी 6.5 लाख रह गए — 2.5 लाख पद गायब। VRS के नाम पर 1 लाख से ज्यादा कर्मचारियों को बाहर किया गया। नई भर्तियां शून्य के करीब। अब बैंक PO के लिए पहले 500-800 पदों की जगह सिर्फ 250-300। 

जो लोग कहते हैं कि अर्थव्यवस्था ठीक चल रही है, वे बताएं कि बढ़ती आबादी में 27 में से 15 बैंक बंद क्यों हो गये? 

सशस्त्र सेनाओं में 2014 तक 13.5 लाख कर्मचारी थे। Agnipath योजना (जून 2022) ने स्थायी भर्तियां लगभग बंद कर दीं। 2026 में संख्या 12.2 लाख, 1.3 लाख पद अस्थायी। 1.8 लाख अग्निवीर भर्ती हुए लेकिन सिर्फ 25 प्रतिशत को स्थायी नौकरी — बाकी 1.35 लाख 4 साल बाद फिर बेरोजगार। कोई पेंशन, कोई ग्रेच्युटी नहीं।

केंद्र सरकार के अन्य विभागों (पोस्ट, इनकम टैक्स, सचिवालय आदि) में 2014-2026 के बीच 9 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। नियमित भर्तियां (सिविल सेवाओं को छोड़कर) पिछले 5 सालों में 60 प्रतिशत कम हो गईं। कुल अनुमान — 6-7 लाख सरकारी नौकरियां स्थायी रूप से समाप्त या अस्थायी कर दी गईं। 20 लाख से अधिक युवा परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं लेकिन नौकरियां नहीं।

सच तो यह है कि मोदी सरकार की नीतियों ने युवाओं की रीढ़ तोड़ दी है। नोटबंदी दो बार हुई। (8 नवंबर 2016 और 2023 में 2000 के नोट) ने कैश इकोनॉमी और अनौपचारिक क्षेत्र को तबाह किया, जहां 90 प्रतिशत युवा काम करते थे। CMIE डेटा के अनुसार 1.5 करोड़ नौकरियां तुरंत गायब हुईं। GST (1 जुलाई 2017) बिना तैयारी के थोपा गया — 5, 12, 18, 28 स्लैब्स ने छोटे-मझोले उद्योगों को मार डाला। 1 करोड़ से ज्यादा व्यवसाय बंद, 1.8 करोड़ नौकरियां पहले दो सालों में नष्ट और मजेदार यह भी है कि 2 हजार का नोट हमारे आपके लिए बंद है, आरबीआई के आदेशों में लीगल टेंडर है। 

बैंक विलय (2019) ने 2.5 लाख नौकरियां छीनीं। Agnipath ने सेना को अस्थायी बना दिया। नेहरू युवा केंद्र (NYKS) का बजट 90 प्रतिशत कट गया, जहां 2.5 लाख युवा स्वयंसेवक थे — गांवों में कौशल और अनुभव का मंच बंद। 

शिक्षा बजट यूनियन बजट का महज 2.5-3 प्रतिशत रह गया, जबकि NEP 2020 में 6 प्रतिशत GDP का वादा था। केंद्र सरकार के लाखों पद खाली, भर्तियां ठप।

मणिपुर से लद्दाख, बिहार से बंगाल तक युवा परेशान 

मणिपुर (मई 2023 से अबतक) में 200 से ज्यादा युवा मारे गए, 60,000 विस्थापित — स्कूल जल गए, परीक्षाएं ठप। लद्दाख (2020-2026) में चीन के द्वारा भारतीय सीमा पर अतिक्रमण को लेकर गतिरोध, सोनम वांगचुक ने आवाज उठाई तो जेल में डाल दिया गया। लेकिन युवाओं के लिए कोई रोजगार पैकेज नहीं। बिहार में NEET लीक, पुलिस भर्ती लीक (2022), शिक्षक भर्ती लीक (2023) — सबसे ज्यादा पीड़ित। बंगाल में SSC शिक्षक घोटाला (2022-2026) — हजारों नियुक्तियां रद्द, लाखों युवा दोहरा रहे परीक्षाएं।

हर राज्य में यही कहानी — युवा निष्पक्ष परीक्षा के अधिकार से वंचित।

विश्वगुरु का दंभ और युवाओं का सच

प्रधानमंत्री मोदी बार-बार कहते थे — “युवा ही भारत का भविष्य हैं।” लेकिन हकीकत यह है कि यही युवा नोटबंदी में लुटे, GST में बर्बाद हुए, बैंक विलय में नौकरियों से वंचित किए गए, Agnipath में अस्थायी बना दिए गए, पेपर लीक में ठगे गए, मणिपुर-दिल्ली की सड़कों पर पीटे गए। जब आत्महत्या करते हैं तो “कोलैटरल डैमेज” कह दिए जाते हैं।

युवाओं के सपनों की छाती पर पांव रखकर कोई नेता  विश्वगुरु बनने का दावा नहीं कर सकता जब वह अपने बच्चों को सुरक्षित, पारदर्शी और निष्पक्ष परीक्षा नहीं दे पाए। एक राष्ट्र जो युवाओं की टूटी आत्माओं पर अर्थव्यवस्था खड़ा करता है, वह प्रणालीगत दिवालियापन की ओर बढ़ रहा है।

यह सरकार डेटा छुपाती है। वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और यूएनडीपी हमारे आंकड़ों पर भरोसा नहीं करते। आत्महत्याओं के आंकड़े दबाए जाते हैं। 50% युवा 5 साल से परीक्षा चक्र में फंसे हैं।

“युवा ही भविष्य हैं” — यह सिर्फ भाषण है। हकीकत में युवाओं की आत्माएं नीलाम हो रही हैं। जब तक परीक्षा तंत्र और नौकरियों की मशीनरी नहीं बदलेगी, आक्रोश बढ़ता रहेगा। पूरा हिसाब-जोखा लेना पड़ेगा।

वह पीढ़ी जिसका भविष्य पेपर लीक माफिया, भ्रष्ट नौकरशाहों और चुप्पी साधे नेताओं द्वारा नीलाम हो रहा है, वह दिन आएगा जब पूरा देश, बिना समझौते के लेखा-जोखा मांगेगी। कॉक्रोच सरकार की व्यवस्था के सड़ने से पैदा हुए हैं। विकल्प जनता देगी। 

और हां, आप चुनाव नहीं जीत रहे, सरेआम चोरी कर रहे हैं। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भाजपा सरकार ने अपने हाथ में ले रखी है। चुनाव स्वतंत्र होना चाहिए। चुनाव आयोग स्वतंत्र और कानून के दायरे में होना चाहिए। जिस आयोग ने अटल बिहारी वाजपेई को जिताया और हराया भी, उसने आयुक्तों को आजीवन अदालतों से इम्यूनिटी नहीं थी। मोदी ने दी है, और आयोग पर मतदाता सूची में धांधली, डाटा छुपाने और डिलीट करने के आरोप लगे हैं। आज का युवा यह जानने समझने लगा है। (कुछ आंकड़े रूढ़िवादी अनुमानों पर हैं।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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