डॉ. घनश्याम बादल

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की सबसे मूल्यवान पूंजी होती है। यदि उसी शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता संदेह के घेरे में आ जाए, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ गंभीर खिलवाड़ बन जाता है।
हाल के दिनों में देश में घटी घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। एक ओर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, तो दूसरी ओर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली को लेकर उठे विवाद ने लाखों विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों की चिंताओं को बढ़ा दिया है।
हालांकि यह पहली बार नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश अनेक परीक्षा घोटालों का साक्षी रहा है। कभी भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले बाजार में बिकते पाए गए, कभी प्रतियोगी परीक्षाओं में संगठित गिरोहों की भूमिका उजागर हुई और कभी तकनीकी खामियों ने पूरी प्रक्रिया को विवादों में डाल दिया। लेकिन वर्ष 2026 में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) को लेकर उठा विवाद इस समस्या को राष्ट्रीय बहस का विषय बना गया। लाखों विद्यार्थियों की महीनों की मेहनत, परिवारों की उम्मीदें और भविष्य की योजनाएं अचानक अनिश्चितता के भंवर में फंस गईं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर बार-बार वही गलतियां क्यों दोहराई जा रही हैं?
प्रश्नपत्र लीक होना कोई साधारण घटना नहीं है। यह केवल कुछ कागजों के बाहर आने का मामला नहीं बल्कि उस विश्वास की हत्या है, जिसके आधार पर छात्र वर्षों तक मेहनत करते हैं। एक विद्यार्थी जब रात-रात भर जागकर पढ़ाई करता है तो उसे यह भरोसा होता है कि परीक्षा कक्ष में उसकी प्रतिस्पर्धा केवल ज्ञान और परिश्रम से होगी। लेकिन जब प्रश्नपत्र पहले ही कुछ लोगों तक पहुंच जाए तो ईमानदारी से मेहनत करने वाला छात्र स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है। यह स्थिति प्रतिभा के साथ अन्याय और भ्रष्टाचार को पुरस्कार देने जैसी है।
इसी बीच सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली को लेकर उठे विवाद ने एक अलग प्रकार की चिंता पैदा की है। डिजिटल तकनीक का उद्देश्य पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाना था, लेकिन जब तकनीकी व्यवस्था ही विवाद का कारण बन जाए तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं। विद्यार्थियों और अभिभावकों की शिकायतें, मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर उत्पन्न संदेह तथा प्रशासनिक स्तर पर हुई हलचल यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं तैयारी, निगरानी अथवा क्रियान्वयन में गंभीर कमी रही है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सीबीएसई के अध्यक्ष राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता के तबादले भी चर्चा का विषय बन गए। सरकार ने इसे प्रशासनिक निर्णय बताया है और साथ ही ओएसएम प्रणाली की खरीद तथा क्रियान्वयन की जांच के लिए समिति गठित की है। लेकिन आम नागरिक और विद्यार्थी यह पूछने का अधिकार रखते हैं कि यदि सब कुछ ठीक था तो इतनी बड़ी कार्रवाई की आवश्यकता क्यों पड़ी? और यदि वास्तव में कोई गड़बड़ी थी तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
निश्चित रूप से इस कदम से यह संदेश जाता है कि लोकतंत्र में जवाबदेही केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं हो सकती। शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को भी अपने निर्णयों और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी होना पड़ता है। हालांकि किसी भी जांच के निष्कर्ष आने से पहले किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बार-बार सामने आ रही ऐसी घटनाएं केवल संयोग नहीं हो सकतीं। कहीं न कहीं लापरवाही है, कहीं न कहीं निगरानी की कमी है और संभव है कि कुछ मामलों में भ्रष्टाचार तथा संगठित परीक्षा माफियाओं की भूमिका भी हो।
शिक्षा क्षेत्र में उभरता यह अविश्वास एक गंभीर संकट का संकेत है। इन घटनाओं का सबसे अधिक प्रभाव विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। परीक्षा रद्द हो जाए, परिणाम विवादों में घिर जाएं या मूल्यांकन प्रक्रिया पर प्रश्न उठ जाएं, तो सबसे पहले छात्र का आत्मविश्वास प्रभावित होता है। एक वर्ष की तैयारी, आर्थिक संसाधनों का निवेश और परिवार की उम्मीदें अचानक अनिश्चितता में बदल जाती हैं। अनेक छात्र तनाव, निराशा और अवसाद का सामना करते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि व्यवस्था की गलतियों की कीमत हमेशा विद्यार्थियों को ही चुकानी पड़ती है।
इस संकट का दूसरा पक्ष और भी गंभीर है। जब युवाओं को यह लगने लगे कि सफलता का मार्ग मेहनत से नहीं बल्कि जोड़-तोड़, तकनीकी खामियों अथवा भ्रष्ट तंत्र से होकर गुजरता है, तब समाज की नैतिक नींव कमजोर होने लगती है। शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि नागरिक चरित्र निर्माण की प्रक्रिया भी है। यदि शिक्षा व्यवस्था ही अन्याय का प्रतीक बन जाए तो उसका दुष्प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है।
अब समय आ गया है कि सुधार केवल घोषणाओं तक सीमित न रहें। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया को अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणाली से जोड़ा जाना चाहिए। डिजिटल एन्क्रिप्शन, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, स्वतंत्र ऑडिट और कठोर दंड व्यवस्था को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। परीक्षा माफियाओं के विरुद्ध विशेष न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए ताकि वर्षों तक मुकदमे लंबित रहने की परंपरा समाप्त हो।
इसी प्रकार किसी भी नई तकनीकी प्रणाली को लागू करने से पहले उसका व्यापक परीक्षण, स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा मूल्यांकन और चरणबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास की पुनर्स्थापना की जाए।
विद्यार्थियों को भरोसा मिलना चाहिए कि उनकी मेहनत का मूल्य किसी भी सिफारिश, धनबल या तकनीकी गड़बड़ी से कहीं अधिक है। सरकार, शिक्षा बोर्ड और परीक्षा संस्थाओं को यह समझना होगा कि परीक्षा केवल अंक प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है।
आज आवश्यकता गहन आत्ममंथन की है। प्रश्नपत्र लीक, तकनीकी विफलताओं और प्रशासनिक अव्यवस्था को सामान्य घटनाएं मानकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ी भूल होगी। सीबीएसई विवाद, शीर्ष अधिकारियों के तबादले और लगातार सामने आ रहे परीक्षा घोटाले एक स्पष्ट चेतावनी हैं कि शिक्षा व्यवस्था के भीतर गहरे और व्यापक सुधारों की आवश्यकता है।
यदि समय रहते इस चेतावनी को नहीं समझा गया, तो सबसे बड़ी क्षति किसी संस्था या सरकार की नहीं, बल्कि उन करोड़ों युवाओं की होगी जिनके सपनों पर भारत का भविष्य टिका हुआ है।
किसी भी राष्ट्र के लिए शिक्षा में विश्वास का टूटना सबसे बड़ी हानि है। खोया हुआ धन दोबारा पाया जा सकता है, लेकिन खोया हुआ विश्वास लौटने में वर्षों लग जाते हैं।









